प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
गत माह ओपनएआई ने 882 अरब डॉलर के मूल्यांकन पर फंड जुटाया और वह जल्दी ही एक लाख करोड़ डॉलर से अधिक की कंपनी बन सकती है। क्या भारत भी ऐसी कंपनी बना पाएगा और अगर हां तो कब? इसका उत्तर वैश्विक संदर्भ में निहित है। ऐसी कंपनियां दुर्लभ हैं: यूरोप, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया या ताइवान में ऐसी कोई कंपनी नहीं है। केवल अमेरिका में ही एनवीडिया, ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट, अल्फाबेट और एमेजॉन के रूप में ऐसी कंपनियां हैं और टेस्ला ने 2021 में कम समय के लिए ही सही लेकिन यह दर्जा हासिल किया था।
भारत की सबसे बड़ी कंपनियों का मूल्यांकन 200-300 अरब डॉलर है यानी उन्हें उस स्तर तक पहुंचने के लिए अपना मूल्यांकन चार से पांच गुना बढ़ाना होगा। 15 फीसदी की वार्षिक वृद्धि दर के साथ भी ऐसा होने में एक दशक से अधिक का वक्त लग सकता है। असली चुनौती पैमाना नहीं है बल्कि वे ढांचागत कारक हैं जो यह तय करते हैं कि ऐसी कंपनियां कैसे उभरेंगी?
अमेरिकी कॉरपोरेट मूल्यांकन का विकास दिखाता है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की तुलना में पैमाना कैसे बढ़ा है। 1870 के दशक में न्यूयॉर्क सेंट्रल रेलरोड 10 करोड़ डॉलर तक पहुंची जिसके बाद 1912 में स्टैंडर्ड ऑयल 1 अरब डॉलर तक पहुंची। 1955 में जनरल मोटर्स ने 10 अरब डॉलर का आंकड़ा पार किया जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 0.26 फीसदी था। 1995 में जनरल इलेक्ट्रिक 100 अरब डॉलर तक पहुंची जो वैश्विक जीडीपी का 0.33 फीसदी था।
इसके उलट 2023 में ऐपल का 3 लाख करोड़ डॉलर (वैश्विक जीडीपी का 2.8 फीसदी) और 2025 में एनवीडिया का 5 लाख करोड़ डॉलर (वैश्विक जीडीपी का 4.5 फीसदी) तक पहुंचना, कम अवधि में भारी वृद्धि को दर्शाता है। यह विकास विभिन्न क्षेत्रों में फैला है: अधोसंरचना, ऊर्जा, औद्योगिक वस्तुएं, जिसके बाद ज्ञान-आधारित उद्योगों की ओर बदलाव हुआ। पहले की वृद्धि बाजारों पर नियंत्रण पर निर्भर थी। वैश्विक विस्तार स्थानीय उत्पादन आवश्यकताओं, टैरिफ और प्रतिस्पर्धा द्वारा सीमित था।
इलेक्ट्रॉनिक्स और डिजिटल तकनीक का उदय ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बदलाव को दर्शाता है, जहां मूल्य कच्चे माल से हटकर डिजाइन और बौद्धिक संपदा पर केंद्रित हो गया। 1996 के सूचना प्रौद्योगिकी समझौते ने इलेक्ट्रॉनिक्स पर शुल्क समाप्त कर दिए, जिससे एक वैश्विक बाजार बना जहां उच्च-मूल्य वाले उत्पाद तुरंत विस्तार कर सकते थे। 2000 के दशक में इंटरनेट ने जानकारी को एक व्यापार योग्य वस्तु में बदल दिया, जिससे डिजिटल उत्पाद बिना भौतिक सीमाओं के वैश्विक उपयोगकर्ताओं तक पहुंच सकें।
मजबूत नेटवर्क प्रभावों ने शुरुआती कंपनियों, मुख्यतः अमेरिकी फर्मों, को तेजी से विस्तार करने, दूसरों के लिए प्रवेश अवरोध बनाने और अभूतपूर्व मूल्यांकन हासिल करने में सक्षम बनाया। इस युग में बौद्धिक संपदा धन का प्राथमिक स्रोत बन गई। यहां तक कि जब विनिर्माण को आउटसोर्स किया गया, तब भी मूल्य उन लोगों को मिला जिन्होंने डिजाइन, तकनीक और प्लेटफॉर्म पर नियंत्रण रखा। वैश्विक दिग्गज कंपनियां बनाने की कुंजी वस्तुओं के उत्पादन से हटकर विचारों के स्वामित्व और उनके मुद्रीकरण की ओर स्थानांतरित हो गई।
अमेरिका की तुलना में भारत का ढांचा अधिक नियंत्रित है। इसके चलते एक लाख करोड़ डॉलर की कंपनी बनने की यात्रा को धीमा हो सकती है। हालांकि इसका बड़ा और बढ़ता हुआ बाजार लाभदायक साबित हो सकता है। अब तक भारतीय कॉरपोरेट वृद्धि मुख्य रूप से अधोसंरचना, ऊर्जा, वित्त और आईटी सेवाओं में रही है। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां पैमाना परिसंपत्तियों या श्रम पर निर्भर करता है। यहां तक कि आईटी सेवाएं भी, तकनीक-आधारित होने के बावजूद, प्लेटफॉर्म या बौद्धिक संपदा के स्वामित्व के बजाय डिलिवरी पर केंद्रित हैं।
परिणामस्वरूप, मजबूत वृद्धि के बावजूद, इन मॉडलों की सीमाएं हो सकती हैं। इनमें प्लेटफॉर्म और बौद्धिक संपदा-आधारित व्यवसायों की तीव्र विस्तार क्षमता का अभाव है, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर लाख करोड़ डॉलर की कंपनियां बनाई हैं। भारत की पहली एक लाख करोड़ डॉलर की कंपनी उस टेक्नॉलजी पर आधारित होगी जिसकी वह न केवल संचालक होगी, बल्कि उसकी मालिक भी होगी। भारत इस नींव का निर्माण शुरू कर रहा है।
नई पीढ़ी के संस्थापक, जोहो, फ्रेशवर्क्स और पोस्टमैन आदि कंपनियों से प्रेरित होकर आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और बायोटेक में उत्पादों और बौद्धिक संपदा पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। बड़े समूह भी दिशा बदल रहे हैं। उदाहरण के लिए, रिलायंस इंडस्ट्रीज, अदाणी समूह, टाटा और अन्य पारंपरिक क्षेत्रों से आगे बढ़कर तकनीक-आधारित रणनीतियों की ओर बढ़ रहे हैं।
एक और संभावना यह है कि भारत की पहली एक लाख करोड़ डॉलर की कंपनी किसी अप्रत्याशित जगह से आए। यानी बजाय रिलायंस इंडस्ट्रीज या टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज के बेंगलुरु, चेन्नई या हैदराबाद में एक छोटी टीम से, जो आज किसी विशेष क्षेत्र में काम कर रही है। इतिहास तो यही बताता है। एनवीडिया 1993 में एक छोटे स्टार्टअप के रूप में शुरू हुई, 2013 में इसका मूल्यांकन 8 अरब डॉलर था, और 2025 तक यह 5 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गई।
भारत में ऐसे नवाचार के लिए अच्छी गुंजाइश है। इसका पैमाना अनोखी समस्याएं पैदा करता है जिनके समाधान पूरे विकासशील विश्व में लागू हो सकते हैं। उदाहरण के लिए खेती को लेते हैं। 10 करोड़ से अधिक किसानों और फसल के बाद होने वाली ऊंची हानियों के साथ एक एआई उपकरण जो वास्तविक समय में स्थानीय सलाह दे सके, अरबों डॉलर का मूल्य तैयार कर सकता है। दुनिया में वास्तविक बाजार करीब एक अरब किसानों तक फैला हुआ है। जो कंपनी इस समस्या को बड़े पैमाने पर हल करेगी, वह किसी सेवा फर्म जैसी नहीं होगी, बल्कि एनवीडिया जैसी कंपनी होगी जिसके पास एक ऐसी अहम टेक्नॉलजी होगी जिस पर पूरी दुनिया निर्भर करती है।
स्वास्थ्य क्षेत्र भी इसी तरह का अवसर प्रदान करता है। प्रशिक्षित डॉक्टरों की बड़ी संख्या के बावजूद, विशेषज्ञों तक पहुंच असमान बनी हुई है। एआई डायग्नोस्टिक्स इस अंतर को पाट सकते हैं, लेकिन इसके लिए बड़े और विविध डेटा सेट की आवश्यकता होती है, जिसे भारत अद्वितीय रूप से बड़े पैमाने पर उत्पन्न करता है। ऐसे डेटा पर आधारित एक विश्वसनीय, नियामक-अनुमोदित एआई डायग्नोस्टिक प्लेटफॉर्म न केवल भारत बल्कि कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों की सेवा कर सकता है, जो समान तरह की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
एनवीडिया ने डेटा सेंटर्स के लिए चिप्स बनाकर एआई की पहली लहर का नेतृत्व किया। अगला चरण ‘एज एआई’ की ओर बढ़ता है, जिसमें फोन, सेंसर और वाहनों जैसे उपकरणों पर मॉडल चलाए जाते हैं। इसके लिए छोटे, ऊर्जा-कुशल और कार्य-विशिष्ट चिप की आवश्यकता होती है। यह बाजार अभी भी खुला है और बड़े मॉडल बनाने की तुलना में कहीं कम पूंजी-गहन है। भारत का बढ़ता हुआ चिप डिजाइन इकोसिस्टम, जो आईआईटी और स्टार्टअप्स द्वारा संचालित है, अच्छी स्थिति में है। कृषि, स्वास्थ्य सेवा या उद्योग के लिए ऐसी खास चिप डिजाइन करने वाली कंपनी विशाल वैश्विक बाजार तक पहुंच सकती है, साथ ही मूल तकनीक की मालिक भी बन सकती है।
इससे साफ सबक मिलता है कि ज्ञान-आधारित युग में सबसे अधिक मूल्य उन लोगों को मिलता है जो परिभाषित तकनीक के मालिक होते हैं, न कि केवल उसे लागू करने वाले। हम यह नहीं जानते कि कौन सी भारतीय कंपनी एक लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचेगी, लेकिन वह केवल दूसरों की तकनीक का उपयोग करके वहां नहीं पहुंचेगी।
वह वहां पहुंचेगी क्योंकि वह स्वयं तकनीक बनाएगी और उसकी मालिक होगी। जैसा कि माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल और एनवीडिया के साथ देखा गया है, सबसे ऊंचे मूल्यांकन उन कंपनियों को मिलते हैं जो अपने युग की परिभाषित तकनीकों को नियंत्रित करती हैं। भारत की पहली एक लाख करोड़ डॉलर वाली कंपनी भी इससे अलग नहीं होगी।
(लेखक संघ लोक सेवा आयोग के चेयरमैन और पूर्व रक्षा सचिव हैं। ये उनके निजी विचार हैं)