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आसान वैश्वीकरण का अंत: भारत को अपने मैन्युफैक्चरिंग मॉडल पर फिर से विचार करना होगा

वैश्वीकरण अब अपने आप में एक लक्ष्य नहीं रह गया है, ऐसे में भारत को एक अधिक गतिशील विनिर्माण आधार बनाने के लिए अपनी औद्योगिक नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए

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नितिन देसाई   
Last Updated- April 21, 2026 | 9:42 PM IST

बीते कुछ सप्ताह में भारत के नीति निर्माताओं को पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग के आर्थिक प्रभाव से निपटना पड़ा। खासतौर पर इसके चलते तेल एवं गैस की उपलब्धता में कमी और कीमतों में इजाफे से। युद्ध विराम ने इससे राहत दी है लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत विफल होने के बाद संकट फिर मंडराने लगा है।

अमेरिका का अपने सहयोगियों तथा संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निर्धारित मानकों से दूरी बनाना इस बात का संकेत है कि दुनिया के देशों के संबंध एक नए चरण में प्रवेश कर रहे हैं जो सहयोग से अधिक शक्ति पर आधारित है। वैश्विक व्यापार, वित्त और आर्थिक प्रणाली का यह प्रतिकूल परिवर्तन पश्चिम एशिया के युद्ध से उत्पन्न तात्कालिक चुनौतियों से कहीं अधिक गहरा है।

हम ट्रंप प्रशासन के वैश्विक आर्थिक संबंधों के व्यवहार में इसका अनुभव कर चुके हैं। इसके चलते व्यापार और वित्त का मुक्त और गैर-राजनीतिक प्रवाह जोखिम में पड़ गया है। याद रहे कि इसने पिछले चार दशकों में उभरती अर्थव्यवस्थाओं को लाभ पहुंचाया है। इस रवैये को 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट, उभरते विकासशील देशों (विशेषकर चीन) की बढ़ती ताकत को लेकर विकसित देशों की चिंता, और विकसित देशों में रोजगार पर उसके प्रभाव ने खतरे में डाल दिया।

अमेरिका ने व्यापार नीति को स्पष्ट रूप से राजनीतिक बना दिया है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में होने वाले निवेश पर इसका असर यह होगा कि विभिन्न देशों के बीच कॉरपोरेट संबंध कमजोर पड़ जाएंगे; ऐसा इसलिए होगा क्योंकि एक तरफ तो संघीय सरकार द्वारा उत्पादन को वापस अपने देश में लाने का दबाव बढ़ रहा है, और दूसरी तरफ इस बात पर भी पाबंदियां लगाई जा रही हैं कि कंपनियां किन देशों के साथ व्यापार कर सकती हैं या किन देशों में निवेश कर सकती हैं।

अमेरिकी लेखक फ्रांसिस फुकुयामा ने हाल ही में कहा, ‘ऐसा समय कभी नहीं रहा जब अमेरिका पर पारंपरिक मित्रों और प्रतिद्वंद्वियों दोनों का इतना अविश्वास रहा हो, जितना आज है।’ वास्तव में, कई तरीकों से अमेरिका ‘अनरिलायबल स्टेट ऑफ अमेरिका’ (अविश्वसनीय अमेरिका) बन गया है।

एक और उभरती हुई बाधा है जिसे भारत की विकास नीति में समझना और ध्यान में रखना आवश्यक है। चीन को केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक विनिर्माण महाशक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए, जो वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में 27-29 फीसदी और वैश्विक विनिर्माण व्यापार में लगभग 20 फीसदी हिस्सा रखता है। उसने यह भी दिखाया है कि वह कुछ क्षेत्रों जैसे दुर्लभ खनिज आदि में उत्पादन और व्यापार पर अपने प्रभुत्व का उपयोग प्रमुख देशों के साथ अपने राजनीतिक संबंधों में एक साधन के रूप में करने के लिए तैयार है।

नीतिगत स्तर पर हमें यह मान लेना चाहिए कि देशों के आपसी व्यापार और वित्तीय संबंधों का गैर राजनीतिकरण वास्तव में समाप्त हो चुका है और अमेरिका द्वारा व्यापार के भारी राजनीतिकरण के साथ कोई भी देश वैश्वीकरण को स्वयं में एक लक्ष्य के रूप में नहीं मान रहा है। सभी देश अपने लोगों और उद्यमों को प्राथमिकता देने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। आगे चलकर, देश द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों पर जोर देंगे, साथ ही सरकार की नीतियों पर जो प्रमुख उद्योगों की रक्षा करने के उद्देश्य से होंगी। यह पहले से ही भारत की नीति रूपरेखा का हिस्सा है।

वित्त के मामले में प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित नहीं हुआ है, और जो सावधानियां हम बरतते हैं वे अधिकतर राष्ट्रीय सरकारों, विशेषकर अमेरिका, के दृष्टिकोण को लेकर चिंताओं के कारण हैं। हालांकि, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में यह तर्क दिया जा रहा है कि पूंजी की मुक्त आवाजाही ने उद्योग को खोखला करने में योगदान दिया है। इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) प्रवाह अधिक सीमित हो जाएंगे।

इन सभी घटनाक्रमों के लिए महत्त्वपूर्ण नीतिगत बदलावों की आवश्यकता है। इसे आर्थिक समीक्षा 2025-26 के अध्याय 16 में बहुत अच्छे से समझाया गया है। इसमें कहा गया है, ‘एक ऐसी दुनिया में जो भू-राजनीतिक बिखराव, विवादित व्यापार, अस्थिर पूंजी प्रवाह और तीव्र तकनीकी बदलावों से भरी है, अब केवल वृद्धि ही एकमात्र बाधा नहीं रह गया है। जो चीज देशों को केवल झटके सहने वालों से अलग करती है और उन्हें परिणाम गढ़ने वालों में बदलती है, वह है उनकी क्षमता की गहराई और गुणवत्ता।’

आइए उन औद्योगिक नीतिगत परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करें जिनकी हमें आवश्यकता है ताकि पश्चिम एशिया युद्ध की संभावित निरंतरता और अमेरिका व कुछ अन्य राज्यों में व्यापारवाद के उदय से वैश्विक व्यापार को होने वाले खतरों का सामना किया जा सके। लेकिन यह नीतिगत परिवर्तन विनिर्माण उत्पादन में अपर्याप्त वृद्धि को सुधारने के लिए भी आवश्यक है, जिसका हिस्सा राष्ट्रीय सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में चालू कीमतों पर 2011-12 में 17.4 फीसदी से घटकर 2025-26 में 14.1 फीसदी हो गया है।

सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है विनिर्माण नीति का अधिक रणनीतिक अभिमुखीकरण। व्यापार के वैश्विक राजनीतिकरण के कारण हमें अपनी आयात प्रतिस्थापन नीतियों को उन उत्पादों पर केंद्रित करना होगा जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं और जिनके आयातित इनपुट आपूर्ति करने वाले देशों द्वारा राजनीतिक नियंत्रणों के अधीन हो सकते हैं। यह उन उद्योगों के लिए भी सार्थक हो सकता है जिनमें वैश्विक बाजारों में प्रमुख बनने की क्षमता है।

दरअसल, रणनीतिक आयात प्रतिस्थापन अनिवार्य रूप से निर्यात संवर्धन के विरुद्ध काम नहीं करता।उदाहरण के लिए, यदि नीतिगत आकलन एक्टिव फार्मास्युटिकल इन्ग्रीडिएंट्स (एपीआई) के अधिक घरेलू उत्पादन के लिए प्रोत्साहन देता है जिनका आयात वर्तमान में लगभग 39,000 करोड़ रुपये है और जिनका अधिकांश आयात अभी चीन से होता है तो एपीआई की घरेलू उपलब्धता वास्तव में औषधि निर्यात को बढ़ावा दे सकती है, जो हमारे विनिर्माण निर्यात का एक प्रमुख घटक है।

वास्तव में, हमारी औद्योगिक नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह होना चाहिए कि विनिर्माण को वैश्विक प्रतिस्पर्धी स्तर तक पहुंचाया जाए और इसके निर्यात को वैश्विक विनिर्माण निर्यात के लगभग 2 फीसदी से बढ़ाकर चीन के हिस्से के करीब 20 फीसदी तक ले जाया जाए। इससे चालू खाते का घाटा कम होगा और हम विदेशी वित्तीय प्रवाह पर कम निर्भर होंगे।

महत्त्वपूर्ण कच्चे माल की आवश्यकताओं के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए शुल्क बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। हमें अपनी निजी और सार्वजनिक कंपनियों को अधिक दृढ़ता से ऐसे उद्यमों में बदलना होगा जो तकनीकी नवाचारक और वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनने को प्राथमिकता दें। यहां सबसे महत्त्वपूर्ण आवश्यकता यह है कि नीति बड़े विनिर्माण प्रतिष्ठानों द्वारा शोध और विकास पर कहीं अधिक खर्च पर जोर दे।

वर्तमान में, भारत का शोध एवं विकास खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के फीसदी के रूप में चीन का लगभग एक-चौथाई है। चूंकि चीन का जीडीपी भारत से चार गुना अधिक है, इसका अर्थ है कि पूर्ण रूप से देखा जाए तो भारत का शोध और विकास खर्च चीन के व्यय के सोलहवें हिस्से के बराबर है। लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि भारत में राष्ट्रीय शोध और विकास का केवल लगभग 35 फीसदी वाणिज्यिक गैर-सरकारी क्षेत्र द्वारा किया जाता है, जबकि चीन में यह क्षेत्र लगभग 75 फीसदी का योगदान देता है।

यही एक महत्त्वपूर्ण कारण है कि भारत और चीन के विनिर्माण क्षेत्र के आकार, विकास और वैश्विक भूमिका में इतना बड़ा अंतर है। इसलिए, एक ऐसी नीति जो निजी क्षेत्र को, विशेषकर विनिर्माण में, कहीं अधिक प्रतिबद्ध शोध और विकास की ओर ले जाए, उस बदलाव का एक अनिवार्य हिस्सा है जिसकी हमें आवश्यकता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन जिसकी हमें आवश्यकता है, वह है कंपनियों की प्राथमिकता को राजनेताओं और प्रशासन के साथ संबंधों पर केंद्रित करने से हटाकर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में खड़े होने की तरफ ले जाना। यदि हम ऐसा करते हैं, तो विनिर्माण उत्पादन जीडीपी के 25 फीसदी के निर्धारित लक्ष्य के करीब पहुंच जाएगा, वैश्विक संदर्भ में अधिक गतिशील बनेगा और तकनीकी रूप से अधिक स्वतंत्र होगा।

First Published : April 21, 2026 | 9:41 PM IST