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कारोबार अलग करने का बढ़ता चलन, 2024 के बाद 43 अरब डॉलर के 50 सौदे

वेदांत के अपनी कंपनी को 5 अलग-अलग इकाइयों- वेदांत, वेदांत एल्युमीनियम, वेदांत पावर, वेदांत आयरन ऐंड स्टील और वेदांत ऑयल ऐंड गैस- में बांटने के कारण विभाजन सुर्खियों में है

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सचिन मामपट्टा   
Last Updated- May 27, 2026 | 10:07 PM IST

हाल के वर्षों में कंपनियां अपने डिविजनों को अलग-अलग कारोबारों में बांट रही हैं। एलएसईजी के आंकड़ों का बिज़नेस स्टैंडर्ड ने विश्लेषण किया है। इनसे पता चलता है कि तीन वर्षों में, जिनमें मौजूदा वर्ष 2026 भी शामिल है,  ऐसे 50 सौदे हुए हैं। इनका कुल मूल्य करीब 43 अरब डॉलर है।

वेदांत के अपनी कंपनी को 5 अलग-अलग इकाइयों- वेदांत, वेदांत एल्युमीनियम, वेदांत पावर, वेदांत आयरन ऐंड स्टील, और वेदांत ऑयल ऐंड गैस- में बांटने के कारण आजकल विभाजन सुर्खियों में है। हाल में हुए अन्य डीमर्जर में टाटा मोटर्स ने अपने पैसेंजर और वाणिज्यिक वाहनों के कारोबार को अलग किया। इसके अलावा हिंदुस्तान यूनिलीवर ने अपनी आइसक्रीम इकाई क्वॉलिटी वॉल्स (इंडिया) के कारोबार को पृथक किया है।

हैदराबाद की कंपनी नैटको फार्मास्यूटिकल्स ने अपनी एग्रोकेमिकल्स इकाई को अलग करने की घोषणा की है। इसी तरह जुबिलैंट एग्री ऐंड कंज्यूमर प्रोडक्ट्स ने भी अपने कृषि और उपभोक्ता कारोबार को अलग करने का ऐलान किया है।

जेएम फाइनैंशियल में निवेश बैंकिंग की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी सोनिया दासगुप्ता ने कहा, भारत में कंपनियां अब ज्यादा से ज्यादा डीमर्जर (कंपनियों को अलग करना) का रास्ता अपना रही हैं क्योंकि प्रवर्तक और बोर्ड इस बात को समझने लगे हैं कि बाजार अब जटिलता पसंद नहीं करते।

निवेशक ऐसे कारोबार को ज्यादा पसंद करते हैं जो किसी एक चीज पर केंद्रित हों, जिसमें पूंजी का बंटवारा व्यवस्थित हो, प्रबंधन टीम स्वतंत्र हो, रणनीतिक फोकस साफ हो और प्रदर्शन के पैमाने पारदर्शी हों। उन्होंने कहा, डीमर्जर से हर कारोबार को अपने लिए सही शेयरधारक मिल जाते हैं, वे अपनी वृद्धि की रणनीति पर काम कर पाते हैं और ‘बड़े समूहों के डिस्काउंट’ को हटाकर अपनी असली कीमत (वैल्यू) सामने ला पाते हैं।

स्वतंत्र बाजार विश्लेषक आनंद टंडन के अनुसार विलय को आम तौर पर नकारात्मक नजरिये से देखा जाता है क्योंकि अक्सर ये सफल नहीं होते और कंपनियों पर कई तरह की समस्याएं खड़ी कर  देते हैं, जिससे उनका प्रदर्शन कमजोर हो जाता है। लेकिन विभाजन को अलग नजर से देखा जाता है। उन्होंने कहा, यह माना जाता है कि विभाजन के बाद ज्यादातर कंपनियां बेहतर प्रदर्शन करती हैं।

असूचीबद्ध कंपनियों के क्षेत्र में भी नहाने के साबुन और डिटर्जेंट बनाने वाली कंपनी निरमा और ओक्युलर एंटरप्राइज के बीच डीमर्जर की घोषणा की गई है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के एक नोट के अनुसार ओक्युलर के पास केमिकल और कंज्यूमर कारोबार के परिचालन के काम होंगे जबकि निरमा के पास कर्णावती होल्डिंग इंक और एलिवस लाइफ साइंसेज (पहले ग्लेनमार्क लाइफ साइंसेज) में किए गए निवेश होंगे।

भारत में अकेले 2025 में 40 अरब डॉलर से ज्यादा के डीमर्जर सौदे हुए, जो 2015 से अब तक के एलसीईजी आंकड़ों में सबसे ज्यादा हैं। साल 2026 में 76.4 करोड़ डॉलर के 5 और डीमर्जर हुए हैं। डेटा के एक विश्लेषण के अनुसार 2026 में उभरते बाजारों के डीमर्जर में मूल्य के हिसाब से यह 75 फीसदी है। 6 मई तक उभरते बाजारों में 1 अरब डॉलर के 11 डीमर्जर हुए।

दिलचस्प यह है कि भारत समेत उभरते बाजारों में डीमर्जर में ऐसे समय बढ़ोतरी हुई है, जब विकसित बाजारों में डीमर्जर की रफ्तार धीमी पड़ गई है। 2025 में 122 अरब डॉलर के 72 सौदे हुए, जबकि 2015 (139) और 2021 (106) में सालाना सौदों की संख्या 100 से ज्यादा थी और हर साल ऐसे सौदे की कुल कीमत 200 अरब डॉलर से ज्यादा रही।

टंडन के अनुसार भारत में डीमर्जर (कंपनियों के बंटवारे) में बढ़ोतरी के कई कारण हो सकते हैं। पीढ़ीगत बदलाव और बदलती कॉरपोरेट संरचनाएं इस बहस को आगे बढ़ाने वाले मुख्य कारक हैं। नई पीढ़ी के उद्यमियों की एक लहर, जो अपने बड़े साथियों से कमान संभाल रही है, इस विचार में ज्यादा भरोसा रखती है कि सरल कारोबार ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

बाजार भी ऐसी कंपनियों को ज्यादा मूल्यांकन देता है। पुरानी पीढ़ी, जो उदारीकरण से पहले कड़े नियमों वाले उद्योगों में काम करती थी, बड़े समूहों से जुड़ी रही, क्योंकि इस मॉडल से सरकारी लाइसेंस प्रणालियों को समझना और उनसे निपटना आसान हो जाता था।

First Published : May 27, 2026 | 10:07 PM IST