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ब्रोकर नेटवर्थ नियमों पर FIA की आपत्ति, कहा- क्लाइंट फंड को जोखिम का पैमाना न बनाएं

एफआईए का तर्क है कि क्लाइंट के बची राशि का इस्तेमाल ब्रोकर के जोखिम के संकेतक के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए

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खुशबू तिवारी   
Last Updated- June 03, 2026 | 11:18 PM IST

ब्रोकरों और डेरिवेटिव बाजार के प्रतिभागियों के वैश्विक संगठन फ्यूचर्स इंडस्ट्री एसोसिएशन (एफआईए) ने बाजार नियामक सेबी के एक प्रस्ताव पर चिंता जताई है। सेबी के इस प्रस्ताव में शेयर ब्रोकरों के लिए वेरिएबल नेटवर्थ ढांचे में संशोधन की बात कही गई है। एफआईए का तर्क है कि क्लाइंट के बची राशि का इस्तेमाल ब्रोकर के जोखिम के संकेतक के तौर पर नहीं किया जाना चाहिए।

एफआईए ने कहा कि प्रस्तावित ढांचा ब्रोकरों के सामने आने वाले वास्तविक जोखिमों पर आधारित होना चाहिए। इसमें उन जोखिमों को नहीं शामिल करना चाहिए, जिनसे निपटने के सुरक्षा उपाय पहले से ही हैं। इन उपायों में अग्रिम मार्जिन, कोलैटरल नियंत्रण और क्लाइंटों के धन की अपस्ट्रीमिंग शामिल है। अपस्ट्रीमिंग का मतलब उस राशि को क्लियरिंग कारपोरेशनों को हस्तांतरित करना है।

सेबी ने ब्रोकरों की बदलती नेटवर्थ जरूरतों को उनके कारोबार के आकार और जोखिम से जोड़ने का प्रस्ताव किया था। यह प्रस्ताव क्लाइंटों की कुल रकम, सक्रिय क्लाइंटों की संख्या और अधिकृत व्यक्तियों (एपी) के जरिये जोड़े गए क्लाइंटों जैसे पैमानों पर आधारित था। औसत क्लाइंट क्रेडिट बैलेंस के साथ-साथ नियामक ने 10,000-50,000 सक्रिय क्लाइंट वाले ब्रोकरों के लिए 50 लाख रुपये की अतिरिक्त नेटवर्थ की जरूरत रखी थी। इसके बाद हर अतिरिक्त 50,000 क्लाइंट पर 50 लाख रुपये और बढ़ते जाने थे। अधिकृत व्यक्तियों के जरिये जोड़े गए क्लाइंटों के लिए यह जरूरत 2,500 क्लाइंट तक 5 लाख रुपये की शुरुआती सीमा के बाद हर अतिरिक्त 10,000 क्लाइंट के लिए 50 लाख रुपये बढ़ती जाती ।

सेबी ने कहा है कि इन बदलावों का मकसद सुरक्षा की दूसरी पंक्ति बनाना है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ब्रोकर उन जोखिमों से निपटने के लिए पर्याप्त पूंजी रखें, जिन्हें मार्जिन की जरूरतों के जरिये पूरा नहीं किया जा सका है।

लेकिन एफआईए ने कहा कि क्लाइंट जमा के आधार पर नेटवर्थ की जरूरतों को बढ़ाने से ऐसा हो सकता है कि पूंजी उस जोखिम के लिए रोक ली जाए, जिसे पहले ही काफी हद तक कम कर दिया गया हो या ब्रोकर की बैलेंस शीट से हटा दिया गया हो। एसोसिएशन ने कहा, इसका असर यह भी हो सकता है कि ब्रोकरों को ज्यादा क्लाइंट कोलैटरल बफर बनाए रखने या उसे बढ़ावा देने के लिए सजा मिले, भले ही बफर से डिफ़ॉल्ट के खिलाफ मजबूती मिलती हो।

संगठन ने यह तर्क भी दिया कि इस प्रस्ताव से क्लाइंट से जुड़े जोखिम और प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग के जोखिम के बीच घालमेल का खतरा है, जबकि ये दोनों बिल्कुल अलग हैं। एफआईए ने कहा, अगर प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग में जोखिम ही नियामक की चिंता है तो इसे सीधे तरीके से सुलझाया जाना चाहिए और ब्रोकर के प्रोप्राइटरी निवेश के हिसाब से इसे दुरुस्त किया जाना चाहिए। इसके लिए क्लाइंटों की जमा या क्लाइंटों की संख्या जैसे परोक्ष तरीके नहीं इस्तेमाल करने चाहिए।

सेबी ने 2022 में ‘वेरिएबल नेटवर्थ फ्रेमवर्क’ पेश किया था। इसके तहत ब्रोकरों के लिए पिछले छह महीनों में क्लाइंटों से मिले औसत दैनिक नकद शेष के 10 फीसदी के बराबर पूंजी बनाए रखनी ज़रूरी था। लेकिन एफआईए ने बताया कि अपस्ट्रीमिंग व्यवस्था लागू होने के बाद यह ढांचा कम असरदार हो गया है। इस व्यवस्था के तहत क्लाइंटों की रकम क्लियरिंग कॉरपोरेशन को हस्तांतरित कर दी जाती है, जिससे ब्रोकरों के पास क्लाइंटों की नकद राशि बहुत कम रह जाती है।

एफआईए ने यह बात मानी है कि भारत का तंत्र ब्रोकर के दिवालिया होने की सूरत में क्लाइंट की संपत्तियों का जोखिम काफी हद तक कम कर देता है। उसने कहा कि पूंजी से जुड़ी किसी भी नई जरूरत को बहुत सावधानी से तय किया जाना चाहिए ताकि उसमें ब्रोकरों के शेष वास्तविक जोखिम का सही से पता चल जाए।

एसोसिएशन ने चेतावनी दी कि ज्यादा पूंजी की जरूरतें आखिरकार ट्रेडिंग की बढ़ी हुई लागत के जरिये निवेशकों पर डाली जा सकती हैं और इसका छोटी इंटरमीडियरीज पर ज्यादा असर पड़ सकता है। उसने कुछ खास उपायों का सुझाव दिया, जिनमें बड़ी या आपस में जुड़ी पोजीशनों के लिए ज्यादा सघन मार्जिन और प्रोप्राइटरी ट्रेडिंग गतिविधियों पर पूंजी से जुड़ी स्पष्ट सीमाएं शामिल हैं।

First Published : June 3, 2026 | 11:18 PM IST