विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका-ईरान शांति समझौते से तनाव कम होने और घरेलू क्षेत्रों में कई सेक्टरों को लाभ होने की संभावना है। लेकिन लोगों को निवेश करने से पहले समझौते की बारीकियों को समझ लेना चाहिए। बर्नस्टीन के विश्लेषकों का कहना है कि इस समय अमेरिका और ईरान, दोनों ही पक्ष घरेलू राजनीतिक दबावों के कारण अपने एजेंडे को साधने की कोशिश कर सकते हैं, और चकराने वाली कुछ बातें थोड़े हफ्तों के बाद सामने आ सकती हैं।
बर्नस्टीन को उम्मीद है कि तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) को कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी से लाभ होने की संभावना है। तेल कीमतें सोमवार को लगभग 4 प्रतिशत घटकर 83 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं। साथ ही, विमानन, यात्रा और खाड़ी व उत्तर अफ्रीका से जुड़े शेयर भी सीधे तौर पर फायदे में होंगे। इस शोध एवं ब्रोकिंग फर्म ने साल के अंत तक निफ्टी का लक्ष्य 26,000 अंक तय किया है, जो मौजूदा स्तरों से करीब 8.3 प्रतिशत की वृद्धि है।
बर्नस्टीन के प्रबंध निदेशक, वेणुगोपाल गैरे ने कहा, ‘अमेरिकी मूल्य निर्धारण के दबाव में नरमी के कारण हमें स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में लगातार सुधार की उम्मीद है। हमें युद्ध के निर्णायक अंत के बाद पश्चिम एशिया में ऊर्जा और जल सुविधाओं से जुड़ी कई घोषणाएं होने की भी उम्मीद है, जिससे आने वाले महीनों में कुछ औद्योगिक कंपनियों को सहारा मिल सकता है। इसके अलावा, ब्याज दर में वृद्धि का दबाव कम हो सकता है और अमेरिका में खर्च करने के माहौल में सहजता आ सकती है, जो सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लिए संभवतः मददगार होगा।’
19 जून को अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने की खबर से सोमवार को वैश्विक बाजारों में तेजी आई। दिन के कारोबार के दौरान सेंसेक्स और निफ्टी 50 दोनों में 1.3 फीसदी से ज्यादा की बढ़त देखी गई।
आईएनवीऐसेट पीएमएस के पार्टनर और फंड प्रबंधक अनिरुद्ध गर्ग के अनुसार अगर युद्धविराम कायम रहता है और ऊर्जा बाजार में स्थिरता आती है, तो भारत के जिन सेक्टरों को सबसे ज्यादा फायदा होगा, वे हैं – ओएमसी, विमानन, लॉजिस्टिक्स, सीमेंट, पेंट्स, ऑटो और कुछ चुनिंदा वित्तीय क्षेत्र।
उनका मानना है कि पूंजी बाजार के मध्यस्थ भी अहम हो सकते हैं, क्योंकि कम भू-राजनीतिक जोखिम से फंड का फ्लो, रिस्क लेने की क्षमता और ट्रेडिंग गतिविधियां फिर से बढ़ सकती है। फार्मा एक रक्षात्मक दांव बना हुआ है। विद्युत क्षेत्र ढांचागत तौर पर अहम है। लेकिन पश्चिम एशिया से जुड़े घटनाक्रम का तुरंत असर आयात लागत में राहत के तौर पर दिखेगा।
इसके बावजूद, अल्फानीति फिनटेक के सह-संस्थापक और निदेशक यू आर भट निवेशकों को सलाह देते हैं कि वे तेजी के दौरान अपने कुछ शेयर बेच दें, क्योंकि स्विट्जरलैंड में असली समझौते पर दस्तखत होने (19 जून को) में अभी भी समय है।