शिक्षा

विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत आने से बढ़ेगी फैकल्टी डिमांड, वेतन और प्रतिस्पर्धा में आएगा उछाल

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2023 के नियमों ने विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में स्वायत्त परिसर स्थापित करने की अनुमति दी है

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अहोना मुखर्जी   
Last Updated- May 06, 2026 | 10:18 PM IST

विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में अपने परिसर खोलने से देश के उच्च शिक्षा क्षेत्र में फैकल्टी के लिए प्रतिस्पर्धा और वेतन और अन्य लाभ में इजाफा होने की संभावना है। हालांकि यह क्षेत्र पहले से ही शिक्षण कर्मचारियों की संरचनात्मक कमी का सामना कर रहा है। ​शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कार्याधिकारियों और सलाहकारों ने इसकी संभावना जताई।

ईवाई-पार्थेनन इंडिया में पार्टनर और एलऐंडडी प्रमुख अवंतिका तोमर ने अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई  2021-22) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में लगभग 4.3 करोड़ छात्र और करीब 16 लाख संकाय सदस्य या फैकल्टी हैं। जिसका अर्थ है प्रति 27 छात्र पर एक संकाय सदस्य। यह प्रति 20 छात्र पर 1 संकाय सदस्य के बेंचमार्क की तुलना में कम है। कुल मिलाकर देखें तो देश के उच्च ​शिक्षा क्षेत्र में करीब 6 लाख संकाय सदस्यों की कमी है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के डीम्ड विश्वविद्यालय विनियम, 2023 में शैक्षणिक क्षमता के लिए 1:20 के न्यूनतम छात्र-फैकल्टी अनुपात को बेंचमार्क के रूप में निर्धारित किया गया है। तोमर ने कहा कि विदेशी विश्वविद्यालय परिसरों से अगले दो से तीन वर्षों में 400 से 450 नए फैकल्टी पद सृजित होने की उम्मीद है और दाखिले बढ़ने के साथ 2035 तक इनकी संख्या 13,000 से 15,000 तक पहुंच जाएंगी। ये संस्थान प्रति 15 छात्र पर 1 फैकल्टी के साथ संचालित हो सकते हैं। ऐसे में इन्हें ज्यादा संकाय सदस्यों की जरूरत होगी। 

तोमर ने कहा, ‘आम तौर पर इनमें से 20 से 30 फीसदी विदेशी ​शिक्षक होंगे, जिनमें प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं जबकि शेष पद स्थानीय स्तर पर भरे जा सकते हैं।’ विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश से फैकल्टी, विशेष रूप से विशिष्ट और उद्योग-अनुकूल विषयों में मांग बढ़ने की उम्मीद है। एडनेक्स ग्लोबल के सह-संस्थापक और मुख्य कार्या​धिकारी आशीष गुप्ता ने कहा, ‘विदेशी विश्वविद्यालयों के आने से उच्च-गुणवत्ता वाली फैकल्टी की मांग बढ़ेगी, जिससे संभावित रूप से वेतन-पैकेज भी बढ़ सकता है।’ उन्होंने कहा कि भारत में पहले से ही उच्च शिक्षा के क्षेत्र में फैकल्टी की 30 से 35 फीसदी कमी बनी हुई है।

विदेशी संस्थान प्रतिभा को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी वेतन दे सकते हैं। तोमर ने कहा कि विदेशी विश्वविद्यालय अपनी फैकल्टी को प्रतिष्ठित भारतीय संस्थानों जैसे अशोका, प्लक्ष और क्रेया के समान वेतन की पेशकश कर सकते हैं, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) जैसे शीर्ष सार्वजनिक संस्थानों की तुलना में 30 से 40 फीसदी ज्यादा हो सकता है जबकि विदेशी फैकल्टी को इससे भी अ​धिक वेतन मिल सकता है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के 2023 के नियमों ने विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में स्वायत्त परिसर स्थापित करने की अनुमति दी है। अभी तक गिफ्ट सिटी में डीकिन यूनिवर्सिटी और वोलोंगोंग यूनिवर्सिटी तथा गुरुग्राम में साउथैम्प्टन यूनिवर्सिटी चालू हो चुकी हैं जबकि आगामी शैक्षणिक सत्र में कई सारे पाठ्यक्रम शुरू होने की उम्मीद है। 

हालांकि सरकारी संस्थानों में वेतन पर तत्काल प्रभाव सीमित हो सकता है क्योंकि वेतन-भत्ते केंद्रीय वेतन आयोग के अनुसार तय होते हैं। तोमर ने कहा कि नवंबर 2025 में गठित आठवें वेतन आयोग से वेतनमान में बदलाव हो सकता है और आम तौर पर 15 से 30 फीसदी की वृद्धि संभावित है।

जारो एजुकेशन की मुख्य कार्या​धिकारी रंजीता रमन ने कहा, ‘जैसे-जैसे पारिस्थितिकी तंत्र विकसित होता है, फैकल्टी वेतन-भत्ता अधिक संरचित और प्रतिस्पर्धी हो सकता है, खास तौर पर मजबूत अकादमिक और उद्योग पृष्ठभूमि वाले पेशेवरों के लिए।’ उन्होंने कहा कि संस्थान तेजी से अनुसंधान के अवसर, उद्योग एकीकरण और वैश्विक सहयोग की पेशकश कर रहे हैं।

रमन ने कहा, ‘भारतीय संस्थानों और विदेशों में वैश्विक परिसरों के बीच फैकल्टी वेतन में अंतर बना हुआ है, जो धन, अनुसंधान बुनियादी ढांचे और समग्र बाजार परिपक्वता में अंतर के कारण है। हालांकि भारत में विदेशी विश्वविद्यालय परिसर वै​श्विक स्तर के वेतन-भत्ते दे सकते हैं जिससे यह अंतर कुछ हद तक कम हो सकता है।’

हाल के वर्षों में भारत के उच्च शिक्षा प्रणाली में लगातार विस्तार हुआ है, जिसमें नामांकन में वृद्धि और विभिन्न विषयों में गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की मांग बढ़ रही है। साथ ही पर्याप्त फैकल्टी सुनिश्चित करना प्रमुख चुनौती बनी हुई है। 

प्रबंधन, अर्थशास्त्र, डेटा साइंस/एआई, और प्रौद्योगिकी-संबंधित क्षेत्रों में भर्ती की गतिशीलता के शुरुआती संकेत उभर रहे हैं। तोमर ने कहा, ‘इन विषयों के फैकल्टी को आकर्षक ऑफर मिल सकते हैं और वेतन में वृद्धि भी देखी जा सकती है।’ 

नोएडा अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय दा​खिले और आउटरीच के निदेशक सुधीर के पांडेय ने कहा, ‘इससे विश्वविद्यालयों के बीच सर्वश्रेष्ठ फैकल्टी के लिए अधिक प्रतिस्पर्धा हो सकती है और उच्च वेतन का भुगतान करना पड़ सकता है।’ उन्होंने कहा कि इससे संस्थानों को फैकल्टी विकास और सहयोग में निवेश करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा सकता है, जिससे शैक्षणिक मानकों में सुधार होगा।

First Published : May 6, 2026 | 10:13 PM IST