SEBI Bond Market Reforms: देश में बीते कुछ सालों में शेयर बाजार में निवेशकों का रुझान तेजी से बढ़ता दिखाई दिया है। खासकर, रिटेल निवेशकों की भागीदारी में अच्छा-खासा उछाल देखने को मिला है। बाजार के इस बढ़ते आकर्षण के बीच बाजार नियामक सेबी (SEBI) अब देश के बॉन्ड मार्केट को भी बड़ा बनाने की तैयारी में है। सेबी चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट में निवेश करें और कंपनियों को भी फंड जुटाने के नए विकल्प मिल सके। ऐसे में अहम सवाल यह कि सेबी की इस कोशिश से रिटेल निवेशकों के लिए क्या बदलेगा?
दरअसल, सेबी बॉन्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड यानी बॉन्ड ETF और कॉरपोरेट बॉन्ड इंडेक्स से जुड़े डेरिवेटिव प्रोडक्ट लाने की तैयारी कर रहा है। हाल ही में एक कार्यक्रम में सेबी चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने कहा था कि बॉन्ड ETF और कॉरपोरेट बॉन्ड इंडेक्स से जुड़े डेरिवेटिव प्रोडक्ट से बॉन्ड मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ेगी, छोटे निवेशकों की पहुंच आसान होगी और संस्थागत निवेशकों को ब्याज दर जोखिम से बचाव के बेहतर विकल्प मिलेंगे।
| संकेतक | भारत | चीन | मलेशिया | दक्षिण कोरिया |
|---|---|---|---|---|
| कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट का आकार (GDP के प्रतिशत के रूप में) | 16% | 36% | 55% | 76% |
| स्थिति | अभी शुरुआती स्तर पर | भारत से 2 गुना से अधिक बड़ा | भारत से 3 गुना से अधिक बड़ा | भारत से लगभग 5 गुना बड़ा |
भारत में कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है। सेबी के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2015 में जहां बकाया कॉरपोरेट बॉन्ड करीब 17.5 लाख करोड़ रुपये थे, वहीं अब यह बढ़कर 59 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुके हैं।
इसके बावजूद भारत का बॉन्ड मार्केट अभी भी दुनिया के कई बड़े देशों से काफी छोटा है। केयरएज रेटिंग्स (CareEdge Ratings) की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट देश की जीडीपी का सिर्फ 16% है, जबकि चीन में यह 36%, मलेशिया में 55% और दक्षिण कोरिया में 76% तक पहुंच चुका है।
केयरएज रेटिंग्स के एमडी एंड सीईओ मेहुल पंड्या का कहना है कि अगर भारत को 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है, तो देश को मजबूत और गहरे डेट मार्केट की जरूरत होगी। उनके मुताबिक, ज्यादा निवेशकों को जोड़ने, विदेशी भागीदारी बढ़ाने और बॉन्ड ETF व बॉन्ड डेरिवेटिव जैसे प्रोडक्टों को बढ़ावा देने की जरूरत है।
बाजार नियामक सेबी की कोशिश तो बॉन्ड मार्केट को आम लोगों तक पहुंचाने की है लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि यह आसान नहीं होगा। फोनपे मयुचुअल फंड्स (PhonePe Mutual Funds) के प्रमुख निलेश डी नाइक बताते हैं, भारत में रिटेल निवेशक अभी भी ज्यादा रिटर्न वाले निवेश विकल्पों की तरफ आकर्षित होते हैं। यही वजह है कि इक्विटी म्युचुअल फंड और शेयर बाजार तेजी से लोकप्रिय हुए, जबकि डेट फंड और बॉन्ड में आम निवेशकों की हिस्सेदारी काफी कम रही।
उन्होंने बताया कि डेट म्युचुअल फंड कई दशकों से उपलब्ध हैं, लेकिन कुल निवेश में इनकी हिस्सेदारी 8% से भी कम है। रिटेल निवेशकों की बात करें, तो यह आंकड़ा बेहद कम है। पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन बॉन्ड प्लेटफॉर्म्स के जरिए सीधे बॉन्ड खरीदना आसान जरूर हुआ है, लेकिन ज्यादातर छोटे निवेशक ज्यादा ब्याज वाले कम रेटिंग वाले बॉन्ड की तरफ आकर्षित होते हैं। यही सबसे बड़ा जोखिम भी बन सकता है क्योंकि अगर निवेश सिर्फ एक-दो कंपनियों तक सीमित हो जाए, तो नुकसान की आशंका बढ़ जाती है।
उनका मानना है कि बॉन्ड डेरिवेटिव जैसे प्रोडक्ट हाई नेटवर्थ निवेशकों के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन इससे रिटेल निवेशकों की भागीदारी बहुत ज्यादा नहीं बढ़ेगी।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर सरकार बॉन्ड और डेट फंड में निवेश बढ़ाना चाहती है, तो टैक्स व्यवस्था में बदलाव जरूरी होगा। केयरएज रेटिंगस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि डेट प्रोडक्टों पर टैक्स का बोझ कम करने और उन्हें दूसरे निवेश विकल्पों के बराबर लाने की जरूरत है।
नाइक कहते हैं, टैक्स इन्सेंटिव के बिना छोटे निवेशक सिर्फ ज्यादा रिटर्न वाले जोखिमभरे बॉन्ड की तरफ जाएंगे। जोखिम और रिटर्न के लिहाज से डेट फंड रिटेल निवेशकों के लिए बेहतर विकल्प हो सकते हैं क्योंकि इनमें निवेश कई बॉन्ड में बंटा होता है और फंड मैनेजर क्रेडिट रिस्क और ब्याज दर जोखिम को बेहतर तरीके से संभाल सकते हैं।
सेबी सिर्फ नए निवेश प्रोडक्टों पर ही काम नहीं कर रहा, बल्कि नियमों में भी बदलाव पर विचार कर रहा है। अभी सिर्फ डेट-लिस्टेड कंपनियों पर भी वही LODR नियम (लिस्टिंग ऑब्लिगेशंस एंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) लागू होते हैं, जो इक्विटी कंपनियों पर लागू होते हैं। सेबी अब इन नियमों को आसान बनाने की समीक्षा कर रहा है ताकि बॉन्ड बाजार में कंपनियों की भागीदारी बढ़ सके।
इसके अलावा सेबी कॉरपोरेट बॉन्ड की टोकनाइजेशन पर भी पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी में है। इसमें डिजिटल लेजर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होगा, जिससे तेज सेटलमेंट, बेहतर पारदर्शिता और ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं मिल सकती हैं।
सेबी चेयरमैन के मुताबिक, नई तकनीकों के फायदे जरूर हैं, लेकिन इससे जुड़े जोखिमों को भी समझना जरूरी है। इसलिए सेबी सभी पक्षों से चर्चा के बाद आगे बढ़ेगा।
भारत का बॉन्ड मार्केट तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी इसमें लिक्विडिटी, निवेशकों की विविधता और रिटेल भागीदारी की कमी है। अभी ज्यादातर निवेश बैंक और बड़े संस्थागत निवेशक करते हैं।
एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर भारत को लंबी अवधि के इंफ्रास्ट्रक्चर और विकास प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े स्तर पर पूंजी जुटानी है, तो सिर्फ बैंकिंग सिस्टम पर निर्भर रहना काफी नहीं होगा। ऐसे में मजबूत बॉन्ड मार्केट भारत की आर्थिक वृद्धि में बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसके लिए सिर्फ नए प्रोडक्ट लाना काफी नहीं होगा। निवेशकों को शिक्षित करना, टैक्स राहत देना और बाजार को ज्यादा भरोसेमंद और आसान बनाना भी उतना ही जरूरी होगा।