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मार्च के आखिर में भारी गिरावट के बाद भारतीय मिड और स्मॉलकैप शेयरों ने जोरदार वापसी की है। दिलचस्प यह है कि कई इंडिविजुअल शेयरों ने मार्च के निचले स्तर से 40-80 प्रतिशत तक का रिटर्न दिया है, जो बेंचमार्क इंडेक्स से कहीं ज्यादा है।
डिफेंस, पावर, कैपिटल गुड्स और चुनिंदा फार्मा शेयर सबसे बड़े आउटपरफॉर्मर रहे हैं। इन सेक्टर्स ने उन निवेशकों को शानदार रिटर्न दिया, जिन्होंने गिरावट के दौरान धैर्य बनाए रखा। यह रिकवरी बाजार की एक पुरानी सच्चाई को दोहराती है कि इंडेक्स पूरी स्टोरी नहीं बताते और मिड-स्मॉलकैप शेयरों में सही स्टॉक चुनने से ऐसे रिटर्न मिल सकते हैं, जिन्हें इंडेक्स ट्रैक ही नहीं सकते।
इसके बाद आई रिकवरी काफी तेज और मजबूत रही। अप्रैल 2026 में अकेले निफ्टी स्मॉलकैप इंडेक्स 18.4 प्रतिशत और मिडकैप इंडेक्स 13.5 प्रतिशत चढ़ा, जो पिछले 12 साल की सबसे बड़ी मंथली तेजी रही। यह निफ्टी की 7.4 प्रतिशत बढ़त से काफी ज्यादा था।
फेयर वैल्यूएशन पर निवेश करना निवेश की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। भारत में बड़ी संख्या में घरेलू म्युचुअल फंड्स मिड और स्मॉलकैप शेयरों में निवेश करते हैं, जिससे इन कंपनियों के वैल्यूएशन बड़े शेयरों की तुलना में लगातार ऊंचे बने रहते हैं।
इसी वजह से जब भी कंपनियों के नतीजे उम्मीद से कमजोर आते हैं, तब इन शेयरों में तेज गिरावट का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा ये शेयर वैश्विक आर्थिक झटकों के प्रति भी ज्यादा संवेदनशील होते हैं। यही कारण है कि पिछले तीन-चार तिमाहियों में मिड और स्मॉलकैप बाजार में बड़ी गिरावट देखने को मिली। हालांकि अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं और हाल के महीनों में कई शेयरों में तेज रिकवरी आई है।
यह माना जाता है कि किसी छोटी कंपनी में शुरुआती निवेश, जो आगे चलकर बड़ी कंपनी बन जाए, मल्टीबैगर रिटर्न दे सकता है। लेकिन इसके साथ कई ऐसे जोखिम भी जुड़े होते हैं, जो बड़ी कंपनियों की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर होते हैं। ऐसे 5 जोखिम के बारे में जानते हैं
स्माल एंड मिडकैप कंपनियों में सबसे बड़ी समस्या सही और पूरी जानकारी का आसानी से उपलब्ध न होना है। इन कंपनियों के वित्तीय आंकड़े, मैनेजमेंट की जानकारी और विश्लेषकों की रिपोर्ट अक्सर सीमित होती हैं। इसलिए निवेशकों को कंपनी की सालाना रिपोर्ट, निवेशक प्रेजेंटेशन और बिजनेस गतिविधियों पर खुद नजर रखनी पड़ती है।
इन कंपनियों पर बड़े शेयरों की तरह ज्यादा रिसर्च या संस्थागत निगरानी नहीं होती। इसलिए प्रमोटर की विश्वसनीयता, संबंधित कंपनियों के साथ लेन-देन और अकाउंटिंग में गड़बड़ी जैसे जोखिम ज्यादा रहते हैं। कई छोटी प्रमोटर-चालित कंपनियों में प्रोफेशनल सिस्टम और पारदर्शिता की कमी होती है। वे नियमित रूप से जरूरी जानकारी साझा नहीं करतीं, जिससे निवेशकों के लिए कंपनी की सही स्थिति समझना मुश्किल हो जाता है।
कई मिड और स्मॉलकैप कंपनियों पर भारी कर्ज होता है। ब्याज दरों में बढ़ोतरी या आर्थिक सुस्ती का इन पर सीधा असर पड़ता है। बढ़ती उधारी लागत मुनाफे को कम कर सकती है या डिफॉल्ट की स्थिति पैदा कर सकती है। महंगाई, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आर्थिक बदलाव एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों के लिए जोखिम और बढ़ा देते हैं।
कई छोटी कंपनियां केवल एक प्रोडक्ट, एक सेक्टर या एक ही रेवेन्यू स्रोत पर निर्भर होती हैं। ऐसे में किसी सेक्टर विशेष में गिरावट या स्थानीय आर्थिक संकट उनके बिजनेस को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है। बड़ी कंपनियों के विपरीत इनके पास विविधता का सहारा नहीं होता, जिससे वे नीतिगत बदलाव या प्रतिस्पर्धा का असर आसानी से झेल नहीं पातीं।
छोटी कंपनियां अक्सर एक या दो प्रमुख व्यक्तियों पर निर्भर होती हैं। अगर ऐसे किसी व्यक्ति के कंपनी छोड़ने या उससे जुड़ी नकारात्मक खबर आती है, तो शेयरों में भारी गिरावट आ सकती है। किसी छोटी कंपनी में बड़ा निवेश बहुत लाभदायक साबित हो सकता है, लेकिन अगर निवेश की धारणा गलत साबित हुई या किसी प्रमुख व्यक्ति से जुड़ी समस्या आई, तो नुकसान भी उतना ही बड़ा हो सकता है।
मिड और स्मॉलकैप शेयरों में तेज उतार-चढ़ाव सामान्य बात है। कम मार्केट कैप और सीमित ट्रेडिंग वॉल्यूम के कारण ये शेयर बाजार की खबरों, अफवाहों और निवेशकों की धारणा पर बहुत तेजी से प्रतिक्रिया देते हैं।
गिरावट के दौरान इनमें नुकसान ज्यादा हो सकता है और रिकवरी में लंबा समय लग सकता है। ऐसे दौर निवेशकों के धैर्य की असली परीक्षा लेते हैं। हालांकि, इन जोखिमों को समझकर और सही रणनीति अपनाकर मिड और स्मॉलकैप शेयरों में निवेश लंबी अवधि में बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है।
(डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल HDFC सिक्योरिटीज में प्राइम रिसर्च के हेड देवर्ष वकील का है। ऊपर दिए गए विचार उनके निजी हैं।)