निप्पॉन इंडिया ऐसेट मैनेजमेंट के प्रमुख (न्यू ऐसेट क्लास) एंड्रयू हॉलैंड | फोटो: कमलेश पेडनेकर
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के समाधान की उम्मीदों और अनिश्चितता के बीच झूल रहे बाजारों के बारे में निप्पॉन इंडिया ऐसेट मैनेजमेंट के प्रमुख (न्यू ऐसेट क्लास) एंड्रयू हॉलैंड ने मुंबई में पुनीत वाधवा को दिए इंटरव्यू में कहा कि अगर युद्ध छह महीने और खिंचता है तो बाजार हार मान लेंगे। फिलहाल, उनका कहना है कि बाजार यह मानकर चल रहे हैं कि लड़ाई लंबी नहीं खिंचेगी। बातचीत के मुख्य अंश:
क्या बाजारों ने पश्चिम एशिया को लेकर बनी अनिश्चितता को स्वीकार कर लिया है?
मुझे लगता है कि उतार-चढ़ाव काफी ज्यादा बना रहेगा। इसकी दो संभावित राह हैं। अगर युद्धविराम होता है, तो यह सकारात्मक बात होगी, तेल की कीमतें नीचे आएंगी और बाजार उस स्थिति में लौट आएंगे जिसे हम ‘सामान्य’ मानते हैं। हम इस पर बहस कर सकते हैं कि वह सामान्य स्थिति क्या है, लेकिन मोटे तौर पर चीजें स्थिर हो जाएंगी।
अगर यह स्थिति लंबी खिंचती है, खासकर होर्मुज स्ट्रेट में किसी भी तरह की रुकावट के साथ, तो इसका काफी गहरा असर पड़ेगा, न सिर्फ भारत और एशिया पर, बल्कि यूरोप पर भी। अभी तो, बाजार इस जोखिम को नजरअंदाज करते दिख रहे हैं और मानकर चल रहे हैं कि कोई समझौता हो जाएगा।
हालांकि बाजार आशान्वित दिख रहे हैं, लेकिन अगर अगले कुछ महीनों में हालात इसके विपरीत हो जाएं, तो क्या होगा?
दो स्थितियां हो सकती हैं। पहली है देरी, बातचीत जारी रहे लेकिन हालात और नहीं बिगड़ें। दूसरी है स्थिति का बिगड़ना, जिसे बाजार अभी ध्यान में नहीं रख रहा है। अगर स्थिति बिगड़ती है, तो तेल की कीमतें फिर से बढ़ जाएंगी, जिससे वैश्विक कमाई और महंगाई पर असर पड़ेगा और संभवतः इससे ‘स्टैगफ्लेशन’ (मुद्रास्फीति के साथ आर्थिक ठहराव) की स्थिति पैदा हो सकती है। तब सब कुछ और अधिक जटिल हो जाएगा।
आपको क्या लगता है कि बाजार पश्चिम एशिया में किसी समाधान की उम्मीद कब छोड़ सकते हैं?
अगर यह संघर्ष छह महीने तक खिंचता है, तो उस समय बाजार का मूड बदल सकता है और वे किसी समझौते की उम्मीद छोड़ देंगे, ठीक वैसे ही जैसे यूक्रेन और रूस के संघर्ष में हुआ था। अभी तो बाजार मानकर चल रहे हैं कि यह लड़ाई लंबी नहीं खिंचेगी।
क्या 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर तेल कीमतें ‘न्यू नॉर्मल’ यानी सामान्य बात बन जाएंगी? क्या वित्तीय बाजार इसके लिए तैयार हैं?
तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई बढ़ने की आशंका है, जिससे केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दरें घटाना और भी मुश्किल हो जाएगा। साथ ही, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है, क्योंकि उपभोक्ताओं को बढ़ती कीमतों का दबाव महसूस होगा। इससे ‘स्टैगफ्लेशन’ का खतरा पैदा होता है, यानी धीमी आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ बढ़ती महंगाई।
क्या यह माहौल परिसंपत्ति वर्ग के तौर पर इक्विटी का पक्ष कमजोर करता है?
असल में नहीं। पिछले दो साल में मूल्यांकन नीचे आए हैं, जिससे वे और भी ज्यादा आकर्षक हो गए हैं। अगर कमाई फिर से 10-12 प्रतिशत की दर से बढ़ने लगती है, तो बाजारों को भी उसी के हिसाब से आगे बढ़ना चाहिए। अगर वित्त वर्ष 2026-27 में वृद्धि और तेज होती है, तो बाजार और बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। इसके अलावा, जब विदेशी निवेशक वापस आते हैं, तो वे आम तौर पर लार्ज-कैप शेयरों को पसंद करते हैं।
हाल में, बाजार अपने निचले स्तरों से लगभग 10 प्रतिशत चढ़े हैं, जबकि स्मॉल-कैप शेयरों में 15-16 प्रतिशत की तेजी आई है, जो व्यापक भागीदारी का संकेत है। लंबे समय बाद, मैं बाजारों को लेकर अब उत्साहित हो गया हूं।