प्रमुख ब्रोकर्स आने वाले कुछ महीनों में रिटेल निवेशकों के लिए एल्गोरिदम ट्रेडिंग स्ट्रैटेजीज (algorithmic trading strategies) लॉन्च करने की तैयारी कर रहे हैं। एक हालिया मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रिटेल ग्राहक इन स्ट्रैटेजीज तक केवल 5,000 रुपये से भी कम में पहुंच पा सकते हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) का रिटेल ट्रेडर्स की एल्गो ट्रेडिंग में भागीदारी के लिए रिवाइज्ड फ्रेमवर्क अप्रैल 2026 से लागू है। जो ट्रेडर्स इन टूल्स का उपयोग करने की योजना बना रहे हैं, उन्हें किसी भी ब्रोकर या वेंडर द्वारा पेश किए गए एल्गो को चुनने से पहले पूरी तरह जांच-पड़ताल करनी चाहिए।
ट्रेडर्स को सबसे पहले इस स्ट्रैटेजी के बेसिक लॉजिक को समझना चाहिए। एल्गोटेस्ट के को-फाउंडर चिंतन सिंह जग्गी कहते हैं, “निवेशकों को यह पता होना चाहिए कि स्ट्रैटेजी ट्रेंड-फॉलोइंग, मीन-रिवर्जन, ऑप्शन-सेलिंग या ऑप्शन-बाइंग, इंट्राडे, पोजीशनल, हेज्ड या अनहेज्ड है।”
उन्हें इसकी ट्रेडिंग फ्रीक्वेंसी भी देखनी चाहिए। ट्रिपलइंट ट्रेडिंग सिस्टम्स के सीईओ और फाउंडर राजेश गणेश कहते हैं, “हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग से खर्च काफी बढ़ सकते हैं।”
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जिस एसेट क्लास में एल्गो काम करता है, वह काफी महत्वपूर्ण होता है। गणेश कहते हैं, “ट्रेडिंग सेगमेंट लिक्विडिटी को प्रभावित करता है, और यही आगे चलकर एल्गो के प्रदर्शन पर असर डालता है।”
कम लिक्विडिटी की स्थिति में स्लिपेज बढ़ सकता है, ऑर्डर का पूरा न हो पाना, या फिर अनचाहे दाम पर ट्रेड होना जैसी समस्याएं आ सकती हैं। कई बार स्थिति यह भी होती है कि काउंटरपार्टी ऑर्डर न मिलने की वजह से ट्रेड से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। जग्गी कहते हैं, “अगर इंस्ट्रूमेंट इलिक्विड (कम लिक्विडिटी) है, तो बैकटेस्टिंग में परिणाम अच्छे दिख सकते हैं, लेकिन लाइव ट्रेडिंग में स्लिपेज के कारण नतीजे काफी अलग हो सकते हैं।”
स्लिपेज का मतलब है उस कीमत का अंतर, जिस पर ट्रेड का सिग्नल ट्रिगर होता है और जिस कीमत पर वास्तव में ऑर्डर पूरा होता है। इससे ट्रेडर का वास्तविक रिटर्न कम हो सकता है।
ट्रेडर्स को ऐसे एल्गो पर ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए जो सिर्फ एक या दो महीने पुराना हो। कैटबॉट्स.टेक के को-फाउंडर रामकृष्णन सेल्वराज कहते हैं, “कम से कम एक साल का बैकटेस्ट डेटा उपलब्ध होना चाहिए।”
लाइव परफॉर्मेंस का डेटा और ज्यादा भरोसा दिला सकता है। जग्गी का कहना है कि कम से कम छह महीने से लेकर एक साल तक के लाइव परफॉर्मेंस के नतीजे होना सबसे अच्छा रहता है।
लाइव ट्रेडिंग के नतीजे मोटे तौर पर बैकटेस्ट के नतीजों से मेल खाने चाहिए। गणेश कहते हैं, “अगर इसमें बैकटेस्ट की तुलना में बहुत ज्यादा ड्रॉडाउन दिखता है, तो यह चिंता की बात होनी चाहिए।”
एक बार हुई बड़ी मुनाफे वाली ट्रेड, एल्गो के परफॉर्मेंस रिकॉर्ड को बिगाड़ सकती है। गणेश कहते हैं, “ट्रेडर्स को ऐसी असामान्य ट्रेड्स को ध्यान में रखकर ही रिटर्न का आकलन करना चाहिए।” बैकटेस्ट में हुए बहुत बड़े नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
कई बैकटेस्ट रिपोर्ट में हाल का चुनिंदा डेटा दिखाया जाता है जो अच्छा लगता है। ट्रेडर्स को यह देखना चाहिए कि क्या अलग-अलग मार्केट स्थितियों में स्ट्रेटेजी को टेस्ट किया गया है।
सहजमनी.कॉम के फाउंडर और सेबी में रजिस्टर्ड इन्वेस्टमेंट एडवाइजर अभिषेक कुमार कहते हैं, “स्ट्रेटेजी के डेटा को कई मार्केट साइकल– जैसे बुल, बियर और साइडवेज मार्केट– में टेस्ट किया जाना चाहिए। इससे यह पक्का होता है कि रिटर्न किसी ऐसे डेटा सैंपल पर आधारित न हों जो बहुत ज्यादा ऑप्टिमाइज किया गया हो, छोटा हो या कम समय का हो।”
संभावित यूजर्स को सिर्फ रिटर्न पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए। उन्हें स्ट्रैटेजी से जुड़े जोखिमों की भी जांच करनी चाहिए, जिसमें अब तक हुआ अधिकतम नुकसान भी शामिल है।
गणेश का कहना है कि ट्रेडर्स को ‘पीक ड्रॉडाउन’ पर भी ध्यान देना चाहिए, यानी वह अधिकतम रकम जो एल्गो पीक (उच्चतम स्तर) से ट्रफ (न्यूनतम स्तर) तक पहुंचने में गंवाता है। ड्रॉडाउन 20 फीसदी या उससे कम होना चाहिए। उनके मुताबिक, “उस स्तर से ज्यादा कुछ भी होने पर असहजता होती है।”
ड्रॉडाउन की अवधि भी मायने रखती है। अगर कोई एल्गो कई महीनों तक ड्रॉडाउन फेज में रहता है, तो यूजर का भरोसा कम हो सकता है और वे उसका इस्तेमाल करना बंद कर सकते हैं।
ट्रेडर्स को यह भी देखना चाहिए कि ड्रॉडाउन धीरे-धीरे हुआ या अचानक। जग्गी कहते हैं, “अचानक होने वाले ड्रॉडाउन को रिटेल इन्वेस्टर्स के लिए मानसिक रूप से संभालना मुश्किल होता है।”
यूजर्स को संभावित ड्रॉडाउन की तुलना अपनी जोखिम उठाने की क्षमता से करनी चाहिए। जग्गी कहते हैं, “सांख्यिकीय रूप से मजबूत रणनीति भी उस व्यक्ति के लिए बेहतर नहीं हो सकती, जो संभावित ड्रॉडाउन को मानसिक रूप से सहन नहीं कर सकता।”
कई ट्रेडर्स उन एल्गो की ओर आकर्षित हो जाते हैं जो बहुत ऊंची सफलता दर का दावा करते हैं। कुछ एल्गो 90 फीसदी, यहां तक कि 99 फीसदी सफलता दर का विज्ञापन करते हैं। लेकिन केवल ऊंची सफलता दर मुनाफे की गारंटी नहीं देती।
गणेश कहते हैं, “99 फीसदी सफलता दर वाला सिस्टम भी नुकसान करा सकता है। यदि कोई एल्गो हर सफल ट्रेड पर केवल 1 रुपया कमाता है, लेकिन एक असफल ट्रेड में 100 रुपये गंवा देता है, तो कुल नतीजा फिर भी घाटे में रह सकता है।”
जग्गी का कहना है कि ट्रेडर्स को ट्रेड्स की संख्या, विन रेट, हर ट्रेड पर औसत मुनाफा, हर ट्रेड पर औसत नुकसान, सबसे खराब दिन, सबसे अच्छा दिन और मंथली कंसिस्टेंसी की जांच करनी चाहिए।
‘रिस्क ऑफ रूइन’ (पूंजी पूरी तरह खत्म होने का जोखिम) का मतलब है कि ट्रेडर की पूरी पूंजी खत्म हो सकती है। ट्रेडर्स को यह पता लगाना चाहिए कि क्या ऐसा हो सकता है और किन मार्केट स्थितियों में यह जोखिम सच हो सकता है।
एल्गो प्रोवाइडर या ब्रोकर को सभी खर्चों– जैसे प्रोवाइडर की फीस, ब्रोकरेज और टैक्स– को घटाने के बाद का बैकटेस्ट डेटा दिखाना चाहिए। जग्गी कहते हैं, “जो स्ट्रेटेजी खर्चों से पहले अच्छी लगती है, वह खर्चों के बाद आकर्षक नहीं रह सकती है।”
ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म यह भी तय कर सकता है कि यूजर को फायदा होगा या नुकसान। सेल्वाराज कहते हैं, “वही ट्रेड डिस्काउंट ब्रोकर के साथ फायदेमंद हो सकते हैं और फुल-सर्विस ब्रोकर के साथ नुकसान करा सकते हैं।”
ट्रेडर्स को पूंजी (कैपिटल) की जरूरतों का ध्यान से आकलन करना चाहिए। इसमें दो बातें मायने रखती हैं। पहली, उन्हें सिर्फ उतना ही कैपिटल लगाना चाहिए जिसे वे पूरी तरह से गंवाने को तैयार हों। दूसरी, उन्हें यह देखना चाहिए कि एल्गो से ज्यादा से ज्यादा कितना नुकसान हो सकता है।
सेल्वाराज कहते हैं, “संभावित यूजर बैकटेस्टिंग या पेपर ट्रेडिंग में हुए ज्यादा से ज्यादा नुकसान से इसके बारे में जान सकते हैं।”
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एल्गो स्ट्रैटेजीज का स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड होना जरूरी है। कुमार कहते हैं, “एल्गो चुनने से पहले एक्सचेंज रजिस्ट्रेशन की जांच कर लें।” थर्ड-पार्टी एल्गो प्रोवाइडर्स को किसी रजिस्टर्ड ब्रोकर के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
अगर कोई प्रोवाइडर ‘ब्लैक बॉक्स’ के तौर पर काम करता है, तो उसके पास सेबी का वैलिड रिसर्च एनालिस्ट लाइसेंस होना चाहिए। कुमार कहते हैं, “पक्का करें कि प्रोवाइडर के पास यह लाइसेंस हो।”
ट्रेडर्स को एल्गो का इस्तेमाल शुरू करने से पहले टैक्स के नियमों को समझ लेना चाहिए। इंट्राडे ट्रेडिंग, जिसमें ट्रेडर्स बिना डिलीवरी लिए एक ही दिन में शेयर खरीदते और बेचते हैं, उसे कैपिटल गेन के बजाय नॉन-स्पेक्युलेटिव बिजनेस इनकम (गैर-सट्टेबाजी व्यापार आय) माना जाता है।
एरीटे कंसल्टेंट्स की फाउंडर रूपाली सिंघानिया कहती हैं, “बिजनेस इनकम पर सामान्य स्लैब दरों के हिसाब से टैक्स लगता है।”
सिंघानिया का कहना है कि नॉन-स्पेक्युलेटिव बिजनेस से हुए नुकसान को उसी साल सैलरी इनकम को छोड़कर किसी भी अन्य मद (हेड) से हुई आय के खिलाफ सेट-ऑफ (समायोजित) किया जा सकता है।