बातचीत बेनतीजा रहने के बाद वापस अमेरिका लौटते उपराष्ट्रपति जेडी वेंस | फोटो: AP/PTI
एक बार फिर पूरी दुनिया की नजर पश्चिम एशिया की ओर है। बीते शनिवार को इस्लामाबाद में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच हुई घंटों की बातचीत का कुछ नतीजा नहीं निकला। बातचीत में अमेरिका अपनी सख्त शर्तों पर अड़ा रहा, जबकि ईरान अपने अधिकारों से पीछे हटने को तैयार नहीं हुआ। इस विफल वार्ता के बाद कूटनीति की टेबल पर ठहरा ये गतिरोध अब सिर्फ संभावनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर तेल की कीमतों, महंगाई और वैश्विक सप्लाई चेन तक पर भी देखने को मिल सकता है। ऐसे में सवाल यही है कि क्या बातचीत का सिलसिला भविष्य में आगे बढ़ेगा या हालात फिर से टकराव की तरफ जाएंगे।
बीते शुक्रवार अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ईरान के साथ न्यूक्लियर प्रोग्राम पर लंबी-लंबी बातचीत करने इस्लामाबाद गए थे, लेकिन बिना किसी नतीजे के उन्हें वापस लौटना पड़ा। एक ही सिटिंग में 21 घंटे से ज्यादा समय बीत गया, फिर भी अमेरिका जो छूट चाहता था, वो नहीं मिली।
जेडी वेंस ने प्रेस को बताया कि अमेरिका ने अपनी लाल लाइनें साफ-साफ ईरान को बता दी थीं, लेकिन वह तैयार नहीं हुआ। कुछ मुद्दों पर वो ईरान को थोड़ी बहुत छूट देने को तैयार थे, लेकिन ईरान ने बड़ी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। वेंस का कहना था कि उन्होंने ईरान को एक ‘ले लो या छोड़ दो’ वाला प्रस्ताव दिया था, जिसमें ईरान को अपना पूरा न्यूक्लियर प्रोग्राम हमेशा के लिए बंद करना था। लेकिन ईरान ने उसे ठुकरा दिया।
हालांकि, वेंस ने ज्यादा जानकारी नहीं दी, बस इतना कहा कि बातचीत खाली हाथ खत्म हुई। ईरानी विदेश मंत्रालय ने भी अपना बयान जारी कर कहा कि अपने देश के बड़े-बड़े बुजुर्गों, अपनों और नागरिकों की भारी नुकसान के बावजूद अब उनकी जिद और भी मजबूत हो गई है। वो अपने हितों और अधिकारों के लिए और भी कड़े रुख पर हैं।
न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब सारा फैसला राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के हाथ में है। वो इस वक्त फ्लोरिडा में अल्टीमेट फाइटिंग चैंपियनशिप मैच देखने गए हैं। व्हाइट हाउस के अधिकारी कह रहे हैं कि अगला कदम ट्रंप ही बताएंगे। लेकिन दोनों ही रास्ते आसान नहीं हैं।
एक तरफ लंबी बातचीत का रास्ता है, जो ट्रंप प्रशासन को बिल्कुल पसंद नहीं। दूसरी तरफ जंग फिर शुरू करने का विकल्प है, जो पहले ही 38 दिन चली थी। उसमें अमेरिका ने ईरान के मिसाइल स्टॉक, सैन्य ठिकानों और हथियार बनाने वाले प्लांट्स पर 13,000 से ज्यादा टारगेट्स पर हमले किए थे। पेंटागन के अनुसार ये हमले बड़े पैमाने पर थे। लेकिन ईरान ने झुकने से इनकार कर दिया।
ट्रंप को लगता था कि इतनी बड़ी सैन्य ताकत दिखाने के बाद ईरान मान जाएगा। लेकिन 38 दिन की जंग ने दोनों तरफ की जिद को और सख्त कर दिया।
ये अटकाव नया नहीं है। फरवरी के आखिर में जेनेवा में भी बातचीत फंस गई थी। तब स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर इस्लामाबाद में थे। ईरान ने कहा था कि वो कुछ सालों के लिए अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम अस्थायी तौर पर रोक देंगे, लेकिन अपने पास रखा हुआ करीब-करीब बम बनाने लायक यूरेनियम स्टॉक नहीं छोड़ेंगे और न ही अपनी जमीन पर यूरेनियम समृद्ध करने की क्षमता हमेशा के लिए छोड़ेंगे।
ईरान का तर्क है कि न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी (NTP) के सदस्य के तौर पर उनके पास ये अधिकार है। ईरान का दावा है कि वो कभी न्यूक्लियर हथियार नहीं बनाना चाहता है। लेकिन अमेरिका को ये बात ‘संकेत’ लगती है कि ईरान हमेशा हथियार बनाने का विकल्प खुला रखना चाहता है।
ओबामा काल में जो आखिरी बड़ा समझौता हुआ था, वो दो साल की बातचीत के बाद बना था। उसमें कई समझौते हुए थे जिसमें ईरान को थोड़ा स्टॉक रखने की इजाजत थी और 2030 तक कुछ पाबंदियां थीं। लेकिन अभी दोनों तरफ की जिद पहले जितनी ही सख्त है।
ईरान की तरफ से जारी बयान में सबसे पहले ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का जिक्र था। इसके बाद न्यूक्लियर का मुद्दा, युद्ध के नुकसान की भरपाई, सैंक्शन हटाने और पूरी जंग खत्म करने की बात आई। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद करना ईरान का सबसे ताकतवर हथियार साबित हुआ। जंग शुरू होने के बाद उन्होंने इसे बंद कर दिया, जिससे दुनिया के 20 प्रतिशत तेल की सप्लाई रुक गई।
दुनियाभर में इससे पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही हैं, खाद बनाने वाले फर्टिलाइजर की कमी हो रही है और सेमीकंडक्टर बनाने के लिए जरूरी हीलियम भी नहीं मिल पा रहा। दुनियाभर के शेयर बाजारों में उम्मीद थी कि कोई भी समझौता हो जाए तो अच्छा रहेगा, लेकिन अब दोबारा जंग छिड़ी तो स्थिति और खराब हो सकती है।
ट्रंप ने पिछले हफ्ते सीजफायर घोषित किया था। ये दो हफ्ते का नाजुक सीजफायर 21 अप्रैल को खत्म हो रहा है। अमेरिका की तरफ से दोबारा हमले की धमकी तो दी जा सकती है, लेकिन राजनीतिक रूप से ये ट्रंप के लिए आसान नहीं। ईरान इस बात को अच्छी तरह जानता है।
अमेरिका का मानना है कि उन्होंने इतने बड़े हमले करके ईरान को सबक सिखा दिया। ट्रंप कई बार कह चुके हैं कि वो जंग के विजेता हैं। उनके विशेष दूत स्टीव विटकोफ का कहना है कि अब ईरान को बस ‘समर्पण’ कर देना चाहिए।
दूसरी तरफ ईरान कह रहा है कि वो हमलों का सामना करके बच गए, इसलिए उन्होंने भी जीत हासिल की है। दोनों तरफ से कोई भी समझौते के मूड में नहीं दिख रहा। ईरान अब युद्ध की भरपाई, सारे सैंक्शन हटाने और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर पूरा नियंत्रण जैसे मुद्दे सामने रख रहा है। अमेरिका ने भरपाई देने से साफ इनकार कर दिया है और सैंक्शन सिर्फ धीरे-धीरे हटाने की बात कही है, वो भी तभी जब ईरान अपनी शर्तें पूरी करे। बातचीत के बाद अब सबकी नजरें ट्रंप पर हैं। 21 अप्रैल करीब आ रहा है और दोनों देश अभी भी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं।