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सीईआर, यूसीएफ और नगर निगम बॉन्ड: भारत के शहरी विकास में फाइनैंसिंग की नई दिशा

शहरी पुनर्संरचना के तीन स्तंभों को देखें तो सीईआर सही पैमाना प्रदान करते हैं, यूसीएफ निजी भागीदारी को सुसंगत बनाते हैं और नगर निगम बॉन्ड बाजार अनुशासन लाते हैं

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विनायक चटर्जी   
Last Updated- April 01, 2026 | 9:33 PM IST

सिटी इकनॉमिक रीजन (सीईआर), अर्बन चैलेंज फंड (यूसीएफ) और नगर निगम बॉन्ड की ओर बढ़ता रुझान इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि शहरों को केवल फंडिंग से आगे बढ़कर फाइनैंसिंग की दिशा में ले जाया जा रहा है। फाइनैंसिंग के लिए पुनर्भुगतान क्षमता, जोखिम मूल्य का निर्धारण, पारदर्शी अंकेक्षण और राजस्व संबंधी पूर्वानुमान की आवश्यकता होती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘फाइनैंसिंग इंडियाज अर्बन इन्फ्रास्ट्रक्चर नीड्स (2022)’ के मुताबिक भारत के शहरी बुनियादी ढांचा विकास में वाणिज्यिक वित्त की भूमिका बहुत सीमित रही है। वहां गैर गारंटीशुदा उधारी पूंजीगत व्यय का बमुश्किल 5 फीसदी योगदान करती है।

शहरी पुनर्संरचना के तीन स्तंभों को देखें तो सीईआर सही पैमाना प्रदान करते हैं, यूसीएफ निजी भागीदारी को सुसंगत बनाते हैं और नगर निगम बॉन्ड बाजार अनुशासन लाते हैं। एक साथ मिलकर ये एक बुनियादी विसंगति को दूर करते हैं। वह यह कि परियोजनाएं महानगरीय इलाकों में विस्तारित तो होती हैं किंतु शासन,परियोजनाएं और बैलेंस शीट बिखरी हुई रहती हैं। 

अगर इन्हें एक पैकेज के रूप में लागू किया जाए तो ये टिकाऊ अधोसंरचना की एक ठोस पाइपलाइन का निर्माण कर सकते हैं। वहीं अगर इनको अलग-अलग देखा जाए तो तो ये फिर से अनुदान निर्भरता की ओर फिसलने का जोखिम रखते हैं। मूल रूप से देखा जाए तो भारत के शहरी उभार की चुनौती संस्थागत है। दीर्घकालिक परिसंपत्तियों को दीर्घकालिक पूंजी की जरूरत होती है लेकिन नगर निकायों का राजस्व और निवेशकों का विश्वास सीमित बना हुआ है। 15वें वित्त आयोग के लिए किए गए एक अध्ययन के मुताबिक साल 2017-18 में नगर निकायों का अपना राजस्व, सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.43 फीसदी था। 

इसमें संपत्ति कर नगर निकाय कर राजस्व का करीब 60 फीसदी था। यहां भी, अध्ययन ने कम संग्रह के मुख्य कारण के रूप में पुरानी मूल्यांकन प्रणाली और कमजोर प्रवर्तन बताया जबकि आधार को विस्तारित करने और प्रशासन को मजबूत करने के लिए डिजिटलीकरण, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) मैपिंग और उपग्रह-आधारित प्रणालियों की सिफारिश की। 

शहरों की आवश्यकताओं और खर्च के बीच का अंतर काफी समय से बरकरार है। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने एकमुश्त परिसंपत्ति निर्माण के बजाय संपूर्ण जीवन चक्र की फाइनैंसिंग की आवश्यकता पर बल दिया। विश्व बैंक का अनुमान है कि 2036 तक शहरी अधोसंरचना निवेश की जरूरत 840 अरब डॉलर की होगी यानी करीब 55 अरब डॉलर वार्षिक। संपत्ति कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का केवल 0.15 फीसदी होने के कारण पुनर्भुगतान क्षमता कमजोर बनी हुई है। वर्ष 2011-18 के दौरान शहरी पूंजीगत व्यय औसतन जीडीपी का केवल लगभग 0.6 फीसदी रहा, जिसमें गैर-गारंटीशुदा वाणिज्यिक वित्त का योगदान मुश्किल से 5 फीसदी था। इस घाटे को पाटने के लिए शहरी पूंजीगत व्यय को वार्षिक रूप से जीडीपी के लगभग 1.1 से 1.2 फीसदी तक बढ़ाना आवश्यक है।

सीईआर और पैमाने की रणनीति: वर्ष2026-27 के बजट में वृद्धि के कारकों के आधार पर सीईआर का मानचित्रण करने और प्रत्येक सीईआर को पांच साल में 5,000 करोड़ रुपये आवंटित करने का प्रस्ताव रखा गया है जो सुधार और परिणाम आधारित फाइनैंसिंग तंत्र के माध्यम से होगा। इसका ध्यान दूसरे और तीसरे दर्जे के शहरों पर है। रणनीतिक परिवर्तन यह है कि अधोसंरचना की फाइनैंसिंग वहां की जाए जहां समूह लाभ नगर निकाय सीमाओं से परे विस्तारित हों और धन को वितरण क्षमता और परिणामों से जोड़ा जाए।

सबसे पहले नीति आयोग ने 2023 में इस पहल की परिकल्पना की थी ताकि उन शहरी क्षेत्रों की योजना बनाई जा सके जो शहरी सीमाओं से परे जाते हैं। फाइनैंसिंग का अर्थ स्पष्ट है: सीईआर तभी सफल होंगे जब वे एक समन्वित निवेश योग्य मंच के रूप में काम करें, जो मौजूदा अधिकार क्षेत्रों को पार करने वाली प्रमुख और उपयोगिता परियोजनाओं को प्राथमिकता दें, और योजनाओं को टिकाऊ, संचालन-तैयार पोर्टफोलियो में बदलें, न कि अलग-थलग नगर निकाय इच्छा सूचियों में।

यूसीएफ और बाजार आधारित अनुशासन: 14 फरवरी को कैबिनेट ने यूसीएफ को एक लाख करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता के साथ मंजूरी दी। केंद्र का स्पष्ट कहना है कि वह किसी परियोजना का 25 फीसदी फाइनैंस करेगा, शहरों को कम से कम 50 फीसदी धन बाजार से जुटाना होगा, और केंद्र की ओर से धनराशि सुधारों और परिणामों के आधार पर जारी की जाएगी। यूसीएफ तीन मुख्य क्षेत्रों को प्राथमिकता देता है: शहरों को विकास केंद्र के रूप में समर्थन, शहरों का रचनात्मक पुनर्विकास और बड़े पैमाने पर शहरी नवीनीकरण तथा जल, स्वच्छता और आवश्यक अधोसंरचना जिसमें सीवरेज, जल निकासी, जल आपूर्ति और जलवायु-लचीली प्रणालियां शामिल हैं। भारत की असली शहरी परीक्षा यह है कि क्या शहर टिकाऊ परियोजनाएं तैयार कर सकते हैं और साथ ही क्या वे विश्वसनीय राजस्व और शासन के माध्यम से निवेशकों को पुनर्भुगतान कर सकते हैं।

नगर निगम बॉन्ड्स के साथ वित्तीय लचीलापन: ये बॉन्ड पूंजी तक पहुंच बनाने का शॉर्टकट जरिया नहीं हैं। बॉन्ड जारी करना संस्थागत अनुशासन का संकेत देता है। अंकेक्षित खातों,  मानकीकृत रिपोर्टिंग, सुरक्षित नकदी प्रवाह और पारदर्शी प्रदर्शन प्रकटीकरण के माध्यम से। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने 2023 के नगर निगम ऋण विनियमों के तहत इन आवश्यकताओं को लागू किया है, जिससे शहरी स्थानीय निकायों में निवेशकों का विश्वास मजबूत हुआ है। इस बजट में सरकार ने नगर निगम बॉन्ड जारी करने को और बढ़ावा दिया है। उसने उन शहरों को 100 करोड़ रुपये का प्रोत्साहन देकर ऐसा किया है जो 1,000 करोड़ रुपय से अधिक का एकल बॉन्ड इश्यू करते हैं। 

संदेश एकदम साफ है। वह यह कि सीईआर सही पैमाना प्रदान कर सकते हैं, यूसीएफ अनुशासन लागू कर सकता है, और नगर निगम बॉन्ड्स दीर्घकालिक पूंजी जुटा सकते हैं। लेकिन इनमें से कोई भी तब तक सफल नहीं होगा जब तक मजबूत नगर निकाय राजस्व, विश्वसनीय खाते और निवेशकों के भरोसेमंद संचालन एवं रखरखाव के लिए सुनिश्चित फाइनैंसिंग उपलब्ध न हो। भारत का शहरी भविष्य इस पर निर्भर करता है कि क्या वह ऐसी नागरिक संस्थाएं बना सकता है जो वित्तीय रूप से विश्वसनीय हों, पूंजी बाजार के अनुकूल हों और बड़े पैमाने पर विकास को बनाए रखने में सक्षम हों। तभी वे वास्तव में सतत विकास के इंजन बन पाएंगे।


(लेखक इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक और प्रबंधक न्यासी हैं। इस आलेख में मुटुम चाओबिसाना का भी सहयोग है)

First Published : April 1, 2026 | 9:27 PM IST