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वित्त वर्ष 2026 जाते-जाते तेल कीमतों का जोरदार झटका दे गया है। तेल में इस तरह का उतार-चढ़ाव पहले की घटनाओं से काफी अलग रहा है। पूरे साल कच्चे तेल की कीमतें ज्यादातर समय सीमित दायरे में ही रहीं। लेकिन फरवरी के आखिर से ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के युद्ध की वजह से तेल कीमतों में भारी उछाल आई है, जिससे दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं हिल गई हैं। इस समय तेल 105 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर है। मार्च में हुई 42 प्रतिशत की बढ़ोतरी इसकी कीमतों में मई 2020 के बाद से यानी लगभग 70 महीनों में हुई सबसे बड़ी मासिक वृद्धि है।
एक सामान्य आर्थिक परिदृश्य में तेल की ऊंची कीमतें महंगाई की आशंकाएं बढ़ाती हैं, जिससे सोने और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतों में इजाफा होता है क्योंकि निवेशक मुद्रास्फीति के जोखिम से बचने के लिए इनमें निवेश करते हैं। लेकिन वित्त वर्ष 2026 में विपरीत रुझान देखे गए। जब तेल की कीमतों पर दबाव था, तब भी सोने और चांदी की कीमतों में पूरे साल बढ़ोतरी होती रही। दोनों कीमती धातुओं में फिलहाल गिरावट के रुझान हैं, जबकि तेल की कीमतें एक महीने में लगभग दोगुनी हो गई हैं और इनमें अभी और तेजी की आशंका है।
इस युद्ध के परिणामस्वरूप ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में तनाव पैदा कर दिया है, जहां से वैश्विक तेल ढुलाई का पांचवां हिस्सा ढोया जाता है। अब कई देशों को उर्वरकों, गैस, जिसमें खाना पकाने वाली गैस भी शामिल है, की कमी का सामना करना पड़ रहा है। इस कारण घरेलू और व्यावसायिक दोनों उपयोगकर्ताओं को नुकसान हो रहा है। सबसे अधिक चोट छोटे उपयोगकर्ताओं को पहुंच रही है। कॉमट्रेंड्ज रिस्क मैनेजमेंट सर्विसेज के संस्थापक ज्ञानशेखर त्यागराजन बताते हैं, ‘युद्ध शुरू होने तक ऊर्जा क्षेत्र में अधिक आपूर्ति थी। ओपेक उत्पादक रूसी कच्चे तेल की आपूर्ति संबंधी समस्या के कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से बाजार को स्थिर करने के लिए तैयार थे। लेकिन पश्चिम एशिया युद्ध ने आपूर्ति समीकरण को फिर से रूस के पक्ष में कर दिया है। पूरे वर्ष भारत रूस से सस्ता तेल खरीदने का प्रमुख लाभार्थी रहा है।’
उन्होंने कहा कि इतनी ऊंची कीमत पर उपयोगकर्ताओं की मांग सस्ते और अधिक स्थिर ऊर्जा स्रोतों की ओर केंद्रित होने की संभावना है और जीवाश्म ईंधन की दीर्घकालिक मांग को नुकसान होगा।
वित्त वर्ष 2026 के अधिकांश समय में खाड़ी देशों पर अपनी कमाई बरकरार रखने के लिए तेल की कीमतों को स्थिर रखने का दबाव था। वैकल्पिक ऊर्जा बाजारों में तेजी से वृद्धि हुई है। भारत और अन्य जगहों पर मुद्रास्फीति से जुड़ी आशंकाएं मद्धम हो रही थीं। वर्ष के दौरान अमेरिका का टैरिफ युद्ध भी खतरे की तरह दिख रहा था, लेकिन बाजारों और अर्थव्यवस्थाओं ने इसके साथ जीना सीख लिया था। लेकिन, पश्चिम एशिया के युद्ध ने अचानक सब कुछ बदल दिया है।
केडिया एडवाइजरी के निदेशक अजय केडिया ने कहा कि पिछला तेल झटका वर्ष 2008 में लगा था। तृब मांग और वित्तीय प्रवाह के कारण कीमतें 147 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ गई थीं। लेकिन तब आपूर्ति व्यवधान नहीं हुआ था। इस तरह तब में और अब में अंतर है। इस बार, इस झटके के ढांचागत असर कहीं ज्यादा गहरे हैं। वैश्विक कर्ज का रिकॉर्ड स्तर, पहले से ही नाजुक सप्लाई चेन (महामारी के बाद) और उभरते बाजारों में बढ़ती अस्थिरता के चलते यह ऊर्जा संकट बहुतरफा बन गया है, जिसका असर तेल, गैस, एलएनजी, उर्वरक और माल ढुलाई, सभी पर एक साथ पड़ रहा है। यह सिर्फ ऊंची कीमतें ही नहीं हैं, बल्कि इनकी कमी और आपूर्ति में रुकावट भी बड़ी समस्या है, जो दुनिया भर के उपभोक्ताओं को परेशान कर
रही है।
फिर भी, इसमें ताज्जुब नहीं सजो वित्त वर्ष 2026 कमोडिटी निवेशकों के लिए अच्छे रिटर्न के साथ समाप्त हुआ है। साल के दौरान एलएमई (लंदन मेटल एक्सचेंज) मेटल इंडेक्स में 24.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जिसमें एल्युमीनियम, तांबा और टिन का अहम योगदान रहा। डब्ल्यूटीआई तेल की कीमतें अब एक साल पहले के मुकाबले 43 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई हैं। ये पहले 60 डॉलर से नीचे थीं (अक्टूबर-दिसंबर 2025 की अवधि में), लेकिन अब 100 डॉलर के ऊपर पहुंच गई हैं। ब्रेंट क्रूड में भी 60 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। वित्त वर्ष 2026 में भारतीय रुपया लगभग 10 प्रतिशत तक गिर गया है, जो 2012 के बाद अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में सबसे बड़ी गिरावट है।
वित्त वर्ष 2026 आखिरी तिमाही में बड़ी गिरावट के बावजूद सोने और चांदी के निवेशकों के लिए भी अच्छा रहा।