अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप | फाइल फोटो
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने की कोशिशें तेज तो हुई हैं, लेकिन किसी बड़े समझौते की उम्मीद अभी भी अधर में लटकी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और दोनों देशों के शीर्ष अधिकारियों के बयानों से साफ है कि शांति की राह इतनी आसान नहीं है। सोमवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने दोटूक अंदाज में कहा कि ईरान के साथ होने वाला समझौता या तो बेहद शानदार और सार्थक होगा, वरना कोई समझौता ही नहीं होगा।
दूसरी ओर, दोनों देशों ने सोमवार को इस बात के संकेत दिए कि फिलहाल किसी बड़े या तुरंत होने वाले समझौते की उम्मीद कम है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि वाशिंगटन कूटनीति और बातचीत को पूरा मौका देना चाहता है। उन्होंने यह भी साफ किया कि अगर बातचीत से बात नहीं बनी, तो अमेरिका के पास दूसरे रास्ते भी खुले हैं। इससे पहले रविवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने प्रतिनिधियों से कहा था कि वे ईरान के साथ किसी भी समझौते को लेकर जल्दबाजी न दिखाएं।
दोनों देशों के बीच पिछले तीन महीनों से युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं। इस तनाव को कम करने के लिए एक संभावित सहमति पत्र (MoU) तैयार किया जा रहा है, जिसमें 14 मुख्य बिंदु शामिल हैं। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अपनी साप्ताहिक ब्रीफिंग में बताया कि कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बन चुकी है, लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि वे समझौते पर दस्तखत करने के बेहद करीब पहुंच गए हैं।
इस शुरुआती समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को रोकना और होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) से अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी को हटाना है। इसके बदले में ईरान इस महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करेगा। फिलहाल इस शुरुआती बातचीत में परमाणु मुद्दे को शामिल नहीं किया गया है। अगर दोनों पक्ष इस शुरुआती समझौते पर राजी हो जाते हैं, तो उसके बाद अगले 60 दिनों के भीतर परमाणु मुद्दे पर अलग से बातचीत शुरू की जाएगी।
राष्ट्रपति ट्रंप का मुख्य उद्देश्य ईरान को अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) के जरिए परमाणु हथियार बनाने से रोकना है। हालांकि, तेहरान हमेशा से इस बात से इनकार करता आया है कि उसकी ऐसी कोई योजना है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर साफ लिखा कि जब तक एक पक्का समझौता नहीं हो जाता, तब तक ईरानी जहाजों पर अमेरिकी नाकेबंदी पूरी तरह लागू रहेगी।
Also Read: फ्यूल, फर्टिलाइजर और फॉरेक्स की बढ़ती लागत के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत: सीतारमण
शनिवार को राष्ट्रपति ट्रंप ने यह कहकर उम्मीदें बढ़ा दी थीं कि अमेरिका और ईरान ने शांति समझौते के लिए एक सहमति पत्र पर काफी हद तक बातचीत पूरी कर ली है, जिससे होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोला जा सकेगा। लेकिन ईरान के प्रवक्ता बघाई ने साफ किया कि इस संभावित समझौते में इस समुद्री रास्ते के प्रबंधन को लेकर कोई खास डिटेल शामिल नहीं है। दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल और लिक्विफाइड गैस इसी रास्ते से होकर गुजरता है।
ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से कोई टोल टैक्स नहीं वसूलेगा। हालांकि, जहाजों को मिलने वाली नेविगेशन और पर्यावरण सुरक्षा जैसी सेवाओं के लिए एक फीस ली जाएगी। इसके लिए ओमान के साथ मिलकर एक प्रोटोकॉल तैयार किया जाएगा, जो इस समुद्री रास्ते के दूसरी तरफ स्थित है।
28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से यह रणनीतिक समुद्री रास्ता लगभग बंद पड़ा है। युद्ध से पहले जहां रोजाना 125 से 140 जहाज यहां से गुजरते थे, वहीं अब सिर्फ इक्के-दुक्के जहाज ही निकल पा रहे हैं। इस नाकेबंदी की वजह से दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच गईं और एक बड़ा ऊर्जा संकट खड़ा हो गया, जिससे ईंधन, खाद और खाने-पीने की चीजों के दाम काफी बढ़ गए। हालांकि, सोमवार को दोनों देशों के बीच शांति की उम्मीदें बढ़ने से तेल की कीमतों में 5% की गिरावट आई और यह दो हफ्ते के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गईं।
दोनों देशों के बीच अभी भी कई ऐसे पेचीदा मुद्दे हैं जिन पर सहमति बनना बाकी है। इनमें ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाएं, लेबनान में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह मिलिशिया के साथ इजरायल का युद्ध, और ईरान की अपनी जमी हुई रकम को वापस पाने की मांग शामिल है। ईरान चाहता है कि उस पर लगे प्रतिबंध हटाए जाएं और विदेशी बैंकों में फ्रीज पड़ी उसकी अरबों डॉलर की तेल की कमाई को रिलीज किया जाए। ईरानी सूत्रों के मुताबिक, ईरान भविष्य में अपने संवर्धित यूरेनियम के स्टॉक से जुड़े विवाद को सुलझाने के लिए यूएन की परमाणु निगरानी संस्था की देखरेख में उस सामग्री को डायल्यूट (कमजोर) करने जैसे व्यावहारिक फॉर्मूले पर विचार कर सकता है।
इस युद्ध का असर अमेरिकी राजनीति पर भी दिख रहा है। युद्ध की वजह से अमेरिका में ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे राष्ट्रपति ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरी है। अमेरिकी संसद (कांग्रेस) भी उनकी युद्ध शक्तियों को सीमित करने की कोशिश कर रही है। यही वजह है कि ट्रंप लगातार इस विवाद को खत्म करने की संभावनाओं पर जोर दे रहे हैं। अप्रैल की शुरुआत से दोनों पक्षों के बीच एक कमजोर संघर्षविराम (Ceasefire) लागू है।
ट्रंप ने समझौते को लेकर अपनी आलोचना करने वालों को करारा जवाब देते हुए रविवार को पोस्ट किया कि अगर वह ईरान के साथ कोई डील करते हैं, तो वह बहुत अच्छी और सही होगी। इसलिए उन लोगों की बातों पर ध्यान न दें जो इस बारे में कुछ नहीं जानते।
गौरतलब है कि अप्रैल में बमबारी रुकने से पहले अमेरिका और इजरायल के हमलों में ईरान के हजारों लोग मारे जा चुके हैं। वहीं दूसरी तरफ, इजरायल ने लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ जमीनी कार्रवाई की है, जिससे वहां भी हजारों लोग मारे गए और लाखों बेघर हो गए। इसके जवाब में ईरान द्वारा इजरायल और पड़ोसी खाड़ी देशों पर किए गए हमलों में भी दर्जनों लोगों की जान गई है।
(रॉयटर्क के इनपुट के साथ)