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करेंसी नीति से भारत पर बढ़ रहा दबाव: खुली अर्थव्यवस्था में रुपया संभालना हुआ और मुश्किल

भारत अब 1970 के दशक की बंद अर्थव्यवस्था नहीं रहा, बल्कि वह गहरे अंतरराष्ट्रीय संबंधों वाला एक बड़ा और जटिल तंत्र बन गया है। विस्तार से बता रहे हैं केपी कृष्णन

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के पी कृष्णन   
Last Updated- April 28, 2026 | 9:40 PM IST

भारत की आर्थिक नीति से संबंधित बहस में प्रशासनिक नियंत्रण और बाजार अर्थव्यवस्था के बीच का द्वंद्व बार-बार उभरता है। इन दिनों रिजर्व बैंक के विनिमय दर संबंधी कदमों में इन्हें महसूस किया जा सकता है। कई महीनों से आरबीआई रुपये के अवमूल्यन को रोकने के लिए कठिन प्रयास कर रहा है। ऐसा करते हुए, वह वित्तीय क्षेत्र के विकास की दीर्घकालिक परियोजना का बलिदान करने को भी तैयार दिखाई देता है। यह दो कारणों से दिक्कतदेह है। पहला, यह भारतीय अर्थव्यवस्था की संस्थागत नींव को कमजोर करता है, और दूसरा हर बार मुद्रा का बचाव ब्याज दरों में वृद्धि में बदल जाता है, जो वर्तमान समय में अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं है।

सबसे पहले यह स्वीकारना आवश्यक है कि विनिमय दर का मूल्यांकन ज्यादा है। 100 की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर अब संतुलित विनिमय दर का सही पैमाना नहीं रही, क्योंकि हाल के वर्षों में बहुत कुछ बदल गया है-खासकर निर्यात में आई गिरावट और शुद्ध पूंजी प्रवाह में आई कमी। भुगतान संतुलन को फिर से संतुलित करने के लिए, विनिमय दर में गिरावट आना जरूरी है।

भारत अब 1970 के दशक की बंद अर्थव्यवस्था नहीं रहा, बल्कि वह गहरे अंतरराष्ट्रीय संबंधों वाला एक बड़ा और जटिल तंत्र बन गया है। जब रिजर्व बैंक रुपये की कीमत तय करने की कोशिश करता है, तो उसे लाखों तर्कसंगत कर्ताओं की प्रोत्साहन संरचना से जूझना पड़ता है। एक परिष्कृत अर्थव्यवस्था में पूंजी के आवागमन के मार्ग अनेक और विविध होते हैं।

जब बाजार प्रतिभागी यह मानते हैं कि रुपया अधिमूल्यित है और अवमूल्यन की संभावना है, तो वे तर्कसंगत प्रतिक्रिया देते हैं। निर्यातक अपनी आय को यथासंभव लंबे समय तक विदेशी खातों में रखते हैं। आयातक विदेशी वस्तुओं की खरीद में तेजी लाते हैं। व्यक्ति और कंपनियां अपने पोर्टफोलियो को विविध बनाने के लिए विदेशी संपत्तियां या सोना हासिल करती हैं। ये सभी क्रियाएं परिवारों और कंपनियों द्वारा अपनी शुद्ध संपत्ति की रक्षा करने के लिए तार्किक जोखिम-प्रबंधन प्रतिक्रियाएं हैं।

निजी क्षेत्र की इन प्रतिक्रियाओं का पैमाना बहुत बड़ा है। लाखों प्रतिभागियों के संयुक्त निर्णय रिजर्व बैंक की प्रशासनिक प्रतिबंधों या मुद्रा भंडार की बिक्री के माध्यम से हस्तक्षेप करने की क्षमता को बहुत पीछे छोड़ देते हैं। जब रिजर्व बैंक वित्तीय विकास पर प्रहार करके नियंत्रण पुनः प्राप्त करने की कोशिश करता है-जैसे कुछ प्रकार के व्यापारों को प्रतिबंधित करना, बाजार के हिस्सों को बंद करना, या पूंजी प्रवाह पर अनुपालन बोझ बढ़ाना, तो यह मुद्रा पर मौजूद मूल दबाव को नहीं रोकता। यह केवल उस दबाव को कम पारदर्शी, कम विनियमित माध्यमों में धकेल देता है, जबकि औपचारिक वित्तीय क्षेत्र की संस्थागत क्षमताओं को नुकसान पहुंचाता है।

किसी मुद्रा का अवमूल्यन रोकने के लिए, केंद्रीय बैंक को उस मुद्रा को अधिक आकर्षक बनाना होता है। इसके लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाती हैं। रिजर्व बैंक ने फिलहाल ब्याज दरों में वृद्धि को खारिज कर दिया है। लेकिन यह संकोच टिक नहीं सकता, क्योंकि ‘असंभव त्रयी’ यह निर्धारित करती है कि ऐसा देश जिसमें स्थिर विनिमय दर और खुला पूंजी खाता है, स्वतंत्र मौद्रिक नीति नहीं चला सकता। यदि मुद्रा की रक्षा जारी रहती है, तो ब्याज दरों में वृद्धि करनी ही होगी।

हालांकि वर्तमान में भारत में ऐसी नीति का समय नहीं है। अर्थव्यवस्था प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना कर रही है। निर्यात में मंदी और प्रेषण में कमी है जबकि वह चालू खाते के लिए पारंपरिक सहारा होता है। इसके कारण समग्र मांग दबाव में है। साथ ही, आयातित कच्चे तेल का बिल बढ़ गया है। एक मानक मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण ढांचे में, ये हालात यानी धीमी वृद्धि और नकारात्मक व्यापार शर्तों का झटका, आमतौर पर सहायक मौद्रिक नीति की मांग करते हैं। शायद ब्याज दर में कटौती की भी। परंतु इसके बजाय, विनिमय दर रक्षा की आवश्यकताएं रिजर्व बैंक को विपरीत दिशा में धकेल रही हैं।

हम ऐसा पहले भी घटित होते देख चुके हैं। 16 जनवरी 1998 को, एशियाई वित्तीय संकट के बीच, रिजर्व बैंक ने रुपये की रक्षा के लिए एक ही दिन में ब्याज दरों को 200 आधार अंकों तक बढ़ा दिया। इससे मुद्रा क्षणिक रूप से स्थिर हुई, लेकिन वास्तविक अर्थव्यवस्था को गंभीर झटका लगा। इसी तरह की घटना 2013 में अमेरिका में ‘टेपर टैंट्रम’ के दौरान भी हुई। तब भी रिजर्व बैंक ने, आज की तरह, ‘सट्टेबाजों’ के खिलाफ कार्रवाई की। जो कदम वित्तीय बाजारों को सीमित करने के प्रयास के रूप में शुरू हुआ, वह जल्दी ही ब्याज दर रक्षा में बदल गया। दरों में आई तेज वृद्धि ने कॉरपोरेट निवेश में मंदी में योगदान दिया और बढ़ते कॉरपोरेट ऋण संकट को और बिगाड़ दिया।

2013 के संकट के प्रति उभरते बाजारों की प्रतिक्रियाओं की जांच एक उल्लेखनीय बात सामने लाती है। भारत ने अपने कई समकक्षों की तुलना में अधिक प्रतिबंधात्मक और हस्तक्षेपकारी उपाय लागू किए थे जो वित्तीय विकास के लिए हानिकारक थे। इसके बावजूद रुपया उन कई देशों की मुद्राओं से अधिक अवमूल्यित हुआ जिन्होंने अधिक खुली और बाजार के अनुकूल नीतियां बनाए रखीं। सबक यह है कि प्रशासनिक दमन स्थिरता नहीं देता। यह देश से जुड़े जोखिम को बढ़ा देता है।

एक लचीली विनिमय दर झटकों को सहन करने वाले उपकरण की तरह काम करती है। यह मुद्रा की कीमत को बाहरी झटकों जैसे तेल की कीमतों में बदलाव या वैश्विक मांग में उतार-चढ़ाव के मुताबिक समायोजित होने देती है। मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण नाममात्र बचाव प्रदान करता है। वह यह सुनिश्चित करता है कि केंद्रीय बैंक घरेलू मूल्य स्थिरता पर केंद्रित रहे, बजाय इसके कि वह किसी विशेष विनिमय दर स्तर को प्रबंधित करने के असंभव कार्य में उलझे।

इसलिए, केंद्रीय बैंक की नीति में प्रतिगामी होना निराशाजनक है, जो वित्तीय क्षेत्र को ऐसे नलकों की तरह मानता है जिन्हें नियामक की इच्छा पर अल्पकालिक मूल्य लक्ष्य हासिल करने के लिए खोला या बंद किया जा सकता है। यह दृष्टिकोण इस वास्तविकता को अनदेखा करता है कि सक्षम वित्तीय संस्थान कैसे विकसित होते हैं। वित्तीय विकास के लिए दशकों तक लगातार, विधि-आधारित नीतियों की आवश्यकता होती है।

इसके लिए ऐसा वातावरण चाहिए जिसमें कंपनियां इस विश्वास के साथ काम कर सकें कि नियम अचानक नहीं बदल दिए जाएंगे। नियामक द्वारा समय-समय पर विनिमय दर के बचाव के लिए बाजार में हस्तक्षेप निजी कंपनियों को संसाधनों में निवेश करने से हतोत्साहित करता है।

एक ऐसा केंद्रीय बैंक जो बाजार की वास्तविकताओं से मेल न खाने वाले ढांचों के साथ काम करता है, वह एक उभरती वैश्विक आर्थिक शक्ति के लिए दिक्कतदेह है। इस परिदृश्य में, वित्त मंत्रालय को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। उसे यह मानना होगा कि वित्तीय विकास को नुकसान पहुंचाना और व्यापार चक्र के गलत समय पर ब्याज दरें बढ़ाना देश की दीर्घकालिक वृद्धि संभावनाओं के लिए हानिकारक है। आर्थिक वृद्धि के एजेंडा का संरक्षक होने के नाते, उसे व्यापक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।


(लेखक आइजक सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी में मानद वरिष्ठ फेलो और पूर्व अफसरशाह हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : April 28, 2026 | 9:35 PM IST