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आक्रामक तरीके से शेयर खरीदने का वक्त नहीं- निवेशकों को नीलेश शाह की बड़ी चेतावनी

कोटक महिंद्रा AMC के एमडी नीलेश शाह ने कहा कि यह समय बाजार में आक्रामक निवेश का नहीं है। तेल संकट, महंगाई और वैश्विक तनाव के बीच निवेशकों को सतर्क रहने की सलाह

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पुनीत वाधवा   
Last Updated- May 13, 2026 | 9:10 AM IST

पश्चिम एशिया के संकट भरे माहौल में प्रधानमंत्री मोदी की देश में खर्च में कटौती करने की अपील से बाजारों में घबराहट हो गई। कोटक महिंद्रा एएमसी के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह ने पुनीत वाधवा से फोन पर बातचीत में कहा कि यह समय इक्विटी में बहुत ज्यादा निवेश करने का नहीं है। उनका सुझाव है कि निवेशकों को विविधता पर विचार करना चाहिए। इसके लिए वे परफॉर्मिंग क्रेडिट एआईएफ, लॉन्ग-शॉर्ट और लीवरेज की सुविधा वाले स्पेशल इन्वेस्टमेंट फंड, रीट, इनविट और वैश्विक निवेश के मौकों का इस्तेमाल कर सकते हैं। बातचीत के अंश:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किफायत बरतने के उपायों पर आप क्या कहेंगे?

असल में, प्रधानमंत्री ने देश को हकीकत बताई है। भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक देशों में से एक है। इसलिए तेल की कीमतों में कोई भी तेज बढ़ोतरी या आपूर्ति में रुकावट का असर हम पर जरूर पड़ेगा। तेल की बढ़ती कीमतें आर्थिक कुंडली में ‘राहुकाल’ की तरह होती हैं। ये महंगाई, वृद्धि, चालू खाते के घाटे, रुपये, ब्याज दरों और लगभग हर मैक्रो आर्थिक पैमाने पर असर डालती हैं। इसलिए, सुधार के कदम उठाना जरूरी हो जाता है।

अगले कुछ दिनों या सप्ताहों में कौन-से नीतिगत उपाय लागू किए जा सकते हैं?

विदेशी मुद्रा (फॉरेक्स) निकासी को कम करना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। उदाहरण के लिए म्युचुअल फंड उद्योग में हमने वितरकों को विदेशी यात्राएं न कराने का निर्णय बहुत पहले ले लिया था। जब जश्न भारत के भीतर हो सकता है तो विदेश में क्यों खर्च करें? अन्य उद्योग स्वेच्छा से ऐसे तरीकों को अपना सकते हैं या सरकार ऐसे उपायों को औपचारिक रूप से प्रोत्साहित भी कर सकती है।

दूसरा, सरकार सोने की रीसाइक्लिंग, गोल्ड डिस्क्लोजर, या स्वर्ण मुद्रीकरण योजनाओं जैसी पहल पर फिर से विचार कर सकती है। भारतीयों के पास बड़ी मात्रा में निष्क्रिय सोना है। अगर इसका कुछ हिस्सा भी वित्तीय प्रणाली में लाया जा सके, तो इससे सोने का आयात कम करने में मदद मिल सकती है। हम स्टॉक लेंडिंग और उधारी की तरह सोने को उधार देने और लेने के लिए तंत्र की संभावना तलाश सकते हैं।

तीसरा, ईंधन की खपत कम करने के लिए भी प्रयास किए जा सकते हैं। जैसे कारपूलिंग को बढ़ावा देना, वर्क-फ्रॉम-होम की व्यवस्थाओं को बढ़ाना और ऊर्जा के कुशल उपयोग को प्रोत्साहित करना। ये छोटे कदम लग सकते हैं। लेकिन सामूहिक रूप से ये सार्थक बदलाव ला सकते हैं। सबसे अहम बात यह है कि इसका प्रभाव होना चाहिए। अगर सरकार खुद बढ़कर नजीर पेश करती है, तो नागरिकों के उसका अनुसरण करने की संभावना अधिक होती है।

मैं सहमत हूं कि व्यक्तिगत तौर पर यह बचत शायद बहुत ज्यादा न हो। लेकिन सवाल यह है कि हमें सुधार के कदम उठाने चाहिए या नहीं?

इसका जवाब साफ तौर पर हां है। तेल की कीमतें बढ़ने से आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचता है, महंगाई बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है। इसलिए, सरकार को इस मामले में आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए। वह अपने कर्मचारियों के बीच कारपूलिंग को बढ़ावा दे सकती है, सरकारी कार्यक्रमों के लिए गाड़ियों का काफिला छोटा कर सकती है, और ऐसे दूसरे प्रतीकात्मक लेकिन सार्थक कदम उठा सकती है। नागरिक भी योगदान दे सकते हैं। हमने देखा है कि लोगों ने राष्ट्रीय हित में स्वेच्छा से एलपीजी (लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस) सब्सिडी छोड़ी है।

लेकिन क्या यह वाकई नागरिकों को सजा देना नहीं है? लोग पहले से ही टैक्स देते हैं और निवेशकों को इक्विटी और ऋण दोनों से होने वाले मुनाफे पर टैक्स देना पड़ता है। फिर उन्हें आयात के कारण होने वाली महंगाई या किसी वैश्विक संकट का बोझ क्यों उठाना चाहिए?

तो फिर इसका विकल्प क्या है? क्या सरकार को बस हालात और बिगड़ने देना चाहिए? अगर कोई बच्चा लगातार जंक फ़ूड खाता रहे और अपनी सेहत को नुकसान पहुंचाता रहे, तो क्या डॉक्टर को सिर्फ इसलिए कुछ नहीं करना चाहिए कि वह बच्चा उसका बोझ उठा सकता है? तेल की बढ़ती कीमतें अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक हैं। सुधार के कदम शायद असुविधाजनक हों, लेकिन वे जरूरी हैं।

First Published : May 13, 2026 | 9:10 AM IST