प्रतीकात्मक फोटो
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने जून की मौद्रिक नीति समीक्षा में रीपो रेट 5.25 फीसदी पर और ‘न्यूट्रल’ रुख को बनाए रखा। केंद्रीय बैंक की मौजूदा नीति को ‘वेट एंड वॉच’ के रूप में देखा जा सकता है। पॉलिसी की घोषणा के बाद बैंकिंग और फाइनेंस सेक्टर के चुनिंदा शेयरों में शुक्रवार (5 जून) के कारोबारी सेशन में तेजी देखने को मिली। मार्केट एक्सपर्ट का मानना है कि महंगा होता तेल, कमजोर मॉनसून, फिसलता रुपया जैसे फैक्टर RBI को ब्याज दरों के साइकल को उलट सकते हैं। यानी, ब्याज दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला दोबारा शुरू हो सकता है।
दरअसल, RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुक्रवार को मौद्रिक नीति का एलान करते हुए कहा कि दुनिया भर की आर्थिक परिस्थितियां अप्रैल की पिछली मौद्रिक नीति बैठक के बाद और चुनौतीपूर्ण हो गई हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते वैश्विक माहौल कमजोर हुआ है। इससे सप्लाई चेन में रुकावट और तेल-गैस की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
रिजर्व बैंक का मानना है कि इन वजहों से आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ सकती है और महंगाई बढ़ने का खतरा भी बना हुआ है। आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए खुदरा महंगाई दर का अनुमान 4.6 फीसदी बढ़ाकर 5.1 फीसदी कर दिया। साथ ही ने GDP ग्रोथ का अनुमान 6.9 फीसदी से घटाकर 6.6 फीसदी कर दिया।
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बैंकिंग सेक्टर पर एक्सिस सिक्योरिटीज PMS के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर नवीन कुलकर्णी का कहना है कि मार्च तिमाही (Q4) में बैंकों ने मजबूत प्रदर्शन किया। इस दौरान क्रेडिट ग्रोथ में अच्छी तेजी देखने को मिली और एसेट क्वॉलिटी में सुधार आया। RBI के ताजा आंकड़ें बताते हैं कि मई 2026 के मध्य तक क्रेडिट ग्रोथ करीब 16 फीसदी के स्तर पर बनी हुई है। अभी तक एसेट क्वॉलिटी चिंता का विषय नहीं रही है, लेकिन अगर पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर FY27 की दूसरी तिमाही के अंत या दूसरी छमाही में दिखना शुरू हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इसका असर खासकर एमएसएमई (MSME), व्हीकल फाइनेंस और तेल कीमतों के प्रति संवेदनशील कॉरपोरेट क्षेत्रों में अधिक दिखाई दे सकता है। कई सरकारी बैंक (PSB) और निजी बैंक बढ़ती भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बावजूद अपनी बैलेंस शीट को लगातार मजबूत बना रहे हैं। हालांकि, बैंकिंग सेक्टर के सामने एक बड़ी चुनौती मार्जिन की भी है। जमा जुटाने के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा और फंड की लागत के ऊंचे बने रहने या धीरे-धीरे बढ़ने से निकट अवधि में नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIM) पर दबाव बना रह सकता है।
कुलकर्णी ने कहा कि अगर आने वाली बैठकों में RBI ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है, तो बड़े प्राइवेट बैंकों को अपेक्षाकृत ज्यादा फायदा हो सकता है, क्योंकि उनके पोर्टफोलियो में एक्सटर्नल बेंचमार्क लिंक्ड रेट (EBLR) आधारित कर्ज की हिस्सेदारी अधिक है। वहीं, मिड और स्मॉल बैंकों का प्रदर्शन अलग-अलग दिशा में जा सकता है।
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उन्होंने इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी पर कहा कि वे सलेक्टिव शेयरों पर दांव लगाने की स्ट्रैटेजी रखेंगे और ऐसे बैंकों को प्राथमिकता देंगे जिनके पास डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो, मजबूत डिपॉजिट बेस, पर्याप्त पूंजी और आकर्षक वैल्यूएशन मौजूद हैं। अभी बड़े बैंकों में उनकी पसंद ICICI Bank, Kotak Mahindra Bank और SBI हैं। वहीं, मिड और स्मॉल बैंकिंग स्पेस में Federal Bank और Ujjivan Small Finance Bank को प्राथमिकता दी जा रही है। गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) में उनकी पसंद Bajaj Finance है।
शुक्रवार को कारोबारी सेशन में टॉप गेनर्स की बात करें तो बैंकिंग एवं फाइनेंस सेक्टर के चुनिंदा शेयर शामिल रहे। सेंसेक्स में एक्सिस बैंक टॉप गेनर्स में रहा और इसमें 1.86 फीसदी की तेजी देखने को मिली। इसके अलावा ICICI बैंक में 0.8 फीसदी और एनबीएफसी बजाज फाइनेंस में 1.75 फीसदी का उछाल दर्ज किया गया। हालांकि, हैवीवेट बैंक शेयरों में शामिल SBI लगभग सपाट (-0.19%) बंद हुआ। जबकि एचडीएफसी बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक में करीब 1 फीसदी की गिरावट देखने को मिली।
केयरएज रेटिंग्स की मुख्य अर्थशास्त्री रजनी सिन्हा ने RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने कहा कि बढ़ती वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच केंद्रीय बैंक ने डेटा-आधारित नजरिया अपनाया है। यह फैसला RBI के ‘वेट एंड वॉच’ यानी हालात पर नजर रखने वाले रुख को दर्शाता है। आरबीआई पहले बदलते वैश्विक हालातों के असर और उनके घरेलू ग्रोथ व महंगाई पर पड़ने वाले असर का आकलन करना चाहता है, उसके बाद ही ब्याज दरों में किसी बदलाव पर विचार करेगा।
रजनी सिन्हा कहती हैं, भविष्य में ब्याज दरों की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि MPC ग्रोथ और महंगाई के बदलते समीकरण का किस प्रकार आकलन करती है। ये दोनों ही फैक्टर इस समय बाहरी परिस्थितियों से काफी प्रभावित हैं। अगर ग्लोबल हालात जल्दी स्थिर हो जाते हैं, तो MPC नियर टर्म की महंगाई बढ़ोतरी को नजरअंदाज कर सकती है, खासकर तब जब FY27 की अनुमानित वृद्धि दर अर्थव्यवस्था की संभावित 7 फीसदी वृद्धि दर से नीचे बनी हुई है। लेकिन अगर पश्चिम एशिया का संघर्ष लंबा चलता है और महंगाई का दबाव लोगों की अपेक्षाओं में स्थायी रूप से शामिल होने लगता है, तो साल की दूसरी छमाही में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
नवीन कुलकर्णी का कहना है कि RBI की मौजूदा नीति को ‘वेट एंड वॉच’ यानी हालात पर नजर रखने वाली रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। पश्चिम एशिया में जारी युद्ध को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है और युद्धविराम को लेकर कोई स्पष्ट नतीजा सामने नहीं आया है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमतों में जारी उतार-चढ़ाव और उनका ऊंचे स्तर पर बने रहना महंगाई के अनुमानों के लिए जोखिम पैदा करता है।
कुलकर्णी कहते हैं, तेल कीमतों के झटके के अलावा सामान्य से कमजोर मानसून भी महंगाई को और बढ़ा सकता है। इसके साथ ही रुपया डॉलर के मुकाबले तेजी से कमजोर हुआ है और इमर्जिंग मार्केट्स की करेंसीज में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा है। ये सभी फैक्टर मिलकर आने वाली मौद्रिक नीति बैठकों में RBI को ब्याज दरों के साइकल को पलटने यानी दरें बढ़ाने की दिशा में ले जा सकते हैं।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई राय एक्सपर्ट/ब्रोकरेज की है। बिज़नेस स्टैंडर्ड इन विचारों से सहमत होना जरूरी नहीं समझता और निवेश से पहले पाठकों को अपनी समझ से फैसला करने की सलाह देता है।)