वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब शेयर बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। ईरान से जुड़े युद्ध की आशंका और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने निवेशकों को कई उद्योगों के बारे में दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। पहले जहां चिंता केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित मानी जा रही थी, वहीं अब इसके प्रभाव का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। फूड डिलीवरी कंपनियों से लेकर कॉस्मेटिक्स और कपड़ा उद्योग तक कई सेक्टर संभावित सप्लाई बाधाओं और बढ़ती लागत के दबाव में आ सकते हैं।
दरअसल, युद्ध शुरू होने के बाद से वैश्विक शेयर बाजारों में करीब 5.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट 2022 के बाद किसी एक महीने में सबसे बड़ी मानी जा रही है। एशियाई बाजारों पर इसका असर सबसे अधिक देखा गया है। निवेशकों को डर है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई फिर से बढ़ सकती है और युद्ध पर होने वाला खर्च कई देशों के बजट घाटे को भी बढ़ा सकता है।
बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के कारण ट्रेडर्स ने अब अमेरिका के केंद्रीय बैंक, यानी Federal Reserve द्वारा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद को भी आगे खिसका दिया है। अब अनुमान लगाया जा रहा है कि अगली बड़ी दर कटौती संभवतः 2027 के मध्य तक ही हो पाएगी। इस बदलाव ने भी वैश्विक निवेशकों की रणनीति को प्रभावित किया है।
किन सेक्टरों पर पड़ा सबसे ज्यादा असर
युद्ध के कारण सबसे पहले असर एयरलाइंस और शिपिंग कंपनियों पर पड़ा है। तेल की कीमतें बढ़ने से विमानन कंपनियों की ईंधन लागत बढ़ जाती है, जिससे उनके मुनाफे पर दबाव आता है। इसी तरह समुद्री परिवहन कंपनियों के लिए भी ऑपरेशन महंगे हो जाते हैं और व्यापारिक मार्गों में जोखिम बढ़ जाता है।
इसके विपरीत रक्षा और ऊर्जा कंपनियों के शेयरों में तेजी देखी जा रही है। युद्ध और तनाव के दौर में रक्षा उपकरणों की मांग बढ़ने की संभावना रहती है, जिससे रक्षा कंपनियों के शेयरों को फायदा मिलता है। वहीं तेल और गैस कंपनियां भी ऊंची कीमतों का लाभ उठा सकती हैं।
सप्लाई चेन पर बढ़ता खतरा
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब अमेरिका ने उस द्वीप पर बड़ा हमला किया, जहां से ईरान के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा निर्यात होता है। इस घटना के बाद मध्य पूर्व क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ गई है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक तेल और गैस बाजार में आपूर्ति और मांग के बीच असंतुलन पैदा हो सकता है।
इसी वजह से निवेशकों की नजर अब उन सेक्टरों पर भी जा रही है जिन्हें पहले इस संकट से ज्यादा प्रभावित नहीं माना जा रहा था। उदाहरण के तौर पर सेमीकंडक्टर कंपनियां और कपड़ा उद्योग भी जोखिम में आ सकते हैं। हीलियम जैसी गैसों की कमी से चिप निर्माण प्रभावित हो सकता है, जबकि कच्चे माल की कीमत बढ़ने से कपड़ा कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
युद्ध के असर से चिप उद्योग पर बढ़ी चिंता, आपूर्ति और लागत को लेकर निवेशकों की नजर
वैश्विक स्तर पर जारी संघर्ष का असर अब विभिन्न उद्योगों पर दिखाई देने लगा है। खास तौर पर सेमीकंडक्टर यानी चिप बनाने वाली कंपनियां निवेशकों के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती मांग के कारण पिछले कुछ समय से चिप उद्योग तेज गति से आगे बढ़ रहा था, लेकिन मौजूदा युद्ध की स्थिति ने इसकी सप्लाई चेन और लागत पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
हाल ही में ईरान के ड्रोन हमले के बाद कतर के एक बड़े तरलीकृत प्राकृतिक गैस संयंत्र को बंद करना पड़ा। आर्थिक विश्लेषण संस्था ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स के अनुसार इस घटना के कारण दुनिया के कुल हीलियम उत्पादन का लगभग एक तिहाई हिस्सा अस्थायी रूप से बंद हो गया है। हीलियम चिप निर्माण प्रक्रिया में बेहद महत्वपूर्ण गैस मानी जाती है और इसका कोई आसान विकल्प उपलब्ध नहीं है।
ब्लूमबर्ग इंटेलिजेंस के विश्लेषक माइकल डेंग का कहना है कि हीलियम की आपूर्ति में कमी से चिप बनाने वाली कंपनियों के उत्पादन पर दबाव पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि सेमीकंडक्टर निर्माण में हीलियम एक जरूरी घटक है और इसके बिना उत्पादन प्रक्रिया को सुचारु रखना मुश्किल हो सकता है।
हीलियम की संभावित कमी के अलावा ऊर्जा की बढ़ती कीमतें भी इस उद्योग के लिए नई चुनौती बन सकती हैं। ऊर्जा महंगी होने से एआई डेटा सेंटरों के संचालन की लागत बढ़ जाएगी। इससे चिप की मांग पर असर पड़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
बाजार में इसका असर भी दिखाई देने लगा है। अमेरिका का फिलाडेल्फिया स्टॉक एक्सचेंज सेमीकंडक्टर इंडेक्स संघर्ष शुरू होने के बाद से पांच प्रतिशत से अधिक गिर चुका है। वहीं एशिया की प्रमुख चिप कंपनियों के शेयरों में भी गिरावट दर्ज की गई है। इनमें सैमसंग इलेक्ट्रॉनिक्स, एसके हाइनिक्स और ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी शामिल हैं।
दूसरी ओर हीलियम उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को इस स्थिति से लाभ मिला है। भारत में हीलियम निर्माता लिंडे इंडिया के शेयरों में इस दौरान तेजी देखी गई है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञ फिलहाल स्थिति को बहुत गंभीर नहीं मानते। यूबीएस ग्रुप के विश्लेषक सनी लिन का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हीलियम की आपूर्ति अपेक्षाकृत अधिक रही है और कई कंपनियां अलग-अलग स्रोतों से इसकी खरीद करती हैं। ऐसे में मुनाफे पर तत्काल बड़ा असर पड़ने की संभावना कम है।
जेफरीज के विश्लेषक विलियम बीविंगटन के अनुसार ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी के पास लगभग छह महीने का सुरक्षा स्टॉक मौजूद है। उनके मुताबिक निकट भविष्य में हीलियम की कमी कंपनी के लिए बड़ी समस्या बनने की संभावना नहीं है।
हालांकि सभी विशेषज्ञ इतने आश्वस्त नहीं हैं। ऑलस्प्रिंग ग्लोबल इन्वेस्टमेंट्स के फंड मैनेजर गैरी टैन का कहना है कि सेमीकंडक्टर आपूर्ति में संभावित बाधा को अभी बाजार पूरी तरह से समझ नहीं पा रहा है। उनके अनुसार सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन प्लांट दुनिया के सबसे अधिक ऊर्जा खपत करने वाले औद्योगिक संयंत्रों में शामिल हैं। साथ ही ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे देश तरलीकृत प्राकृतिक गैस पर काफी हद तक निर्भर हैं, इसलिए ऊर्जा आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा से उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
इस तरह वैश्विक संघर्ष ने सेमीकंडक्टर उद्योग के सामने नई अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं। आने वाले समय में ऊर्जा आपूर्ति और कच्चे माल की उपलब्धता इस उद्योग की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
गैस की कमी से फूड डिलीवरी और ऑटो सेक्टर पर दबाव, इलेक्ट्रिक कुकटॉप कंपनियों को फायदा
भारत अपनी अधिकांश एलपीजी और कुकिंग गैस की जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी करता है। हालिया परिस्थितियों के कारण गैस की उपलब्धता में कमी आई है, जिससे घरेलू बाजार में कुकिंग गैस की कमी की आशंका बढ़ गई है।
गैस की कमी से रेस्टोरेंट और फूड डिलीवरी सेक्टर प्रभावित
गैस आपूर्ति में बाधा का सीधा असर होटल और रेस्टोरेंट उद्योग पर पड़ रहा है। कई स्थानीय रेस्टोरेंट अब अपने कामकाजी समय को कम करने और मेन्यू में उपलब्ध व्यंजनों की संख्या घटाने पर विचार कर रहे हैं, ताकि सीमित गैस आपूर्ति के साथ काम चलाया जा सके।
इस स्थिति का असर फूड डिलीवरी कंपनियों के कारोबार पर भी पड़ सकता है। यदि रेस्टोरेंट कम समय के लिए खुलेंगे या सीमित व्यंजन उपलब्ध कराएंगे तो ऑनलाइन ऑर्डर की संख्या भी घट सकती है।
बाजार में इस आशंका का असर निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ा है। इसके चलते Eternal Ltd., Swiggy Ltd. और Jubilant FoodWorks Ltd. जैसी कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई है। यह कंपनियां फूड डिलीवरी और रेस्टोरेंट संचालन से जुड़ी हैं।
इलेक्ट्रिक कुकटॉप बनाने वाली कंपनियों को मिल रहा लाभ
दूसरी ओर, गैस की संभावित कमी के कारण उपभोक्ता अब वैकल्पिक विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। इनमें सबसे प्रमुख विकल्प इलेक्ट्रिक कुकटॉप हैं।
इस बदलाव का फायदा ऐसे उपकरण बनाने वाली कंपनियों को मिल रहा है। बाजार में TTK Prestige Ltd. और Stove Kraft Ltd. के शेयरों में तेजी देखी जा रही है। निवेशकों को उम्मीद है कि गैस की कमी बढ़ने पर इलेक्ट्रिक कुकिंग उपकरणों की मांग में तेजी आ सकती है।
अमेरिका में राइड-शेयरिंग कंपनियों पर ईंधन महंगा होने का दबाव
ऊर्जा संकट का असर केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका में भी राइड-शेयरिंग और फूड डिलीवरी कंपनियां इस स्थिति से प्रभावित हो सकती हैं।
विश्लेषकों के अनुसार ड्राइवरों के लिए ईंधन सबसे बड़ा परिवर्तनीय खर्च होता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेजी आने पर इन कंपनियों के संचालन की लागत बढ़ जाती है।
अमेरिका की प्रमुख कंपनियां जैसे Uber Technologies Inc., DoorDash Inc. और Lyft Inc. इस स्थिति के प्रति काफी संवेदनशील मानी जाती हैं। तेल की कीमतों में उछाल आने पर इन कंपनियों की सेवाओं की लागत बढ़ सकती है और मांग पर भी असर पड़ सकता है।
ऑटोमोबाइल कंपनियों पर भी पड़ सकता है असर
ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर ऑटोमोबाइल उद्योग पर भी पड़ने की संभावना है। जब पेट्रोल और डीजल महंगे होते हैं तो उपभोक्ता नए वाहन खरीदने के फैसले को टाल सकते हैं। इससे कार निर्माताओं की बिक्री प्रभावित हो सकती है।
विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका की बड़ी ऑटो कंपनी Ford Motor Co. इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती है, क्योंकि उसकी आय का बड़ा हिस्सा ज्यादा ईंधन खपत करने वाले पिकअप ट्रकों की बिक्री से आता है।
मध्य पूर्व बाजार पर निर्भर कंपनियों की चिंता बढ़ी
मध्य पूर्व कई वैश्विक ऑटो कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण बाजार है। जापान की Toyota Motor Corp. की कुल बिक्री का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है, जबकि दक्षिण कोरिया की Hyundai Motor Co. के लिए यह आंकड़ा करीब 10 प्रतिशत है।
हाल के दिनों में निवेशकों की चिंता बढ़ने के कारण इस महीने हुंडई के शेयरों में करीब 23 प्रतिशत तक गिरावट आई है, जबकि टोयोटा के शेयर लगभग 12 प्रतिशत नीचे आ चुके हैं।
चीनी ऑटो निर्यात पर भी मंडरा रहा खतरा
मध्य पूर्व हाल के वर्षों में चीनी ऑटोमोबाइल कंपनियों के लिए तेजी से बढ़ता हुआ निर्यात बाजार बन गया है। यदि क्षेत्र में संघर्ष लंबा खिंचता है तो इन कंपनियों के निर्यात पर भी असर पड़ सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार Anhui Jianghuai Automobile Group Corp. की बिक्री का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा इस क्षेत्र से जुड़ा है, इसलिए उस पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ने की संभावना है। इसके अलावा SAIC Motor Corp., Chery Automobile Co., Chongqing Changan Automobile Co. और Great Wall Motor Co. जैसी कंपनियां भी जोखिम में हैं।
होरमुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता बढ़ा रही चिंता
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संघर्ष के कारण Strait of Hormuz में आवाजाही बाधित होती है तो इसका वैश्विक व्यापार पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। यह मार्ग मध्य पूर्व से वाहनों और ऑटो पार्ट्स की शिपमेंट के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
यदि यहां से जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है तो वाहनों की आपूर्ति में देरी, लॉजिस्टिक्स लागत में बढ़ोतरी और बिक्री में गिरावट जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
वैश्विक बाजारों पर नजर
कुल मिलाकर मध्य पूर्व में जारी तनाव केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं है। इसका असर फूड डिलीवरी, किचन उपकरण, राइड-शेयरिंग और ऑटोमोबाइल जैसे कई उद्योगों पर दिखाई देने लगा है। यदि यह संकट लंबे समय तक बना रहता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और बाजारों पर इसका दबाव और बढ़ सकता है।
तेल की बढ़ती कीमतों का रिटेल सेक्टर पर दबाव, कपड़ा कंपनियों के शेयरों में गिरावट
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में हो रही तेजी का असर अब खुदरा कारोबार यानी रिटेल सेक्टर पर भी साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ती तेल कीमतों के कारण कंपनियों की वितरण लागत बढ़ रही है। साथ ही उपभोक्ताओं की खर्च करने की क्षमता पर भी असर पड़ रहा है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इसका असर रिटेल कंपनियों की बिक्री और मुनाफे दोनों पर पड़ सकता है।
निवेश विश्लेषक जॉन जोलिडिस, जो निवेश कंपनी क्वो वाडिस कैपिटल के अध्यक्ष और संस्थापक हैं, के अनुसार रिटेल सेक्टर इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ तेल महंगा होने से माल की ढुलाई और वितरण की लागत बढ़ रही है। दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को पेट्रोल और डीजल पर अधिक खर्च करना पड़ रहा है, जिससे उनके पास अन्य वस्तुओं पर खर्च करने के लिए कम पैसा बच रहा है। इसका सीधा असर कपड़ों, लाइफस्टाइल और अन्य गैर जरूरी उत्पादों की मांग पर पड़ रहा है।
इसी वजह से अमेरिका में सूचीबद्ध कई बड़े रिटेल ब्रांड्स के शेयरों में इस महीने तेज गिरावट देखने को मिली है। प्रमुख परिधान कंपनियों जैसे लुलुलेमन एथलेटिका, नाइकी, मैसीज और आरएच के शेयरों में दो अंकों की गिरावट दर्ज की गई है। निवेशक इन कंपनियों के भविष्य के मुनाफे को लेकर सतर्क नजर आ रहे हैं, क्योंकि बढ़ती लागत और कमजोर होती उपभोक्ता मांग दोनों ही इनके कारोबार को प्रभावित कर सकते हैं।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल रिटेल कंपनियों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव कपड़ा उद्योग की सप्लाई चेन पर भी पड़ रहा है, खासकर चीन के परिधान निर्माताओं पर। कपड़ा उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कई रासायनिक फाइबर जैसे पॉलिएस्टर और एक्रिलिक कच्चे तेल से तैयार होते हैं। ऐसे में तेल महंगा होने से इन कच्चे माल की लागत भी बढ़ने की आशंका है।
चीन की कुछ प्रमुख टेक्सटाइल कंपनियों के शेयरों में भी हाल के दिनों में उतार चढ़ाव देखा गया है। टेक्सटाइल सामग्री बनाने वाली कंपनी हुआफू फैशन और परिधान निर्माता यंगोर फैशन के शेयर निवेशकों की चिंताओं के कारण अस्थिर बने हुए हैं। निवेशक यह आकलन करने की कोशिश कर रहे हैं कि कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का इन कंपनियों के मुनाफे पर कितना असर पड़ेगा।
उर्वरक और रसायन उद्योग पर बढ़ता दबाव, कीमतों में उछाल की आशंका
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में पैदा हुए तनाव का असर अब वैश्विक उर्वरक और रसायन उद्योग पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबी चली तो दुनिया भर में कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित होगी और कीमतों में तेज वृद्धि देखने को मिल सकती है।
उर्वरक उद्योग पर प्रभाव
विश्लेषकों के अनुसार दुनिया में इस्तेमाल होने वाले उर्वरकों के लिए आवश्यक कच्चे माल का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। यह मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा वैश्विक बाजारों में असंतुलन पैदा कर सकती है।
विश्लेषण संस्था Morningstar DBRS की विश्लेषक Andrea Petroczi-Urban का कहना है कि इस समुद्री मार्ग में रुकावट के कारण उर्वरक उत्पादन से जुड़ी कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और इससे खासतौर पर उत्तर अमेरिका में उर्वरकों की कीमतों में तेजी आने की संभावना है।
इस संभावित आपूर्ति संकट को देखते हुए निवेशकों ने उर्वरक उत्पादक कंपनियों के शेयरों में खरीदारी बढ़ा दी है। कनाडा की कंपनी Nutrien Ltd. और अमेरिका की The Mosaic Co. के शेयरों में हाल के दिनों में तेजी दर्ज की गई है। निवेशकों का मानना है कि यदि वैश्विक आपूर्ति घटती है तो इन कंपनियों की मांग और मुनाफा दोनों बढ़ सकते हैं।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चिंता
इसके विपरीत एशिया-प्रशांत क्षेत्र के कई देश मध्य पूर्व से उर्वरकों के आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं। इसी वजह से यहां की कंपनियों पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। वित्तीय संस्था Morgan Stanley के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस स्थिति से Australia विशेष रूप से प्रभावित हो सकता है।
ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख उर्वरक कंपनी Dyno Nobel Ltd. के शेयर इस महीने लगभग 9 प्रतिशत गिर चुके हैं। वहीं कृषि रसायन क्षेत्र की कंपनी Nufarm Ltd. के शेयरों में भी करीब 4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।
भारत में भी बढ़ी चिंता
इस संकट का असर India में भी दिखाई दे रहा है। भारत की कृषि व्यवस्था उर्वरकों पर काफी निर्भर है और गैस की आपूर्ति में बाधा आने से उर्वरक उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। इसी वजह से भारतीय अधिकारियों ने China से कुछ यूरिया खेपों की बिक्री की अनुमति देने का अनुरोध किया है।
इस अनिश्चितता का असर भारतीय उर्वरक कंपनियों के शेयरों पर भी पड़ा है। उदाहरण के तौर पर Rashtriya Chemicals & Fertilizers Ltd. के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई है।
रसायन उद्योग पर भी दबाव
संघर्ष का असर वैश्विक रसायन उद्योग पर भी पड़ रहा है। विश्लेषण संस्था KeyBanc Capital Markets के विश्लेषक Aleksey Yefremov के मुताबिक इस स्थिति के कारण दुनिया में एथिलीन और पॉलीएथिलीन की कुल आपूर्ति का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हो रहा है।
आपूर्ति में कमी के कारण अमेरिका की रसायन कंपनियों को लाभ मिलने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि Dow Inc. और LyondellBasell Industries NV जैसी कंपनियों के मार्जिन बेहतर हो सकते हैं क्योंकि वैश्विक बाजार में इन उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
दूसरी ओर चीन की कुछ रसायन कंपनियों के शेयरों में तेज उछाल देखा गया है। Hebei Jinniu Chemical Industry Co. के शेयर युद्ध शुरू होने के बाद से लगभग 80 प्रतिशत तक बढ़ चुके हैं। कई कंपनियों ने कच्चे माल की लागत बढ़ने के कारण अपने उत्पादों की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की घोषणा की है।
एथिलीन की कमी से कई उद्योग प्रभावित
हॉर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान के कारण एथिलीन के उत्पादन और आपूर्ति में भी बाधा आ रही है। एथिलीन एक महत्वपूर्ण रसायन है जिसका उपयोग प्लास्टिक, डिटर्जेंट, पॉलिएस्टर, पेंट और कई अन्य उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। इसकी कीमतों में बढ़ोतरी का असर अनेक उद्योगों पर पड़ना तय माना जा रहा है।
यूरोप में सौंदर्य प्रसाधन उद्योग की कई बड़ी कंपनियां प्लास्टिक पैकेजिंग पर निर्भर हैं। इसलिए L’Oréal SA और LVMH जैसी कंपनियों पर भी लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है।
पेंट उद्योग के लिए भी चुनौती
पेंट उद्योग भी इस संकट से अछूता नहीं है क्योंकि इसके अधिकांश कच्चे माल तेल से तैयार होते हैं। ब्रोकरेज फर्म ICICI Securities का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर रहती है तो कंपनियों को अपने मुनाफे को बचाने के लिए कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।
उदाहरण के तौर पर भारत की प्रमुख पेंट कंपनी Asian Paints Ltd. को अपने मार्जिन को सुरक्षित रखने के लिए लगभग 22 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं।
वैकल्पिक ऊर्जा कंपनियों में बढ़ी दिलचस्पी
वैश्विक स्तर पर गहराते तेल संकट का असर कई उद्योगों और शेयर बाजार के अलग-अलग सेक्टरों पर दिखाई देने लगा है। जहां एक ओर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से कुछ उद्योगों के लिए अवसर पैदा हो रहे हैं, वहीं कई कंपनियों के सामने लागत बढ़ने और मांग घटने जैसी चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का असर ऊर्जा, निर्माण, धातु और ऑटो से जुड़े उद्योगों पर अलग-अलग तरीके से पड़ रहा है।
वैकल्पिक ऊर्जा कंपनियों की मांग बढ़ी
तेल संकट के कारण अब निवेशकों का ध्यान तेजी से वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, लिथियम बैटरी और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी फिर से बढ़ती दिखाई दे रही है।
इसका असर शेयर बाजार में भी दिख रहा है। पवन टरबाइन बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में हाल के दिनों में अच्छी बढ़त दर्ज की गई है। इसी तरह बैटरी निर्माण से जुड़ी बड़ी कंपनियों के शेयर भी तेजी से ऊपर गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण कई देश ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक ऊर्जा को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे इस क्षेत्र की कंपनियों को दीर्घकाल में फायदा मिल सकता है।
अमेरिकी हाउसिंग सेक्टर पर दबाव
दूसरी ओर अमेरिका के हाउसिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। दरअसल ब्याज दरों में संभावित कटौती की उम्मीद कम होने से बंधक ऋण यानी मॉर्गेज दरों के बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। इसका असर घर खरीदने की क्षमता और उपभोक्ताओं के भरोसे पर पड़ सकता है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की 10 वर्षीय यील्ड बढ़ती है तो इससे मॉर्गेज दरें भी ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में घर खरीदने वाले लोगों की संख्या कम हो सकती है और निर्माण क्षेत्र की कंपनियों की मांग प्रभावित हो सकती है।
निर्माण से जुड़ी कई कंपनियों को बढ़ती ब्याज दरों के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें बढ़ने से निर्माण सामग्री बनाने वाली कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।
चीनी उद्योग को मिल सकता है फायदा
तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारत के चीनी उद्योग पर सकारात्मक भी हो सकता है। दरअसल भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति लागू है और इसका बड़ा हिस्सा चीनी मिलों से आता है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो एथेनॉल की मांग और कीमत दोनों में वृद्धि हो सकती है। इससे चीनी मिलों को अतिरिक्त आय मिलने की संभावना रहती है। इसी वजह से बाजार में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चीनी कंपनियों को इस स्थिति से लाभ मिल सकता है।
टायर कंपनियों पर लागत का दबाव
हालांकि टायर उद्योग के लिए स्थिति उतनी अनुकूल नहीं है। टायर निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक रबर और कई अन्य रसायन कच्चे तेल के उप-उत्पाद होते हैं। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इन कच्चे माल की लागत भी बढ़ जाती है।
इसके कारण टायर कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। बाजार में इस आशंका के कारण कई टायर कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली है।
धातु उद्योग पर भी असर
मध्य पूर्व क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन में आ रही बाधाओं का असर धातु उद्योग पर भी पड़ रहा है। फारस की खाड़ी क्षेत्र वैश्विक एल्यूमिनियम उत्पादन का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करता है। हाल के दिनों में एल्यूमिनियम की कीमतें चार साल के उच्च स्तर तक पहुंच गई थीं।
कुछ एल्यूमिनियम स्मेल्टरों को प्राकृतिक गैस की कमी के कारण उत्पादन कम करना पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर किसी एल्यूमिनियम प्लांट को बंद करना पड़ता है तो उसे दोबारा पूरी क्षमता से चालू होने में तीन से छह महीने तक का समय लग सकता है। इसलिए इस क्षेत्र में आने वाला प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है।
इस बीच अमेरिका की कुछ एल्यूमिनियम कंपनियों को ऊंची कीमतों का फायदा मिल रहा है क्योंकि उनके उत्पादन पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। बढ़ती धातु कीमतों से उनकी आय में सुधार की संभावना जताई जा रही है।
आगे क्या रह सकता है असर
विशेषज्ञों का मानना है कि तेल संकट का असर केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के कई सेक्टरों पर अलग-अलग रूप में दिखाई देगा। जहां कुछ उद्योगों को नई संभावनाएं मिल सकती हैं, वहीं कई क्षेत्रों को लागत और मांग से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो वैकल्पिक ऊर्जा, जैव ईंधन और धातु उद्योग में निवेश और गतिविधियां और तेज हो सकती हैं। वहीं निर्माण, ऑटो और उपभोक्ता मांग से जुड़े क्षेत्रों में सावधानी बरतने की जरूरत पड़ सकती है।
वैकल्पिक ऊर्जा कंपनियों में बढ़ी दिलचस्पी
वैश्विक स्तर पर गहराते तेल संकट का असर कई उद्योगों और शेयर बाजार के अलग-अलग सेक्टरों पर दिखाई देने लगा है। जहां एक ओर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से कुछ उद्योगों के लिए अवसर पैदा हो रहे हैं, वहीं कई कंपनियों के सामने लागत बढ़ने और मांग घटने जैसी चुनौतियां भी खड़ी हो सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति का असर ऊर्जा, निर्माण, धातु और ऑटो से जुड़े उद्योगों पर अलग-अलग तरीके से पड़ रहा है।
वैकल्पिक ऊर्जा कंपनियों की मांग बढ़ी
तेल संकट के कारण अब निवेशकों का ध्यान तेजी से वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर बढ़ रहा है। पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, लिथियम बैटरी और ऊर्जा भंडारण प्रणालियों से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी फिर से बढ़ती दिखाई दे रही है।
इसका असर शेयर बाजार में भी दिख रहा है। पवन टरबाइन बनाने वाली कंपनियों के शेयरों में हाल के दिनों में अच्छी बढ़त दर्ज की गई है। इसी तरह बैटरी निर्माण से जुड़ी बड़ी कंपनियों के शेयर भी तेजी से ऊपर गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण कई देश ऊर्जा सुरक्षा के लिए वैकल्पिक ऊर्जा को ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे इस क्षेत्र की कंपनियों को दीर्घकाल में फायदा मिल सकता है।
अमेरिकी हाउसिंग सेक्टर पर दबाव
दूसरी ओर अमेरिका के हाउसिंग सेक्टर पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। दरअसल ब्याज दरों में संभावित कटौती की उम्मीद कम होने से बंधक ऋण यानी मॉर्गेज दरों के बढ़ने की आशंका बढ़ गई है। इसका असर घर खरीदने की क्षमता और उपभोक्ताओं के भरोसे पर पड़ सकता है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की 10 वर्षीय यील्ड बढ़ती है तो इससे मॉर्गेज दरें भी ऊपर जा सकती हैं। ऐसे में घर खरीदने वाले लोगों की संख्या कम हो सकती है और निर्माण क्षेत्र की कंपनियों की मांग प्रभावित हो सकती है।
निर्माण से जुड़ी कई कंपनियों को बढ़ती ब्याज दरों के कारण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतें बढ़ने से निर्माण सामग्री बनाने वाली कंपनियों की लागत भी बढ़ सकती है।
चीनी उद्योग को मिल सकता है फायदा
तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारत के चीनी उद्योग पर सकारात्मक भी हो सकता है। दरअसल भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की नीति लागू है और इसका बड़ा हिस्सा चीनी मिलों से आता है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो एथेनॉल की मांग और कीमत दोनों में वृद्धि हो सकती है। इससे चीनी मिलों को अतिरिक्त आय मिलने की संभावना रहती है। इसी वजह से बाजार में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि चीनी कंपनियों को इस स्थिति से लाभ मिल सकता है।
टायर कंपनियों पर लागत का दबाव
हालांकि टायर उद्योग के लिए स्थिति उतनी अनुकूल नहीं है। टायर निर्माण में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक रबर और कई अन्य रसायन कच्चे तेल के उप-उत्पाद होते हैं। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो इन कच्चे माल की लागत भी बढ़ जाती है।
इसके कारण टायर कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। बाजार में इस आशंका के कारण कई टायर कंपनियों के शेयरों में कमजोरी देखने को मिली है।
धातु उद्योग पर भी असर
मध्य पूर्व क्षेत्र में ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन में आ रही बाधाओं का असर धातु उद्योग पर भी पड़ रहा है। फारस की खाड़ी क्षेत्र वैश्विक एल्यूमिनियम उत्पादन का लगभग 9 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करता है। हाल के दिनों में एल्यूमिनियम की कीमतें चार साल के उच्च स्तर तक पहुंच गई थीं।
कुछ एल्यूमिनियम स्मेल्टरों को प्राकृतिक गैस की कमी के कारण उत्पादन कम करना पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर किसी एल्यूमिनियम प्लांट को बंद करना पड़ता है तो उसे दोबारा पूरी क्षमता से चालू होने में तीन से छह महीने तक का समय लग सकता है। इसलिए इस क्षेत्र में आने वाला प्रभाव लंबे समय तक महसूस किया जा सकता है।
इस बीच अमेरिका की कुछ एल्यूमिनियम कंपनियों को ऊंची कीमतों का फायदा मिल रहा है क्योंकि उनके उत्पादन पर ज्यादा असर नहीं पड़ा है। बढ़ती धातु कीमतों से उनकी आय में सुधार की संभावना जताई जा रही है।
-एजेंसी इनपुट के साथ
First Published : March 15, 2026 | 10:20 AM IST