Representational Image
Central Bank of India OFS: सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया ऑफर फॉर सेल (OFS) शुक्रवार (22 मई) को सब्सक्रिप्शन के लिए खुल गया। ओएफएस के जरिए सरकार पीएसयू बैंक में अपनी 4 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त 4 प्रतिशत हिस्सेदारी ग्रीन शू ऑप्शन के जरिए बेची जा सकती है। सरकार बैंक में कुल 8 प्रतिशत तक हिस्सेदारी बेच सकती है।
सरकार ने ओएफएस के लिए 31 रुपये प्रति शेयर का फ्लोर प्राइस तय किया है। यह गुरुवार के बंद भाव 33.91 रुपये से 8.58 प्रतिशत कम है। शुक्रवार को BSE पर स्टॉक में करीब 5 फीसदी की गिरावट के साथ 32.21 रुपये पर कारोबार शुरू हुआ।
सरकार की 4 प्रतिशत हिस्सेदारी बिक्री शुक्रवार को संस्थागत निवेशकों के लिए सब्सक्रिप्शन के लिए खुली। खुदरा निवेशक सोमवार को इस शेयर बिक्री में बोली लगा सकेंगे।
यह OFS भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के न्यूनतम पब्लिक होल्डिंग नियम को पूरा करने की दिशा में सरकार की मदद करेगा। सेबी के नियमों के अनुसार सभी सूचीबद्ध कंपनियों में कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक हिस्सेदारी होना जरूरी है।
ये भी पढ़ें… LIC ने दिया डबल तोहफा, 1 शेयर पर 1 बोनस शेयर और साथ में डिविडेंड भी, जानें रिकॉर्ड डेट
इस ओएफएस के जरिए सरकार अगर कुल 8 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचती है, तो इससे लगभग 2,456 करोड़ रुपये जुटाए जाएंगे।
फिलहाल सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में सरकार की हिस्सेदारी 89.27 फीसदी है। अगर सरकार ग्रीनशू विकल्प का उपयोग करती है, तो बैंक में उसकी हिस्सेदारी घटकर 81.27 फीसदी रह जाएगी।
वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार ने बैंक ऑफ महाराष्ट्र के OFS से 2,624 करोड़ रुपये और इंडियन ओवरसीज बैंक से 1,419 करोड़ रुपये जुटाए थे।
सरल शब्दों में समझें तो सरकार, प्रमोटर या बड़ी हिस्सेदारी रखने वाला निवेशक जब अपने कुछ शेयर आम निवेशकों को बेचता है तो उसे ओएफएस कहा जाता है। OFS के जरिए शेयरों की खरीद बिक्री स्टॉक एक्सचेंज (NSE/BSE) के जरिए होती है।
ये भी पढ़ें… ITC शेयर 302 रुपये पर फिसला, लेकिन कुछ ब्रोकरेज अब भी 399 रुपये का दे रहे टारगेट
सरकार पैसा जुटाने के लिए ओएफएस ला सकती है। जैसेकि सरकार PSU बैंकों या सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर पैसा जुटाती है। दूसरा, मार्केट रेगुलेटर सेबी (SEBI) के नियम पूरे करने के लिए भी अब ओएफएस लाना जरूरी है।
SEBI के नियमों के मुताबिक हर लिस्टेड कंपनी में कम से कम 25 फीसदी पब्लिक शेयरहोल्डिंग होनी चाहिए। अगर सरकार या प्रमोटर की हिस्सेदारी बहुत ज्यादा है, तो OFS के जरिए इसे तय सीमा पर लाया जाता है।
आमतौर पर ओएफएस में शेयर डिस्काउंट पर मिलते हैं। रिटेल निवेशकों को अतिरिक्त छूट मिल सकती है। लिक्विडिटी अच्छी रहती है। लेकिन इसके कुछ खतरे भी रहते हैं। जैसेकि- OFS आने पर शेयर में गिरावट आ सकती है। ज्यादा सप्लाई से कीमत दब सकती है और हमेशा डिस्काउंट के बाद भी फायदा हो, ऐसा जरूरी नहीं है।