इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
अमेरिका की आर्थिक नीतियां और सैन्य कार्रवाइयां, आज दुनिया में जोखिम और अनिश्चितता के सबसे बड़े कारणों में से एक बनती जा रही हैं। आक्रामक रुख अपनाते हुए अमेरिका ने अपने रक्षा विभाग को फिर से ‘युद्ध विभाग’ कहना शुरू कर दिया है और पश्चिम एशिया में एक और युद्ध छेड़ दिया है जो इस बार ईरान के खिलाफ है। यह युद्ध भी बिना किसी ठोस सबूत के शुरू किया गया है, महज इस आरोप में कि ईरान के पास जन संहार के आधुनिक हथियार हैं और इसके लिए संयुक्त राष्ट्र की किसी अनुमति का सहारा भी नहीं लिया गया है।
यह स्थिति मानो जंगल राज जैसी है जहां ताकत ही सबसे बड़ा नियम बन जाती है। इस संघर्ष का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। तेल एवं गैस की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे तेल एवं गैस आयात करने वाले देशों की लागत बढ़ रही है। भारत जैसे देश के लिए भी यह चिंता की बात है क्योंकि खाड़ी क्षेत्र से आपूर्ति प्रभावित होने पर उसे रूस से तेल आयात बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
हाल ही में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनैशनल इमरजेंसी इकनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) के तहत लगाए गए अलोकप्रिय और अहितकर ‘जवाबी शुल्क’ को अवैध घोषित किया है जो एक स्वागतयोग्य फैसला था। इसके बावजूद अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने पीछे हटने के संकेत नहीं दिए। उन्होंने तुरंत 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत सभी आयातों पर 10 फीसदी का सामान्य शुल्क लगा दिया, जिसे बढ़ाकर 15 फीसदी तक किया जा सकता है।
साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी है कि यदि कोई देश पहले से हुए व्यापार समझौतों को फिर से बातचीत के जरिये बदलने की कोशिश करेगा तो उसे दंडित किया जाएगा। ऐसे दंड 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत लगाए जा सकते हैं। इसके अलावा 1930 के व्यापार अधिनियम की धारा 338 के तहत उन देशों पर 50 फीसदी तक आयात शुल्क लगाया जा सकता है जो अमेरिका के साथ भेदभावपूर्ण व्यापार नीति अपनाते हैं। इन सबके अलावा भी राष्ट्रपति ट्रंप के पास व्यापार नीति के कई और हथियार मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल वे आगे कर सकते हैं।
भारत में अमेरिका से हुए व्यापार समझौते को लेकर तीखी आलोचना हो रही है और इसे भारत की हार मानते हुए इसे आत्मसमर्पण तक बताया जा रहा है। लेकिन इस तरह की बातों को अगर अलग रख कर देखा जाए तो इस समझौते के पीछे कुछ स्पष्ट फायदे हैं। यह समझौता भारत के संवेदनशील कृषि क्षेत्र में आयातों पर कुछ सीमा लगाने के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण श्रम-प्रधान निर्यात जैसे कि समुद्री उत्पाद, चमड़ा, वस्त्र और आभूषण को अमेरिका के बाजार में फिर से बेचने की क्षमता प्रदान कर रहा है। भविष्य में, भारत और अमेरिका के बीच आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) मिशन, जैव प्रौद्योगिकी, रक्षा, अंतरिक्ष और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बड़े सहयोग की संभावना है। इसके अलावा, वैश्विक क्षमता केंद्रों में भारी निवेश और डेटा केंद्रों में हाल की दिलचस्पी, भारत के लिए लाभकारी साबित हो रही है।
इसके बावजूद, यह स्पष्ट हो गया है कि वर्ष 2000 के बाद से जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल और फिर ओबामा, ट्रंप के पहले कार्यकाल और जो बाइडन प्रशासन के दौरान अमेरिका और भारत के बीच जो भरोसा बढ़ रहा था, अब उसमें काफी कमी आई है। भारत अब यह उम्मीद नहीं कर सकता कि चीन के मुकाबले अपनी रणनीतिक अहमियत के कारण वह मोलतोल करने वाले अमेरिका के लिए महत्त्वपूर्ण रहेगा।
ऐसा लगता है कि केवल चीन ही, जो फिलहाल महत्वपूर्ण खनिजों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है, अमेरिका के सामने खड़े होने की स्थिति में है। अमेरिका ने चीन पर पहले जो 100 फीसदी से ज्यादा टैरिफ लगाए थे, उन्हें घटाकर 30 फीसदी और फिर 10 फीसदी तक लाया है। ट्रंप मार्च में चीन जा रहे हैं ताकि शी चिनफिंग से बातचीत कर सकें। भारत के पास इस तरह की सौदेबाजी की ताकत नहीं है।
वहीं भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद टाला गया है। भारत को 10 या 15 फीसदी टैरिफ के लाभ का 150 दिनों तक फायदा उठाना चाहिए और अमेरिका से जल्द ही एक समझौता करना चाहिए। कई बार दोबारा वार्ता करने के भी अपने जोखिम होते हैं जिसका सुझाव कुछ लोग दे रहे हैं। हाल ही में भारत को महत्त्वपूर्ण खनिजों और एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से अहम पैक्स सिलिका में जोड़ा जाना यह दर्शाता है कि दोनों देशों के बीच एक मजबूत संबंध है भले ही अमेरिका अप्रत्याशित क्यों न हो। लेकिन यह भारत के रणनीतिक और आर्थिक हितों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।
जब अमेरिका अपने वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को बिना किसी स्पष्ट कारण के नुकसान पहुंचा रहा है तब चीन खुद को एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन चीन कोई मदद नहीं कर रहा है। बढ़ते घरेलू खपत में दोबारा संतुलन बढ़ाने के बजाय, चीन ने अपने निर्यात पर ध्यान केंद्रित किया है और इसके लिए उसने कृत्रिम रूप से विनिमय दर को कम किया है।
अमेरिका में चीन के निर्यात में कमी आई है लेकिन वर्ष 2025 में उसका समग्र व्यापार अधिशेष बढ़कर एक लाख करोड़ डॉलर (सकल घरेलू उत्पाद का 5 फीसदी) से ऊपर जा चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का कहना है, ‘चीन का विनिर्माण केंद्रित वृद्धि पर निर्भर रहना, आंतरिक और बाहरी असंतुलन पैदा कर रहा है जिससे वैश्विक व्यापारिक साझेदारों के लिए ‘नकारात्मक प्रभाव’ पैदा हो रहे हैं।’
भारत के लिए चीन से व्यापार करना भी फायदेमंद नहीं है। वर्ष 2020 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा लगभग 50 अरब डॉलर था, जो आज बढ़कर दोगुना यानी 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया है। चीन ने जेनेरिक दवाइयों, इंजीनियरिंग सामान, विशिष्ट रसायन और प्रसंस्कृत खाद्य व कृषि उत्पादों जैसे प्रतिस्पर्धी भारतीय निर्यात पर भी रोक लगा रखी है। भारत का सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं से जुड़ा क्षेत्र भी चीन पर कोई बड़ा असर नहीं डाल पाया है। भारत को अब अपनी दवाओं, मोबाइल और सौर ऊर्जा से जुड़े कलपुर्जे के लिए चीन पर बनी अधिक निर्भरता कम करनी होगी।
चीन और अमेरिका के द्वारा अपनाई जा रही व्यापारिक वस्तुओं से जुड़ी नीतियों के बीच बाकी दुनिया एक-दूसरे के साथ व्यापार और निवेश समझौतों को तेजी से बढ़ा रही है। इस प्रकार के समझौतों की एक बड़ी श्रृंखला पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं, मसलन कोरिया-जापान, भारत-यूरोपीय संघ, यूरोपीय संघ-मर्कोसुर आदि।
व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी (सीपीटीपीपी) के तहत यूरोपीय संघ और 11 देशों मसलन ऑस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, कनाडा, चिली, जापान, मलेशिया, मेक्सिको, न्यूजीलैंड, पेरू, सिंगापुर और वियतनाम (जल्द ही ब्रिटेन के जुड़ने के साथ कुल12 देश हो जाएंगे) के बीच एक व्यापक व्यापार समझौता होने जा रहा है। यह बिना अमेरिका और चीन के विश्व का सबसे बड़ा व्यापारिक ब्लॉक बनेगा।
अब तक भारत ने अपनी नीतियों के जरिये तार्किक तरीके से कदम उठाया है। हाल ही में ब्रिटेन, ओमान, यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौतों सहित भारत ने अब तक 38 देशों के साथ 9 मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) किए हैं जो इसके कुल व्यापार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा हैं। यह बाकी दुनिया के लिए एक बड़ा संकेत है कि भारत व्यापार के लिए खुला है और यह अपनी पुरानी संरक्षणवादी नीतियों की ओर वापस नहीं लौट रहा है।
हाल ही में, कनाडा के साथ ऊर्जा, यूरेनियम और महत्त्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में एक समझौता हुआ है जबकि दोनों देशों के बीच रिश्ते हाल तक काफी तनावपूर्ण थे। अब वर्ष के अंत तक एक व्यापार समझौते पर भी ध्यान केंद्रित किया जा रहा है। इसके अलावा, भारत की इस साल ब्रिक्स-प्लस की अध्यक्षता अन्य अवसरों के लिए भी विकल्प तैयार कर सकती है। भारत को अंततः सीपीटीपीपी में सदस्यता पर विचार करना चाहिए।
इन चुनौतीपूर्ण समय में भी, भारत के पास अगले 15 वर्षों में वैश्विक वृद्धि का इंजन बनने की अपार संभावनाएं हैं। इसे वास्तविकता बनाने के लिए भारत को प्रधानमंत्री के सुधार अभियान जिसे उन्होंने‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ नाम दिया है, उसके तहत किए जाने वाले महत्त्वपूर्ण घरेलू सुधारों को लागू करने पर जोर देना चाहिए। साथ ही बुनियादी अवसंरचना और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी प्राथमिकता बनाए रखनी चाहिए।
हाल ही के बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए बढ़ा आवंटन स्वागत योग्य है। हमारी सीमाओं पर बढ़ते खतरे और हिंद महासागर क्षेत्र में तैयार हो रहे बड़े अवसरों और साथ ही जोखिम की स्थिति को देखते हुए और भी बहुत कुछ करना होगा। छोटे पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को सुधारना भी अहम प्राथमिकता होनी चाहिए। आज के दौर की बेहद प्रतिस्पर्द्धी दुनिया में आंतरिक शक्ति बेहद महत्त्वपूर्ण है चाहे वह आर्थिक हो या सैन्य शक्ति हो।
(लेखक जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी में विशिष्ट विजिटिंग स्कॉलर हैं)