सिटी के निवेश बैंकिंग प्रमुख (एशिया-प्रशांत) कौस्तुभ कुलकर्णी
सिटी के निवेश बैंकिंग प्रमुख (एशिया-प्रशांत) कौस्तुभ कुलकर्णी का कहना है कि भारत के निवेश नैरेटिव पर फिलहाल आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) का प्रभाव हावी है जो वैश्विक बाजारों पर अपना वर्चस्व जमाए हुए है। उनसे समी मोडक और मनोजित साहा की बातचीत के मुख्य अंश:
रुपये पर हालिया दबाव और विदेशी निवेशकों द्वारा की गई बिकवाली का क्या कारण है?
साल 2024 और 2025 में अमेरिकी ब्याज दरों में तेज वृद्धि ने ब्याज दर अंतर को बढ़ा दिया है और पूंजी को वापस अमेरिका की ओर आकर्षित किया है। इस दौरान भारत में एफडीआई प्रवाह नरम रहा जबकि तेल और सोने जैसे आयात बिलों में वृद्धि हुई। निर्यात में उसी रफ्तार से वृद्धि नहीं हुई। जब किसी देश के बाहरी खाते पर ऐसे दबाव आते हैं तो सबसे पहले मुद्रा को उसे झेलना पड़ता है। रुपये का अवमूल्यन इन्हीं बातों को दर्शाता है।
क्या विदेशी पोर्टफोलियो की निकासी केवल अमेरिकी ब्याज दरों में वृद्धि का नतीजा है?
नहीं। दरें महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन आय वृद्धि की उम्मीदें भी मायने रखती हैं। वैश्विक परिदृश्य में काफी बदलाव आया है। निवेशक बाजारों में वृद्धि के अवसरों का आकलन कर रहे हैं। भारत में एफपीआई की बिकवाली देखी गई है लेकिन उसके पैमाने को समझना महत्त्वपूर्ण है। विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार में लगभग 800 से 850 अरब डॉलर का निवेश करते हैं। ऐसे में सालाना करीब 25 अरब डॉलर की निकासी सार्थक है लेकिन बहुत अधिक नहीं। दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों में भी इसी तरह की या इससे भी बड़ी निकासी हुई है मगर वहां के बाजारों में अधिक उथल-पुथल नहीं हुआ क्योंकि घरेलू तरलता मजबूत बनी हुई है।
विदेशी निवेशक भारत के बारे में क्या बताते हैं?
भारत में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है लेकिन वैश्विक बातचीत पर एआई हावी है। निवेशक अमेरिका, कोरिया, जापान और चीन में एआई संबंधी अवसरों से काफी रिटर्न हासिल कर रहे हैं। जाहिर तौर पर वे पूछते हैं कि भारत के जरिये एआई में कैसे भाग लिया जा सकता है। मगर भारत में निवेश मामला एक समय बुनियादी बातों की ओर वापस लौटेगा। लगातार 15 से 20 फीसदी आय वृद्धि दर्ज करने वाली कंपनियां पूंजी आकर्षित करती रहेंगी।
आय वृद्धि को आप कैसे देखते हैं?
वृद्धि को नई रफ्तार मिलने में थोड़ा वक्त लग सकता है। कंपनियां बढ़ती लागत, मुद्रास्फीति और ईंधन कीमतों में तेजी के दबाव से जूझ रही हैं। आपूर्ति श्रृंखला में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। अवसरों को भुनाने की क्षमता इस बात पर निर्भर करेगी कि व्यापक परिवेश कितनी कुशलता से प्रतिक्रिया करता है। सवाल यह है कि क्या भारत मध्यावधि में 15 फीसदी आय वृद्धि जारी रख सकता है। अगर हां, तो बाजार में अंतत: उसकी झलक दिखेगी। अगर वृद्धि दर कम रही है तो मूल्यांकन के समायोजन में वक्त लग सकता है।
भारत में इस साल दो बड़े आईपीओ आए। बाजार को आप किस प्रकार देखते हैं?
आईपीओ की संभावित सूची दमदार है। मगर सबसे अहम मुद्दा जारीकर्ताओं और निवेशकों के बीच मूल्यांकन की एकरूपता का है। कई कंपनियों पर पूंजी जुटाने या हिस्सेदारी को भुनाने का तत्काल कोई दबाव नहीं है। मौजूदा शेयरधारकों को काफी मुनाफा हो चुका है। इसका मतलब यह है कि वे सही बाजार परिदृश्य का इंतजार कर सकते हैं।
साथ ही घरेलू म्युचुअल फंड में लगातार भारी निवेश दिख रहा है जो शेयर बाजार को काफी सहारा दे रहा है। इस समय बाजार कई अनिश्चितताओं का एक साथ सामना कर रहा है जिनमें भू-राजनीति, टैरिफ, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और वैश्विक वृद्धि संबंधी चिंताएं शामिल हैं। इन चीजों के स्थिर होने पर मूल्यांकन के बारे में जारीकर्ताओं और निवेशकों के बीच बातचीत सीधी हो जाएगी जिससे बड़े आईपीओ के लिए माहौल बेहतर बनेगा।
ताइवान व दक्षिण कोरिया जैसे बाजारों ने निवेशकों का ध्यान क्यों आकर्षित किया है?
विनिर्माण आधारित अर्थव्यवस्थाओं को आर्टिफिशल इंटेलिजेंस और डेटा केंद्रों से जुड़े वैश्विक पूंजीगत व्यय में वृद्धि का जबरदस्त फायदा हुआ है। जब इन क्षेत्रों में वैश्विक निवेश कई लाख करोड़ डॉलर में होता है तो विनिर्माण आपूर्ति श्रृंखलाओं में शामिल देशों में मांग नाटकीय तौर पर बढ़ जाती है। भारत का वृद्धि मॉडल पारंपरिक तौर पर काफी हद तक सेवाओं से संचालित रहा है।
एआई की लहर ने एशिया के कुछ हिस्सों में विनिर्माण परिवेश को मजबूत किया है और कुछ सेवा आधारित व्यापार मॉडल के भविष्य के अर्थशास्त्र पर सवाल उठाए हैं। मगर तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत में अवसर पहले से कहीं अधिक बड़ा है। भारत में आज काफी तरलता, दमदार बैंकिंग प्रणाली, कंपनियों के मजबूत बहीखाते, कार्यशील पूंजी बाजार, प्रशासन मानकों में सुधार व भरोसेमंद कानूनी ढांचा है।
क्या भारत चीन प्लस वन अवसर से चूक गया है?
पिछले दो वर्षों के दौरान चीन प्लस वन निवेश का बड़ा हिस्सा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में गया है। कारण यह है कि चीन प्लस वन की कई रणनीतियों को चीनी कंपनियों द्वारा आपूर्ति श्रृंखला में विविधीकरण की तलाश में खुद लागू किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत-चीन भू-राजनीतिक संबंधों के मद्देनजर भारत हमेशा उन कंपनियों के लिए पूंजी निवेश का सबसे आसान गंतव्य नहीं रहा है। मगर अब वह समीकरण बदल रहा है और इसलिए चीन प्लस वन का आकलन फिलहाल छह महीने या दो साल पहले के मुकाबले अलग तरह से किया जाना चाहिए।
क्या भारत बेहतर प्रदर्शन जारी रख सकता है?
भारत का बाजार आखिरकार घरेलू आय वृद्धि पर निर्भर करता है। देश का निवेश मामला घरेलू खपत, घरेलू खर्च और व्यापक घरेलू अर्थव्यवस्था द्वारा संचालित होता है।