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खाद-ईंधन महंगा, कमजोर मौसम के आसार- 2026 में किसानों और बाजार दोनों पर दबाव की आहट

गांवों की मांग पर ब्रेक? कमजोर मानसून से FMCG और ऑटो सेक्टर पर असर

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देवव्रत वाजपेयी   
Last Updated- April 14, 2026 | 8:06 AM IST

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने 2026 में दोहरी चुनौती खड़ी हो सकती है। एक तरफ मानसून सामान्य से कमजोर रहने का अनुमान है, तो दूसरी तरफ खेती से जुड़े खर्च बढ़ रहे हैं। प्राइवेट एजेंसी स्काईमेट ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून को सामान्य से कम यानी 94 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। यह कमी एल नीनो की स्थिति बनने के कारण हो सकती है। अमेरिकी एजेंसी NOAA के अनुसार, मई से जुलाई के बीच एल नीनो बनने की 61 प्रतिशत संभावना है और यह साल के अंत तक जारी रह सकता है। अगर मानसून कमजोर रहता है, तो खासकर खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है। 2023 की तरह बारिश की कमी से उत्पादन घटने और ग्रामीण मांग कमजोर होने का खतरा बढ़ सकता है।

खेती पर बढ़ते खर्च का दबाव

ब्रोकरेज फर्म सिस्टमेटिक्स इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका-ईरान तनाव के कारण उर्वरक और ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ेगी। साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट में व्यवधान से खाद और कच्चे माल की सप्लाई पर भी असर पड़ा है। इसका असर कंपनियों पर भी दिखने लगा है और आगे खरीफ सीजन में यह दबाव और बढ़ सकता है।

मानसून कमजोर रहने और लागत बढ़ने से किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में मांग कमजोर पड़ने की आशंका है। इसका असर ट्रैक्टर, टू-व्हीलर, FMCG और अन्य उपभोक्ता सामानों की बिक्री पर पड़ सकता है।

कुछ सेक्टर को मिल सकता है सहारा

हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि गर्मी से जुड़े प्रोडक्ट्स जैसे आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स, जूस, कूलिंग ऑयल और सनस्क्रीन की मांग बनी रह सकती है। वहीं एयर कंडीशनर और फ्रिज जैसे प्रोडक्ट्स को भी फायदा मिल सकता है। दूसरी तरफ, होम इंसेक्टिसाइड और हॉट बेवरेज जैसे प्रोडक्ट्स की मांग पर असर पड़ सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार, जिन खाद कंपनियों के पास कच्चे माल की खुद की व्यवस्था है, वे बेहतर स्थिति में रह सकती हैं। इनमें कोरोमंडल इंटरनेशनल और पारादीप फॉस्फेट्स का नाम लिया गया है।

महंगाई और सरकारी खर्च पर दबाव

कमजोर मानसून और बढ़ती लागत से खाद्य महंगाई बढ़ सकती है। इससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, अगर वैश्विक कीमतें ऊंची रहीं तो उर्वरक सब्सिडी में 10,000 से 25,000 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त बोझ आ सकता है।

आगे क्या देखना होगा

रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में एल नीनो से जुड़े अपडेट और मौसम विभाग का आधिकारिक मानसून पूर्वानुमान काफी अहम होंगे। कुल मिलाकर, कमजोर मानसून और महंगे इनपुट की वजह से 2026 में ग्रामीण अर्थव्यवस्था, खेती और महंगाई के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)

First Published : April 14, 2026 | 8:06 AM IST