शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजार में बड़ा बदलाव: DII की हिस्सेदारी रिकॉर्ड स्तर पर, FPI की पकड़ कमजोर

मार्च 2026 की तिमाही में निफ्टी-500 कंपनियों में देसी संस्थागत निवेशकों की होल्डिंग रिकॉर्ड 20.9 फीसदी पर पहुंची जबकि एफपीआई की घटकर 17.1 फीसदी रह गई

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समी मोडक   
Last Updated- May 05, 2026 | 10:37 PM IST

मार्च 2026 की तिमाही में भी भारत में शेयरों के स्वामित्व में संरचनात्मक बदलाव जारी रहा। जहां एक ओर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) ने अपनी हिस्सेदारी कम करना जारी रखा, वहीं दूसरी ओर घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने अपनी पकड़ और मजबूत की।

मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज़ के विश्लेषण के अनुसार मार्च 2026 के अंत तक निफ्टी 500 कंपनियों में डीआईआई की हिस्सेदारी बढ़कर रिकॉर्ड 20.9 फीसदी पर पहुंच गई जबकि एफपीआई की हिस्सेदारी गिरकर अब तक के सबसे निचले स्तर 17.1 फीसदी पर आ गई। एफआईआई और डीआईआई के स्वामित्व का अनुपात घटकर 0.8 फीसदी रह गया है।

यह अंतर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और अस्थिर वैश्विक निवेश की पृष्ठभूमि में सामने आया है, जिसने विदेशी निवेशकों के मनोबल पर असर डाला है। लेकिन घरेलू भागीदारी को कमजोर नहीं कर पाया है। ब्रोकरेज फर्म ने कहा, डीआईआई (घरेलू संस्थागत निवेशक) बाजार की रीढ़ बने हुए हैं। फर्म ने यह भी बताया कि लगातार हो रहे निवेश, विशेष रूप से सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान-एसआईपी, ने स्थानीय संस्थाओं को विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली को संभालने और बाजारों को स्थिर रखने में सक्षम बनाया है। 

डीआईआई ने मार्च तिमाही के दौरान शेयरों में 27.2 अरब डॉलर का निवेश किया। एफपीआई का निवेश अस्थिर रहा। फरवरी में कुछ समय के लिए सकारात्मक होने के बाद ईरान संघर्ष के बीच मार्च में उन्होंने 14.2 अरब डॉलर की बिकवाली की। इससे तिमाही में कुल निकासी 15.8 अरब डॉलर तक पहुंच गई। ब्रोकरेज ने बताया कि एफपीआई की निकासी में थोड़ी सी भी कमी बाजार में तेजी का कारण बन सकती है जबकि उनके निवेश की वापसी से बाजार में और भी तेज़ी आ सकती है।

डीआईआई की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी कुछ ही सेक्टर तक सीमित नहीं है। मोतीलाल ओसवाल के विश्लेषण के अनुसार पिछले एक साल में घरेलू संस्थानों ने 24 में से 21 सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है, जिसमें प्राइवेट बैंक, तकनीक, दूरसंचार, रियल एस्टेट, हेल्थकेयर और एनबीएफसी में खासी बढ़ोतरी देखने को मिली है। इसके विपरीत, एफआईआई ने 17 सेक्टर में अपनी हिस्सेदारी कम की है, जिनमें प्राइवेट बैंक, रियल एस्टेट, तकनीक और उपभोक्ता क्षेत्र में सबसे ज्यादा कटौती देखी गई है।

डीआईआई ने लार्ज, मिड और स्मॉल-कैप शेयरों में अपनी होल्डिंग बढ़ाई जबकि एफआईआई ने सभी सेगमेंट में अपना निवेश कम किया। खुदरा भागीदारी भी बढ़कर 12.7 फीसदी हो गई है, जिससे घरेलू बाजार को एक और सहारा मिला है।

रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि यह रुझान, जो लगभग 2021 में शुरू हुआ था, चक्रीय होने के बजाय संरचनात्मक है। इसकी मुख्य वजह घरेलू बचत का बढ़ता वित्तीयकरण और घरेलू पूंजी बाजारों का मजबूत होते जाना है।

ब्रोकरेज ने कहा कि जहां घरेलू निवेशक बाजार के मुख्य आधार के तौर पर उभरे हैं, वहीं विदेशी निवेश अभी भी अहम उतार-चढ़ाव का कारक बना हुआ है। ब्रोकरेज ने कहा कि भू-राजनीतिक हालात में स्थिरता, खासकर ईरान से जुड़े तनाव में कमी, एफपीआई निवेश के परिदृश्य को बेहतर बना सकती है।

First Published : May 5, 2026 | 10:15 PM IST