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फोड़े के इलाज के लिए जानलेवा इंजेक्शन? FCRA संशोधन बिल को लेकर चिंता क्या वाकई सही है

विदेशी अंशदान विधेयक में प्रस्तावित संशोधन ने जो चिंता पैदा की है, उसके पीछे ठोस कारण है

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एमएस श्रीराम   
Last Updated- April 13, 2026 | 9:20 PM IST

विदेशी अंशदान नियामक अधिनियम (एफसीआरए) में प्रस्तावित संशोधनों ने सामाजिक नागरिक संगठनों (सीएसओ) के बीच चिंता के हालात बना दिए हैं। यह चिंता बेवजह नहीं है और हमें राज्य के इस अतिक्रमण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। इससे पहले कि हम इस तर्क के सही-गलत होने पर विचार करें, हमें यह समझना होगा कि आखिर संशोधित प्रस्ताव क्या कहते हैं?

यह संशोधन उस तंत्र को स्पष्ट करता है जिसके तहत ऐसी किसी संस्था की संपत्तियों को अधिग्रहीत किया जा सकता है, जिसको एफसीआरए अधिनियम के तहत विदेशी अंशदान प्राप्त करने की अनुमति समाप्त हो चुकी है। संशोधन से संबंधित अध्याय संपत्तियों के राज्य के पास निहित होने की प्रक्रिया को विस्तार से बताता है।

एक ओर जहां अधिनियम में इस अध्याय को शामिल किए जाने को लेकर चिंताएं सामने आई हैं वहीं राज्य के पास हमेशा यह शक्ति रहती है कि वह उन संगठनों की संपत्तियों को अपने पास निहित कर ले जिन्हें विदेशी अनुदान मिलने की इजाजत समाप्त की जा चुकी है। अन्य सभी सामान्य धाराओं की तरह यह धारा भी निम्नलिखित पाठ के साथ एफसीआर में हमेशा से मौजूद रही थी।

धारा 15 (1) के मुताबिक धारा 14 के तहत जिन व्यक्तियों का प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया है, उनकी अभिरक्षा में मौजूद विदेशी अंशदान और उससे निर्मित संपत्तियां उस प्राधिकृत संस्था में निहित होंगी जिसे निर्धारित किया जा सकता है।

जब 2020 में एफसीआरए में संशोधन किया गया था, तब भी यह धारा अजीब ढंग से मौजूद थी। यहां तक कि जब किसी सीएसओ ने स्वेच्छा से संकेत दिया कि वह आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्रोतों से अनुदान प्राप्त करने का इरादा नहीं रखता, तब भी संशोधन में कहा गया कि प्रमाणपत्र को समर्पित करने की अनुमति केवल तब दी जाएगी जब पिछले विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियां नामित प्राधिकरण को सौंप दी जाएं। इसलिए, वर्तमान संशोधन केवल सीएसओ में पहले से मौजूद बड़े जख्म पर और अधिक नमक छिड़कता है। संशोधन ने इस धारा को विस्तार से समझाने के लिए एक पूरा अध्याय प्रस्तुत किया है। इसे इतनी विस्तार से बताया गया है कि एक वैध चिंता है कि मानक धारा अब एक नियमित धारा बन गई है।

सबसे पहले तो यह देखना होगा कि क्या हमें देश में सीएसओ की आवश्यकता है और क्या उन्हें अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण यानी धन प्राप्त करनी चाहिए। हमारे मन में सीएसओ की जो तत्काल छवि आती है, वह है अक्षय पात्र, जो बच्चों को मध्याह्न भोजन प्रदान करता है, मदर टेरेसा का मिशनरीज ऑफ चैरिटी और मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस), जिसने रोजगार के अधिकार और सूचना के अधिकार पर कानून पारित कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऐसे सीएसओ को राज्य का विस्तार माना जा सकता है क्योंकि वे समाज के व्यापक हित के लिए काम करते हैं। परोपकारी सीएसओ राज्य की कल्याण-आधारित गतिविधियों को विशेषीकृत और कुशल तरीके से करते हैं, जबकि एमकेएसएस जैसे आंदोलनकारी सीएसओ हाशिए पर पड़े लोगों के अधिकारों को व्यक्त करते हैं और उनकी आवाज बनते हैं। परोपकारी ट्रस्ट, सोसाइटी और धारा 8 कंपनियों के पंजीकरण को कानून सक्षम बनाता है।

आयकर प्राधिकरण (जांच के बाद) इन संगठनों को कई प्रकार की छूट प्रदान करते हैं, जिससे उनके कल्याणकारी स्वरूप को सुदृढ़ किया जाता है। राज्य कर छोड़ देता है क्योंकि इन सीएसओ को ऐसी गतिविधियां करने वाला माना जाता है जिन्हें करना तो राज्य को चाहिए लेकिन वह करने में असमर्थ है या उसके पास ऐसा करने की क्षमता नहीं है। 

क्या उन्हें अंतरराष्ट्रीय फंडिंग मिलनी चाहिए? यह एक दिलचस्प सवाल है क्योंकि एजेंडा आधारित दान भी मिल सकता है, राजनीति प्रेरित दान भी और साथ ही सामान्य षडयंत्र सिद्धांत तो रहते ही हैं। यही वजह है कि हमारे यहां एफसीआरए है जो किसी संस्था को दान की पात्रता के पहले पूरी जांच परख करता है। वह उसके उद्देश्यों की विस्तृत पड़ताल करता है, धन का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है और इसकी रिपोर्टिंग कैसे की जानी चाहिए?

इन बातों पर ध्यान देता है। जब राज्य प्रमाणपत्र जारी करता है तो माना जाता है कि सारी जांच परख कर ली गई होगी। वहां से हम मान कर चलते हैं कि किसी संस्था का नियमन और उसकी गतिविधियां तथा विदेशी फंडिंग आदि नियमित अंकेक्षण प्रक्रिया से गुजरती होंगी और बिना किसी दिक्कत के निगरानी और रिटर्न दाखिल करने का काम होता होगा।

नियमों के उल्लंघन के लिए प्रावधान हैं, और प्राकृतिक न्याय की मांग है कि दंड अपराध की गंभीरता के अनुपात में होना चाहिए। प्रमाणपत्र जारी करने के समय गहन जांच और नियमित रिटर्न दाखिल करना संगठन के संचालन के लिए पर्याप्त होना चाहिए।

वर्तमान संशोधन बुलडोजर चलाने जैसा है, चाहे अपराध की गंभीरता कुछ भी हो। और अधिकांश मामलों में अपराध की प्रकृति तो ज्ञात भी नहीं होती। प्रमाणपत्र रद्द करना सामान्यतः भविष्य में प्रभाव डालता है और जिस सीएसओ का एफसीआरए प्रमाणपत्र वापस ले लिया जाता है उसे स्थानीय वित्तपोषण के साथ संचालन जारी रखने से नहीं रोका जाता। ऐसे मामले में, पूर्व वित्तपोषण से निर्मित संपत्तियों को राज्य के पास जब्त करना वर्तमान अपराध को असीमित पूर्वव्यापी प्रभाव देता है। यह असंगत है और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के ​खिलाफ है। यदि अपराध गंभीर है, तो राज्य के पास उचित प्रक्रिया का पालन करने के बाद सीएसओ को बंद करने की शक्ति है। अपवादों के लिए मानक धारा हमेशा उपलब्ध रहती है।

एफसीआरए को साल 2020 में संशोधित किया गया था ताकि धन के प्रवाह को स्पष्ट रूप से स्थापित किया जा सके। सभी अंशदान प्रारंभ में भारतीय स्टेट बैंक की संसद मार्ग (नई दिल्ली) शाखा के एक खाते में आते हैं, और फिर उन्हें स्पष्ट रूप से चिन्हित खातों के माध्यम से स्थानांतरित किया जाता है। प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए धन के उपयोग पर प्रतिबंध हैं (ऊपरी सीमा 20 फीसदी),  इसे किसी अन्य सीएसओ को उप-अनुदान नहीं किया जा सकता, विदेशी धन के लिए अलग खाते बनाए और दाखिल किए जाने चाहिए और अधिकांश धन उन कार्यक्रमों या संपत्तियों पर खर्च किया जाना चाहिए जो ‘उद्देश्य’ को प्रभावी बनाते हैं।

इसके अतिरिक्त, बोर्ड में हर बदलाव को केंद्रीय गृह मंत्रालय को सूचित करना और उससे मंजूरी लेना आवश्यक है। ये धाराएं संकेत देती हैं कि सीएसओ पर पहले से ही पर्याप्त नियंत्रण मौजूद हैं। गंभीर अपराध के लिए संपत्तियों को जब्त करना समझ में आता है, लेकिन विदेशी धन प्राप्त करने की अनुमति का समर्पण या रद्दीकरण, विशेषकर जब संस्था भारतीय धन से अपने संचालन जारी रख सकती है, एक असंतुलित कदम लगता है।

चूंकि हमारे पास अपराध से निपटने के लिए मजबूत कानून मौजूद हैं, यह अध्याय या यहां तक कि मानक धारा भी अनावश्यक है। सीएसओ कल्याण के लिए स्थापित संस्थाएं हैं। जब वे कामकाज बंद करते हैं, तो उनकी राशि कानूनन किसी समान सीएसओ या राज्य को ही जानी चाहिए। यदि कोई सीएसओ एक चालू संस्था है, तो कानून को उस उद्यम के कामकाज पर आनुपातिक रूप से लागू होना चाहिए, ताकि उसकी दैनिक स्वायत्तता और नियमित कार्यों के लिए कोई अस्तित्वगत खतरा पैदा न हो। सबसे बेहतर यही होगा कि विधेयक वापस ले लिया जाए।  

(लेखक भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलूर के लोक नीति केंद्र में प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : April 13, 2026 | 9:20 PM IST