इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
वर्ष1958 में माओ त्से तुंग के ग्रेट लीप फॉरवर्ड में विचित्र ‘चार कीट’ अभियान शामिल था। इसका उद्देश्य मक्खियों, मच्छरों, चूहों और गौरैयों को समाप्त करना था। शोध से पता चलता है कि टिड्डियों और धान को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को खाने वाली करीब 2 अरब गौरैयों को मारे जाने के कारण अनजाने ही देश में 20 लाख लोगों की मौत हुई। यह एक अतिरंजित उदाहरण है, लेकिन यह दर्शाता है कि लाइसेंस राज के तहत नेक नीतिगत इरादों के भी द्वितीयक प्रभाव कैसे सामने आए।
भारत में लाइसेंस-राज की विरासत वाली दो संस्थाएं जो सरकार द्वारा वित्तपोषित नहीं हैं और जिन्होंने औपचारिकीकरण को बाधित करने में योगदान दिया है, वे हैं कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी)। भारतीय नियोक्ता श्रम संहिताओं का पालन करने के लिए 40,000 करोड़ की लागत चुपचाप वहन कर रहे हैं। ऐसे में उन्हें ईपीएफओ और ईएसआई में मौलिक सुधार मिलना चाहिए, जैसे कि आधार-लिंक्ड, पूर्णतः पोर्टेबल, आजीवन सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा खाता बनाना, जो कर्मचारियों को अधिक विकल्प प्रदान करे।
ईएसआई और ईपीएफओ को एक ही वजह से बुनियादी सुधारों की आवश्यकता है: नियोक्ता और कर्मचारी कवरेज पर खराब नीतिगत परिणाम, नियोक्ताओं और कर्मचारियों में उच्च असंतुष्टि, कंपनी-लागत आधारित पारिश्रमिक जगत से पूरी तरह असंबद्ध त्रुटिपूर्ण डिजाइन द्वारा औपचारिक रोजगार को बाधित करना, तकनीकी प्रणालियां उस दुनिया के लिए अपर्याप्त हैं जहां रोजगार आजीवन अनुबंध से टैक्सी जैसी अस्थायी व्यवस्था में बदल गया है, मानकों की तुलना में अत्यधिक प्रशासनिक शुल्क, कमजोर शासन जहां उनके बिना प्रतिनिधित्व वाले बोर्डों में दर्जनों लोग होते हैं और सुधार के प्रस्तावों पर ‘कोई भी ना कह सकता है और कोई भी हां नहीं कह सकता’।
किसी भी देश में सामाजिक सुरक्षा में सुधार करना जटिल होता है, लेकिन दोनों संगठनों के मौलिक सुधार के लिए संघीय बजट घोषणा को लागू करने में 10 साल की देरी सुधार को और भी अधिक तत्काल जरूरी बना देती है। आइए प्रत्येक संगठन पर गहराई से विचार करें।
ईपीएफओ कार्य आधारित सामाजिक सुरक्षा देने में नाकाम रहा है। यह कुल 6.3 करोड़ नियोक्ताओं के केवल 2 फीसदी और कुल 56 करोड़ कामगारों के केवल 13 फीसदी को कवर करता है। नियोक्ताओं में बहुत अधिक असंतोष है। ईपीएफओ के 32.56 करोड़ सब्सक्राइबर में से 78 फीसदी इसमें योगदान नहीं कर पाते हैं क्योंकि इसका डिजाइन नियोक्ता संबद्ध है और तकनीक को खराब ढंग से अपनाया गया है। इसका रिटर्न एनपीएस से कम है।
योगदान के एक बड़े हिस्से का अनैच्छिक रूप से कर्मचारियों की पेंशन योजना (ईपीएस) के उप-खाते में डाल दिया जाना, जिसकी जन्मजात खामी परिभाषित लाभ और परिभाषित योगदान (जिनमें से एक को परिवर्तनीय होना ही चाहिए) लगभग 3 लाख करोड़ रुपये के घाटे का संकेत देती है, जिसे केवल राजकोषीय योगदान या लाभ में कटौती से ही पूरा किया जा सकता है (शायद यही कारण है कि 75 फीसदी लोग इस आजीवन लाभ को चार वर्षों के भीतर ही निकाल लेते हैं)।
इसी तरह, ईएसआई कार्य-आधारित स्वास्थ्य सेवा वित्तपोषण प्रदान करने में विफल रहा है। इसमें 1 फीसदी से कम नियोक्ता और 6 फीसदी कर्मचारी ही कवर किए गए हैं। ईएसआई के 3.2 करोड़ योगदानकर्ताओं में से केवल 50 फीसदी ही उनकी सेवाओं का उपयोग करते हैं। सबसे पीड़ादायक बात यह है कि ईएसआई ने कर्मचारियों और नियोक्ताओं से अधिक शुल्क वसूला और पिछले वर्ष 8,900 करोड़ का अधिशेष उत्पन्न किया, जो 63 फीसदी के कम भुगतान अनुपात की वजह से हुआ (यह अधिकांश देशों में अवैध होता, जहां 85 फीसदी से कम भुगतान अनुपात पर कानूनन योगदानकर्ताओं को रिफंड देना पड़ता है) और 3,000 करोड़ रुपये के उच्च प्रशासनिक शुल्क (योगदान का 15 फीसदी बनाम वैश्विक और स्थानीय मानक 2 फीसदी) नियोक्ताओं से अलग से वसूले गए। ईएसआई का अपर्याप्त कवरेज और कम लाभ भुगतान से मानव पूंजी पर भारी लागत आती है।
इन कमियों की वजह से दोनों कार्यक्रमों के लिए स्पष्ट सुधारों की आवश्यकता दिखती है। ईपीएफओ को कर्मचारियों को विकल्प देना चाहिए कि वे अपने 12 फीसदी नियोक्ता योगदान को या तो ईपीएफओ या एनपीएस में जमा करें और तीन स्तरों में से कर्मचारी योगदान (0/6/12 फीसदी) चुनें। इसे नियोक्ता प्रशासनिक शुल्क को एनपीएस स्तर तक घटाना चाहिए (4 फीसदी से घटाकर 0.03 फीसदी तक)। ईपीएफओ को अच्छी तरह से यह स्पष्ट करना चाहिए कि अधिनियम की वेतन सीमा (15,000 रुपये प्रति माह) से ऊपर के कर्मचारियों पर कोई कवरेज लागू नहीं होता, और उस सीमा से ऊपर स्वैच्छिक रूप से बंद करने या निकासी की अनुमति देनी चाहिए।
इसे ईपीएस का पुनर्गठन करना चाहिए, फंडिंग की कमी को दूर करना चाहिए, वादे किए गए लाभों का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए, कर्मचारियों को यह विकल्प देना चाहिए कि वे अपने मासिक योगदान को अपने ‘निर्धारित योगदान खाते’ में जमा करवाकर इस योजना से बाहर निकल सकें, और इसे अटल पेंशन योजना या अन्य योजनाओं के साथ एकीकृत कर सकें। कर्मचारियों को अपने खातों को यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (यूएएन) के बजाय आधार से जोड़ने का विकल्प दिया जाना चाहिए।
सबसे आसान सुधार परिचालन स्तर पर हैं। उदाहरण के लिए, निवेश संचालन को मजबूत करना ताकि रिटर्न को आय से जोड़ा जा सके, सेवा-स्तर मानक अनिवार्य करना, खातों को नागरिक डिजिलॉकर और एंटिटी डिजिलॉकर से एकीकृत करना, बोर्ड का आकार 42 से घटाकर 12 सदस्यों तक करना, और पीडीएफ आधारित डिजिटाइजेशन रोडमैप से हटकर ऐप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) की ओर बढ़ना, ताकि डिजिटल सार्वजनिक ढांचे को पेपरलेस और प्रेजेंसलेस डिजाइन के साथ समन्वित किया जा सके।
ईएसआईसी को कर्मचारियों को यह विकल्प देना चाहिए कि वे अपनी मासिक स्वास्थ्य बीमा योगदान राशि को बीमा नियामक-लाइसेंस प्राप्त बीमाकर्ताओं की ओर मोड़ सकें। इसे योगदान पर लगाए गए प्रशासनिक खर्च को 15 फीसदी से घटाकर 2 फीसदी करना चाहिए, ताकि उन्हें नियामक लाइसेंस प्राप्त बीमाकर्ताओं के मानकों के अनुरूप बनाया जा सके। इसे तुरंत प्रीमियम को 30 फीसदी तक कम करना चाहिए ताकि अतिरिक्त संग्रह घटे, और भविष्य में योगदान का 85 फीसदी भुगतान अनिवार्य करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो अतिरिक्त राशि को वापस किया जाना चाहिए।
पहले से एकत्र किए गए 1.5 लाख करोड़ रुपये के अधिशेष का उपयोग सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई), महिलाओं, पिछड़े राज्यों और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजातियों के लिए दो साल के योगदान अवकाश प्रदान करने में किया जाना चाहिए। सभी कर्मचारी खातों को पोर्टेबिलिटी के लिए आधार से जोड़ा जाना चाहिए और सभी नियोक्ता अनुपालन को पीडीएफ से एपीआई में स्थानांतरित करना चाहिए ताकि सीधे-सीधे प्रोसेसिंग सक्षम हो सके। सबसे कठिन लेकिन प्रभावशाली सुधार बोर्ड का आकार 59 से घटाकर 12 करना होगा ताकि शासन का लक्ष्य हितधारकों यानी नियोक्ता और कर्मचारी के कल्याण पर केंद्रित हो, न कि स्वार्थ पर।
ईपीएफओ और ईएसआई ने 1991 से किसी भी बड़े बदलाव का विरोध किया है, यह दर्शाता है कि स्वार्थी अफसरशाही किस प्रकार अराजकता के असंभव परिदृश्यों को गढ़कर अपने हितों की रक्षा करती है। ब्रिटिश टीवी सिरीज यस मिनिस्टर के एक काल्पनिक किरदार सर हम्फ्री एपलबी ने अपने डिप्टी को समझाया कि किसी राजनेता को मौलिक कदम उठाने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उसे बताया जाए कि यह निर्णय ‘साहसी’ है। उन्होंने कहा, ‘इसे विवादास्पद कहना केवल यह दर्शाता है कि नीति आपको वोटों से वंचित कर देगी। साहसी कहना मतलब है कि यह आपको चुनाव हरा देगा।’
ईएसआई और ईपीएफओ ने भारत के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन अब समय आ गया है कि इन्हें हर लिहाज से बेहतर बनाया जाए। साहस का राजनीतिक लाभ है 10 लाख वर्तमान नियोक्ताओं और 10 करोड़ कर्मचारियों की दुआएं, जो ग्राहक नहीं बल्कि बंधक हैं, जबकि इसका आर्थिक लाभ लाखों नए औपचारिक नियोक्ताओं और कर्मचारियों के रूप में आएगा।
(सभरवाल टीमलीज सर्विसेज के बोर्ड में सदस्य और पाटिल शोध प्रमुख हैं। ये उनके निजी विचार हैं)