प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
इस हफ्ते शेयर बाजार में थोड़ा उथल-पुथल रह सकता है। लोग खासकर भारतीय रिजर्व बैंक की पॉलिसी मीटिंग पर नजर रख रहे हैं, क्योंकि उससे ब्याज दरों और बाजार के मूड पर असर पड़ता है। इसके अलावा दुनियाभर के आर्थिक आंकड़े और पश्चिम एशिया में चल रहा तनाव भी बाजार को प्रभावित कर सकता है। अगर कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतें बढ़ती-घटती हैं या विदेशी निवेशक पैसा लगाते या निकालते हैं, तो उससे भी बाजार ऊपर-नीचे हो सकता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस हफ्ते बाजार काफी संवेदनशील रहेगा। पिछले छोटे हफ्ते में सेंसेक्स 263.67 अंक यानी 0.35 फीसदी गिरकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 106.5 अंक या 0.46 फीसदी नीचे आया। अब तीन दिन की छुट्टी के बाद बाजार फिर खुलेगा और दुनिया भर में चल रही घटनाओं का सीधा असर दिख सकता है।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के रिसर्च हेड विनोद नायर का कहना है कि इस हफ्ते सबसे ज्यादा नजर भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पर रहेगी। निवेशक यह समझने की कोशिश करेंगे कि RBI महंगाई और ग्रोथ को लेकर क्या सोच रहा है। फिलहाल ज्यादातर एक्सपर्ट्स मान रहे हैं कि ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं होगा, यानी रेट फिलहाल रुके रह सकते हैं।
RBI के सामने चुनौती यह है कि एक तरफ कच्चे तेल की कीमतें महंगाई बढ़ा सकती हैं, वहीं दूसरी तरफ मैन्युफैक्चरिंग PMI चार साल के निचले स्तर पर आ गया है, जो बताता है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार थोड़ी धीमी पड़ रही है। ऐसे में RBI को दोनों चीजों के बीच बैलेंस बनाना होगा। साथ ही गवर्नर की बातें इस बात का संकेत दे सकती हैं कि आगे ब्याज दरों का रुख क्या रहेगा और FY27 के लिए क्या अनुमान लगाए जा रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर इस हफ्ते अमेरिका के मार्च CPI (महंगाई) के आंकड़े काफी अहम रहने वाले हैं। अगर महंगाई उम्मीद से ज्यादा रहती है, तो फेडरल रिजर्व के ब्याज दर घटाने की उम्मीदों को झटका लग सकता है। ऐसे में डॉलर मजबूत होगा और भारत जैसे उभरते बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है।
वहीं, विनोद नायर के मुताबिक पश्चिम एशिया में चल रही भू-राजनीतिक घटनाएं इस समय बाजार की भावना (sentiment) को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रही हैं। भारतीय बाजार छुट्टी के बाद खुल रहा है, इसलिए वीकेंड में युद्ध से जुड़ी कोई भी बड़ी खबर सीधे बाजार पर असर डाल सकती है। कुल मिलाकर, अब नजर इस बात पर रहेगी कि कच्चे तेल (crude oil) की कीमतें किस दिशा में जाती हैं और क्या कोई भरोसेमंद सीजफायर (ceasefire) का संकेत मिलता है या नहीं।
अगर तनाव कम होता है तो बाजार में तेज रिकवरी (रैली) आ सकती है, लेकिन अगर हालात बिगड़ते हैं तो बिकवाली जारी रह सकती है।
मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज के वेल्थ मैनेजमेंट रिसर्च हेड सिद्धार्थ खेमका का कहना है कि बाजार में अभी उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, क्योंकि निवेशकों का पूरा फोकस पश्चिम एशिया के हालात पर है। ब्रेंट क्रूड करीब 107 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है, जिससे आयातित महंगाई (imported inflation) का खतरा बढ़ गया है। रुपये पर भी दबाव दिखा था, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के दखल के बाद यह करीब 93 के आसपास संभला।
मार्च में विदेशी निवेशकों (FII) ने जमकर बिकवाली की और करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये बाजार से निकाल लिए, जो पिछले कई सालों के बड़े आउटफ्लो में से एक है। आगे निवेशकों की नजर अमेरिका के फेडरल ओपन मार्केट कमेटी के मिनट्स, GDP डेटा और बेरोजगारी के शुरुआती आंकड़ों पर रहेगी, जिससे यह संकेत मिलेगा कि अर्थव्यवस्था और नीतियों का रुख कैसा रहेगा।
कुल मिलाकर, अगर पश्चिम एशिया में तनाव कम होता है तो कच्चे तेल की कीमतें नीचे आ सकती हैं और रुपये में स्थिरता आएगी, जिससे बाजार को राहत मिल सकती है। लेकिन अगर संघर्ष बढ़ता है, तो निवेशक जोखिम लेने से बचेंगे और विदेशी फंडों पर दबाव बना रह सकता है, जिससे बाजार में गिरावट जारी रह सकती है।
(PTI के इनपुट के साथ)