शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआईएल) के शेयरों में भारी गिरावट देखने को मिली। इसकी वजह सरकार की ओर से पेट्रोल, डीज़ल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) पर निर्यात शुल्क लगाने का फ़ैसला रहा जिससे मार्जिन को लेकर बाजार की चिंता बढ़ गईं। शेयर इंट्राडे में करीब 5 फीसदी तक गिरा, लेकिन बीएसई पर 4.5 फीसदी की गिरावट के साथ 1,348.25 रुपये पर बंद हुआ।
आरआईएल का शेयर बीएसई सूचकांक में सबसे ज्यादा गिरने वाला शेयर रहा और सेंसेक्स में आई 1,690 अंकों (2.25 फीसदी) की गिरावट में इसका योगदान करीब 20 फीसदी था। विश्लेषकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ईंधन की बिक्री पर निर्यात शुल्क लगाने के सरकार के फैसले से मुकेश अंबानी के नियंत्रण वाली इस कंपनी के मुनाफे और मार्जिन पर बुरा असर पड़ सकता है।
वेल्थ मिल्स सिक्योरिटीज के इक्विटी रणनीतिकार क्रांति बाथिनी ने कहा, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ईंधन की बिक्री पर निर्यात शुल्क लगाने से निर्यात महंगा हो जाएगा, जिससे निकट भविष्य में कंपनी के मार्जिन को नुकसान पहुंचेगा।
शुक्रवार को केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किया कि कोई भी रिफ़ाइनरी जो विदेश में निर्यात करती है, उसे निर्यात कर देना होगा। बाद में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि सरकार डीजल के निर्यात पर 21.5 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ पर 29.5 रुपये प्रति लीटर का शुल्क लगाएगी, ताकि इन उत्पादों की घरेलू खपत के लिए उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
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खास बात यह है कि आरआईएल अपने उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा-पेट्रोल, डीज़ल, एटीएफ- दुनिया भर के बाजारों में निर्यात करती है, जहां कीमतें आमतौर पर भारत से ज्यादा होती हैं। इसलिए निर्यात शुल्क लगाने से आरआईएल की कमाई पर असर पड़ेगा। विश्लेषकों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल पर निर्यात शुल्क का मतलब है कि निर्यात किए गए हर बैरल पर कर। इससे आरआईएल के लिए शुद्ध प्राप्तियां कम हो जाएंगी और मार्जिन पर असर पड़ेगा।
दिसंबर 2025 तिमाही की कमाई के सिसलसिले में प्रेजेंटेशन के दौरान आरआईएल ने बताया था कि उसने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बिक्री के लिए कुल 1.77 करोड़ टन रिफाइंड ईंधन का उत्पादन किया, जो सालाना आधार पर 1.7 फीसदी ज्यादा है।
हालांकि उसने साफ-साफ यह नहीं बताया कि घरेलू बिक्री कितनी थी और निर्यात बिक्री कितनी थी।
आरआईएल ने इस बात पर जोर दिया कि उसने तिमाही के दौरान जामनगर रिफाइनरी के थ्रूपुट और घरेलू बाज़ार में बिक्री को अधिकतम बढ़ाया। उसने ट्रांसपोर्टेशन फ्यूल के लिए ऊंचे अंतरराष्ट्रीय मार्जिन (क्रैक) का भी फायदा उठाया। जहां वित्त वर्ष 26 की तीसरी तिमाही के लिए ओ2सी सेगमेंट से होने वाला राजस्व सालाना आधार पर 8.4 फ़ीसदी बढ़कर 1,62,095 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, वहीं सेगमेंट का एबिटा सालाना आधार पर 14.6 फ़ीसदी बढ़कर 16,507 करोड़ रुपये रहा।
आरआईएल ने बताया कि ओ2सी सेगमेंट में एबिटा वृद्धि का मुख्य कारण डीजल (एचएसडी) और पेट्रोल (एमएस) के निर्यात मार्जिन में बढ़ोतरी थी, जहां स्प्रेड में सालाना आधार पर क्रमशः 1.5 गुना और करीब 2 गुना की उछाल देखने को मिली।
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सरकार की घोषणा से पहले मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज़ के विश्लेषकों ने अनुमान लगाया था कि अगर वित्त वर्ष 27 की पहली छमाही के दौरान गैसऑयल/गैसोलीन/जेट फ्यूल क्रैक ऐतिहासिक औसत से 15/5/15 डॉलर प्रति बैरल ऊपर रहते हैं, तो आरआईएल का ओ2सी एबिटा 17,000 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है, जिससे उसका वित्त वर्ष 27 का एकीकृत एबिटा अनुमानित तौर पर लगभग 8.5 फीसदी बढ़ जाएगा।
एमओएफएसएल ने बताया, फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद वित्त वर्ष 23/24 के दौरान गैसऑयल रिफाइनिंग मार्जिन ऊंचे बने रहे। आरआईएल का एकीकृत ओ2सी एबिटा वित्त वर्ष 23 में सालाना आधार पर 18 फीसदी बढ़ा और वित्त वर्ष 24 में बिक्री के लिए उत्पादन लगभग स्थिर या थोड़ा कम होने के बावजूद स्थिर बना रहा।
ट्रांसपोर्टेशन फ्यूल के निर्यात पर चुकाए गए विंडफॉल टैक्स को समायोजित करने के बाद उसका ओ2सी एबिटा वित्त वर्ष 23 में सालाना आधार पर 30 फीसदी बढ़ा। हालांकि, उसने यह भी कहा कि ईंधन पर निर्यात शुल्क को फिर से लागू करने से (जुलाई 2022 के विंडफॉल टैक्स की तरह) रिफाइनिंग मार्जिन सीमित हो सकते हैं और ओ2सी कमाई में बढ़ोतरी सीमित रह सकती है।
कंपनी के मार्जिन पर बारीकी से नजर रखी जा रही है। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि कंपनी का शेयर कम समय के लिए अस्थिर रह सकता है। हालांकि, वे कंपनी की लंबी अवधि की वृद्धि रणनीति का समर्थन करना जारी रखे हुए हैं