इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
तेल संकट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कितना गंभीर है? भारत को मौजूदा हालात से क्या सबक लेना चाहिए, जब कीमतों में बढ़ोतरी और तेल-गैस की किल्लत ने आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि भारत की पेट्रोलियम कंपनियों तथा सरकार की वित्तीय स्थिति पर तेल संकट का असर मापने के लिए ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत सही पैमाना नहीं है। इसके लिए कच्चे तेल की भारतीय बास्केट के दाम पर नजर रखना जरूरी है। भारतीय रिफाइनरों और सरकार के बाहरी खाते पर तेल संकट का असर इसी से आंका जा सकता है। 19 मार्च तक भारतीय बास्केट की कीमत लगभग 150 डॉलर प्रति बैरल थी। उसी दिन ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 105 से 108 डॉलर प्रति बैरल के बीच झूल रही थी।
भारतीय बास्केट की कीमत विभिन्न प्रकार के कच्चे तेल के मिश्रण से निकाली जाती है, जिसमें ओमान और दुबई तेल के सावर ग्रेड के साथ स्वीट ग्रेड ब्रेंट शामिल होता है। भारतीय कंपनियों की रिफाइनिंग में सावर ग्रेड का अनुपात 79 होता है और ब्रेंट क्रूड का 21। इस अनुपात वाले मिश्रण की वजह से ही भारतीय बास्केट और ब्रेंट क्रूड के दामों में इतना अंतर दिखता है। इस अंतर की अनदेखी नहीं की जा सकती है क्योंकि इसी से पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था किस किस्म के संकट से जूझ रही है।
इसीलिए भारतीय रिफाइनरों के कामकाज पर कच्चे तेल के ऊंचे दामों का असर अभी पूरी तरह दिख ही नहीं पाया है। कुछ ही दिन में समाप्त होने जा रहे चालू वित्त वर्ष में भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की औसत कीमत लगभग 71 डॉलर प्रति बैरल रही। यह 2024-25 में भारतीय बास्केट की 78.56 डॉलर प्रति बैरल औसत कीमत से कुछ कम ही है। इसलिए कच्चे तेल के दाम के मामले में भारतीय तेल कंपनियों और भारतीय अर्थव्यवस्था पश्चिम एशियाई युद्ध का असर मौजूदा वित्त वर्ष में पूरी तरह नहीं दिख सकेगा। लेकिन आने वाले वित्त वर्ष में इसका असर महसूस होगा क्योंकि संकट के शीघ्र समाधान के कोई संकेत नहीं हैं।
नरेंद्र मोदी सरकार अपने कार्यकाल (2014 से अब तक) में तेल कीमतों के मामले में अपेक्षाकृत भाग्यशाली रही है। मनमोहन सिंह सरकार के अंतिम तीन वर्षों में कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की औसत सालाना कीमत 105 से 112 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही। मगर मोदी सरकार के 12 वर्षों में औसत सालाना कीमत 46 से 93 डॉलर प्रति बैरल के बीच रही है। इनमें भी सात वर्षों में तो तेल की औसत कीमत उनसे पिछले वर्षों की तुलना में कम ही रही। भारतीय रिफाइनर जो कच्चा तेल इस्तेमाल करते हैं, उनकी औसत सालाना कीमत पिछले दो वर्ष में 11 प्रतिशत और 5 प्रतिशत से अधिक गिर गई।
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मगर कच्चे तेल के कम दाम वाले इन 12 वर्षों पर नजर डालें तो परेशान करने वाली एक बात दिखती है। क्या मोदी सरकार ने इस अवधि का इस्तेमाल पेट्रोलियम के आयात पर देश की बढ़ती निर्भरता की समस्या दूर करने में किया? देश ने अपनी नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने के मामले में अच्छा काम किया है मगर क्या सरकार को आयात पर निर्भरता कम करने तथा देश के भीतर पेट्रोलियम प्रोसेसिंग बढ़ाने पर भी इतना ही ध्यान देना चाहिए था?
सरकार ने बीते कुछ वर्षों में तेल आयात पर देश की निर्भरता कम करने के लिए कई नीतिगत घोषणाएं और योजनाएं पेश की हैं। परंतु हकीकत कुछ और है। वर्ष 2014 से भारत के भीतर कच्चे तेल का उत्पादन हर वर्ष घटता जा रहा है। घरेलू उत्पादन 2014-15 में 3.59 करोड़ टन था, जो 2024-25 में घटकर 2.65 करोड़ टन रह गया। इस वित्त वर्ष में अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 तक देश में 2.38 करोड़ टन कच्चे तेल का उत्पादन हुआ, जिससे पता चलता है कि इस वर्ष भी उत्पादन में गिरावट ही होगी।
ध्यान देने की बात है कि इन वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही थी और कच्चे तेल की मांग भी बढ़ रही थी। कच्चे तेल का आयात 2014-15 के 18.9 करोड़ टन से बढ़कर 2024-25 में 24.3 करोड़ टन हो गया। इस तरह आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता 2014-15 में 84 प्रतिशत थी, जो बढ़कर पिछले वर्ष 90 प्रतिशत तक हो गई।
साफ है कि सरकार की लागत वसूलने वाली नई उत्खनन लाइसेंसिंग नीति (एनईएलपी) के बजाय 2016 में कथित निवेशक-अनुकूल हाइड्रोकार्बन उत्खनन और लाइसेंसिंग नीति (एचईएलपी) अपनाने की नीतिगत पहलें अब तक अपेक्षित परिणाम देने में विफल रही हैं। भारत का घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगातार गिरता रहा है और नई उत्खनन नीति से ज्यादा फायदा भी नहीं मिला है।
पेट्रोलियम उत्पादों की स्थिति क्या है? भारतीय तेल रिफाइनिंग और विपणन कंपनियों ने घरेलू उत्पादन बढ़ाया है, लेकिन आयात में कमी करने के लिए यह काफी नहीं रहा है। वर्ष 2014-15 भारत ने 2.1 करोड़ टन पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए थे, जो आंकड़ा 2024-25 में दोगुने से भी ज्यादा होकर 5.1 करोड़ टन पर पहुंच गया। तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) या रसोई गैस का देश के भीतर उत्पादन बहुत धीमी गति से बढ़ा है। वर्ष 2014-15 में 98.4 लाख टन से यह 2024-25 में 1.28 करोड़ टन तक ही पहुंच पाया है मगर इसी दौरान एलपीजी की मांग 1.8 करोड़ टन से बढ़कर 3.3 करोड़ टन पार कर गई है।
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इस तरह पहले एलपीजी की 46 प्रतिशत मांग आयात से पूरी होती थी मगर अब 62 प्रतिशत एलपीजी आयात से मिलती है। स्पष्ट है कि सरकार ने घरेलू एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए, जबकि ग्रामीण घरों में एलपीजी उपयोग को बढ़ावा देने की योजनाएं शुरू कर दी गईं, जिनसे इसकी मांग बहुत बढ़ गई।
कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी नीतियां शायद इसलिए नहीं बनीं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय दाम बहुत कम बढ़े। कच्चे तेल के अपेक्षाकृत कम अंतरराष्ट्रीय मूल्य के कारण इसके आयात पर भारत का खर्च 2014-15 से 2024-25 के साल में सालाना औसतन 2.16 प्रतिशत की दर से बढ़ा। पेट्रोलियम उत्पादों के आयात का खर्च थोड़ा तेज औसतन 9.5 प्रतिशत सालाना रफ्तार से बढ़ा मगर इस वृद्धि के कारण न तो तेल कंपनियों और न ही सरकार ने घरेलू पेट्रोलियम उत्पादन बढ़ाने के लिए कदम उठाए।
अगर सरकार देश के भीतर कच्चे तेल का उत्पादन अच्छा खासा बढ़ाने की खातिर तेल उत्खनन नीतियों में सुधार की विस्तृत कार्य योजना पेश नहीं करती है तो उसके सामने खड़ा वर्तमान तेल संकट खोया हुआ मौका ही साबित होगा। अगर सरकार सभी पेट्रोलियम रिफाइनिंग और विपणन कंपनियों को एलपीजी सहित पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन और भी बड़े पैमाने पर करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकी तो यह और भी चिंता की बात होगी। सरकार को इन उत्पादों की मूल्य निर्धारण नीतियों की भी समीक्षा करनी चाहिए ताकि कंपनियों को अधिक उत्पादन करने के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन मिले और इसके लिए न तो उनका मार्जिन कम हो और न ही सरकारी सब्सिडी पर उनकी निर्भरता बढ़े।