ब्रोकर एसोसिएशन ने नियामकों से अपील की है कि वे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए कोलैटरल नियमों के तहत लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स के लिए अलग ढांचा बनाएं। उनका तर्क है कि मौजूदा नियमों से अनजाने में बाजार की नकदी कम हो सकती है और लागत बढ़ सकती है।
ये चिंताएं आरबीआई के उस नियम से जुड़ी हैं, जिसके तहत ब्रोकरों की प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाली बैंक गारंटी और इंट्राडे फंडिंग सुविधाओं के लिए 100 फीसदी नकदी या नकदी के बराबर कोलैटरल (गिरवी संपत्ति) की जरूरत होती है। ये नियम 1 जुलाई से लागू होने वाले हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि बैंक से मिले धन से सटोरिया ट्रेडिंग पर रोक लगाने का मकसद तो सही है, लेकिन उनका तर्क है कि यह नियम सट्टेबाजी वाली प्रोप्राइटरी पोजीशन और मार्केट-मेकिंग या लिक्विडिटी मुहैया कराने वाली गतिविधियों के बीच फर्क नहीं कर पाता है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में कमोडिटी पार्टिसिपेंट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीपीएआई) के सदस्य केतन मारवाड़ी ने कहा, कोई भी यह नहीं कह रहा है कि सटोरिया कारोबार के लिए बैंकों से धन मिलना चाहिए। मसला यह है कि लिक्विडिटी प्रोवाइडर (जो ज्यादातर हेज्ड होते हैं और बाजार को सुचारू रूप से चलाने में मदद करते हैं) के साथ भी डायरेक्शनल ट्रेडर्स जैसा ही बर्ताव किया जा रहा है।
उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि लिक्विडिटी प्रोवाइडर अलग-अलग मार्केट सेगमेंट में लगातार कीमतें बताकर बिड-आस्क स्प्रेड और मार्केट डेप्थ बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। उनके मुताबिक, ये पार्टिसिपेंट खरीद और बिक्री के ऑर्डर को संभालते हैं, जिससे संस्थागत और खुदरा निवेशकों को बाजार पर कम से कम असर के साथ पोजीशन लेने और उससे बाहर निकलने में मदद मिलती है।
हालांकि आरबीआई का फ्रेमवर्क मार्केट मेकर्स के लिए धम देने की इजाजत देता है, लेकिन ब्रोकरों का तर्क है कि भारत में मार्केट मेकिंग की परिभाषा छोटी है और यह ज्यादातर एसएमई प्लेटफॉर्म जैसे कम लिक्विडिटी वाले सेगमेंट तक ही सीमित है। सीपीएआई के उपाध्यक्ष वीरेंद्र मनसुखानी ने कहा, आरबीआई मार्केट मेकर्स के लिए फंडिंग की इजाजत तो देता है, लेकिन मौजूदा नियामकीय सिस्टम के तहत नकदी और डेरिवेटिव सेगमेंट (एसएमई प्लेटफॉर्म को छोड़कर) में मार्केट-मेकिंग का कोई औपचारिक फ्रेमवर्क नहीं है। नतीजतन, लिक्विडिटी प्रोवाइडर्स इस व्यवस्था से बाहर हो जाते हैं।
उद्योग ने नकदी प्रावधान की गतिविधियों के लिए अलग ट्रेडिंग कोड बनाने और क्लियरिंग कॉरपोरेशन से मिलने वाले मार्जिन डेटा के जरिये ऐसी पोजीशन की निगरानी करने का प्रस्ताव दिया है। इस प्रस्ताव के तहत, सिर्फ उन अत्यधिक हेज्ड पोजीशन को ही 50 फीसदी कोलैटरल वाली बैंक सुविधाओं के लिए योग्य माना जाएगा, जिनमें रिस्क एक्सपोजर सीमित हो।
एसोसिएशन के अनुसार, लिक्विडिटी प्रदाताओं की पहचान मार्जिन के मानकों (जैसे एसपीएएन की जरूरत) से की जा सकती है। हेज्ड पोर्टफोलियो के लिए ये जरूरतें आमतौर पर सटोरिया पोजीशन की तुलना में बहुत कम होती हैं। उद्योग का अनुमान है कि क्लियरिंग कॉरपोरेशन के पास रखे गए लगभग 11-12 लाख करोड़ रुपये के कोलैटरल पूल में बैंक गारंटी का हिस्सा लगभग 1.2 लाख करोड़ रुपये है जबकि इंट्राडे फंडिंग सुविधाओं का हिस्सा लगभग 80,000 करोड़ रुपये है।
बाजार के प्रतिभागियों का कहना है कि इन सुविधाओं का बड़ा हिस्सा मार्केट-मेकिंग और आर्बिट्राज रणनीतियों की मदद करता है। ब्रोकरों ने बताया कि नए नियमों का सबसे बड़ा असर खुद प्रोप्राइटरी ट्रेडर्स के बजाय मार्केट की क्वॉलिटी पर पड़ेगा। मारवाड़ी ने कहा, अगर पूंजी तक पहुंच कम होती है, तो लिक्विडिटी प्रदाता अपनी गतिविधियां कम कर देंगे। इससे बिड-आस्क स्प्रेड बढ़ जाएगा, इम्पैक्ट कॉस्ट बढ़ेगी और मार्केट की व्यापकता कम हो जाएगी।
मनसुखानी ने कहा कि सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स और दूसरे शुल्क जैसे ढांचागत कारणों से वैश्विक बाजार के मुकाबले भारत में इम्पैक्ट कॉस्ट पहले से ही ज्यादा है। उन्होंने कहा कि अगर लिक्विडिटी और खराब होती है तो भारतीय बाजार बड़े संस्थागत निवेशकों खासकर एंट्री और एग्जिट कॉस्ट का आकलन करने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के लिए कम आकर्षक हो सकते हैं।