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BNP Paribas ने Nifty का लक्ष्य 11% घटाया, 2026 के लिए 25,500 का अनुमान

कमाई की कमजोर संभावनाएं, विदेशी निवेशकों के निवेश में सुस्ती और ऊर्जा की ऊंची कीमतों के कारण बढ़ते आर्थिक जोखिम आदि कारकों को इस बदलाव में शामिल किया गया है

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बीएस संवाददाता   
Last Updated- April 14, 2026 | 9:39 PM IST

बीएनपी पारिबा ने पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनावों से पैदा कई आर्थिक चुनौतियों का हवाला देते हुए 2026 के लिए निफ्टी का अपना लक्ष्य 11 फीसदी घटाकर 25,500 कर दिया है। सोमवार को निफ्टी 23,843 पर बंद हुआ। हालांकि मूल्यांकन लंबी अवधि के औसत के करीब आ गए हैं। फिर भी बीएनपी पारिबा को मौजूदा स्तर से सिर्फ 7 फीसदी की मामूली बढ़त की उम्मीद है जो 2026 के बाकी समय के लिए ज्यादा नरम नजरिये दिखाता है। ब्रोकरेज ने 2027 की अनुमानित कमाई को 18.2 मल्टीपल के साथ यह लक्ष्य तय किया है, जो 10 साल के औसत 18.6 मल्टीपल से कम है।

कमाई की कमजोर संभावनाएं, विदेशी निवेशकों के निवेश में सुस्ती और ऊर्जा की ऊंची कीमतों के कारण बढ़ते आर्थिक जोखिम आदि कारकों को इस बदलाव में शामिल किया गया है। बीएनपी पारिबा ने कहा है कि कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल का असर भारत के चालू खाते, राजकोषीय स्थिति और महंगाई की राह पर पड़ने की आशंका है, जिससे खपत और विकास की गति धीमी पड़ सकती है।

2025 में औसतन 69 डॉलर प्रति बैरल रहने के बाद ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर के आसपास बनी हुई हैं। बीएनपी पारिबा ने चेतावनी दी है कि तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का चालू खाते का घाटा (सीएडी) बढ़ सकता है। तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से यह घाटा लगभग 35 आधार अंक तक बढ़ सकता है। देश की राजकोषीय स्थिति पर भी दबाव पड़ सकता है क्योंकि ईंधन कर में संभावित कटौती से सरकार को राजस्व का भारी नुकसान हो सकता है।

रिपोर्ट में कुछ उभरती ढांचागत चिंताओं का भी जिक्र किया गया है। इनमें आईटी सेवाओं में धीमी वृद्धि और रोजगार तथा विवेकाधीन उपभोग पर एआई का उलटफेर वाला प्रभाव शामिल है। ब्रोकरेज ने कहा, हालांकि हाल के आर्थिक संकेतक मजबूत बने हुए हैं, जिन्हें कर में कटौती जैसे पहले के नीतिगत उपायों से समर्थन मिला है। फिर भी उनमें ऊर्जा की बढ़ती लागत और आयातित महंगाई का असर पूरी तरह से अभी नहीं दिखा है।

बीएनपी ने कहा है, ऐतिहासिक रुझान बताते हैं कि तेल की कीमतों में अचानक उछाल से आमतौर पर ज्यादातर सेक्टरों में कमाई के अनुमानों में कटौती होती है और कीमतों में उछाल की अवधि के आधार पर इसका असर कई तिमाहियों तक रहता है।

बीएनपी पारिबा में इंडिया इक्विटी रिसर्च के प्रमुख कुणाल वोरा ने एक नोट में कहा, 2008, 2011 और 2022 में तेल की कीमतों में अचानक उछाल के तीन दौर के हमारे विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर न केवल तेल की बढ़ती कीमतों का असर पड़ता है बल्कि इस असर की तीव्रता सीधे तौर पर तेल के झटके की अवधि के अनुपात में होती है। 2008 और 2022 में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और फिर जल्दी ही स्थिर हो गईं।

इसलिए भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका असर अपेक्षाकृत कम समय तक रहा। जबकि 2011-2013 में इसका बुरा असर ज्यादा समय तक बना रहा क्योंकि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं। तेल की ऊंची कीमतों का लंबा दौर, ऊंची महंगाई और बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी के लंबे दौर में बदल जाता है, जिसका असर आर्थिक संकेतकों पर पड़ता है।

बॉन्ड यील्ड अब 7 फीसदी की ओर बढ़ रही है। इनका इक्विटी मूल्यांकन पर भी असर आ रहा है। हालिया गिरावट के बावजूद यह मल्टीपल विस्तार की गुंजाइश को सीमित कर रही है। बीएनपी ने बताया है कि ऊंचे मूल्चांकन, वैश्विक एआई आधारित तेजी में भागीदारी की कमी और बिगड़ती आर्थिक स्थितियों की चिंताओं के बीच भारतीय इक्विटी के प्रति विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) का रुझान कमजोर हुआ है।

बीएनपी पारिबा ने अपने सेक्टर के रुख को लेकर रक्षात्मक है। उसने उन सेगमेंट्स को प्राथमिकता दी है, जो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के मुकाबले ज्यादा मज़बूत हैं। उसकी पसंद कंज्यूमर स्टेपल्स, टेलीकॉम, यूटिलिटीज और प्राइवेट सेक्टर के बैंक हैं। उसने इस पसंद की वजह उनकी प्राइसिंग पावर और कमाई में स्थिरता बताई है। आईटी सर्विसेज कंपनियां भी बड़ी गिरावट और मुद्रा से मिले फ़ायदे के बाद उसकी पसंदीदा सूची में शामिल हो गई हैं।

दूसरी ओर, ब्रोकरेज ने ऑटो, सीमेंट और इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को लेकर अपना नज़रिया नकारात्मक कर दिया है क्योंकि इनपुट लागत में बढ़ोतरी और सरकारी पूंजीगत खर्च में संभावित कटौती से इन सेक्टरों के मुनाफे और मांग पर बुरा असर पड़ सकता है।

First Published : April 14, 2026 | 9:30 PM IST