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भारत के मजबूत बफर्स बाजारों को संभाल सकते हैं, लेकिन ज्यादा टाले नहीं जा सकते कठिन आर्थिक फैसले

भारत के पास फिलहाल बचाव उपलब्ध है जिसकी मदद से अभी बाजार का प्रबंधन किया जा सकता है, लेकिन भविष्य में कठिन नीतिगत फैसले करने होंगे। बता रहे हैं अनंत नारायण

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अनंत नारायण   
Last Updated- April 29, 2026 | 9:34 PM IST

अमेरिका-इजरायल-ईरान युद्ध के चलते भारत भी अनिश्चित समय से गुजर रहा है। आर्थिक और नियामक बफर यानी बचाव मौजूद हैं, और बाजारों ने अधिक जोखिम को मूल्यांकित कर लिया है। हालांकि, व्यापक आर्थिक कमजोरियां बनी हुई हैं। भारत को अधिक निवेश और नवाचार की आवश्यकता है। इस उद्देश्य के लिए उपयुक्त नीतियां, बाहरी और राजकोषीय असंतुलन को दूर करने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और संतुलित विकास को बेहतर सहारा देने में मदद कर सकती हैं।

बाजार, प्रवाह और नियमन

भारत लगातार बाहरी असंतुलन का शिकार है। वित्त वर्ष 25 में भारत का मुख्य बाहरी घाटा 38 अरब डॉलर था। यह चालू खाते के घाटे, शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और शुद्ध इक्विटी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश से संबद्ध था। वित्त वर्ष 26 में यह बढ़कर 40-45 अरब डॉलर हुआ और वित्त वर्ष 27 में यह 50 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसके विपरीत, रिजर्व बैंक के पास अग्रिम बिक्री को घटाकर अनुमानित 585 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। यह बफर भारत को समायोजन के लिए समय प्रदान करता है।

हालांकि, वित्त वर्ष 2025 और 2026 के दौरान, रिजर्व बैंक को लगभग 195 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा की शुद्ध आपूर्ति करनी पड़ी, जो अनुमानित 80 अरब डॉलर के मुख्य घाटे से कहीं अधिक थी। इसलिए लगभग 115 अरब डॉलर की मांग, मुख्य घाटे से नहीं बल्कि हेजिंग और सट्टेबाजी से प्रेरित थी। ऑफशोर रुपया नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाजार इस गतिशीलता की कुंजी है। पूंजी खाते के प्रतिबंधों को देखते हुए, आप घरेलू प्रतिभागी मुद्रा बाजार में आसानी से सटोरिया गतिविधि नहीं कर सकते। एनडीएफ बाजारों में ऑफशोर प्रतिभागियों पर ऐसे कोई प्रतिबंध लागू नहीं हैं।

कुछ साल पहले रिजर्व बैंक ने भारतीय बैंकों को ऑनशोर और एनडीएफ बाजारों में आर्बिट्राज (विभिन्न एक्सचेंजों पर एक साथ खरीद-बिक्री की इजाजत) की इजाजत दी थी ताकि दोनों बाजारों में मूल्य निर्धारण और नकदी को एक समान किया जा सके।

सहज मौद्रिक नीति ने डॉलर और रुपये के बीच ब्याज दर के अंतर को संकुचित कर दिया, जबकि भारत का बाहरी असंतुलन लगातार बना रहा। इसके परिणामस्वरूप प्रतिभागियों ने रुपये के विरुद्ध अपनी हेजिंग और सट्टेबाजी की स्थिति लगातार बढ़ाई। पिछले महीने जब रिजर्व बैंक ने ऑनशोर-एनडीएफ आर्बिट्राज को सीमित करने के कदम उठाए, तब अनुमानित 40 अरब डॉलर की एनडीएफ पोजीशन पर घरेलू बाजारों द्वारा मध्यस्थता की जा रही थी।

मुद्रा बाजारों को लगातार बने बाहरी घाटे के जवाब में कमजोर रुपये के साथ प्रतिक्रिया करनी चाहिए। वास्तव में, 40 देशों के व्यापार-भारित वास्तविक प्रभावी विनिमय दर के संदर्भ में देखें तो, रुपया 2025 की शुरुआत में 107 से अब लगभग 92 तक कमजोर हुआ है।

हालांकि, मुख्य घाटे से कहीं अधिक, जब बड़े पैमाने पर एकतरफा पोजिशनिंग के कारण अवमूल्यन का एक ऐसा चक्र बन जाता है जो खुद को ही और मज़बूत करता जाता है, तो विनिमय दर बुनियादी आर्थिक कारकों को दर्शाने के बजाय, उन्हें प्रभावित करना शुरू कर सकती है। ऐसे में नियामक हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है।

ऑनशोर और ऑफशोर बाजारों के बीच आर्बिट्राज को सीमित करने के रिजर्व बैंक के उपाय इस संदर्भ में उचित थे, भले ही उनके क्रियान्वयन के समय और तरीके पर बहस की जा सकती है। यह ध्यान रखना अहम है कि रिजर्व बैंक ने व्यापार या पूंजी निवेश वाले किसी भी व्यक्ति को ऑनशोर हेजिंग से नहीं रोका है। न ही उसके कदम एनडीएफ बाजारों में सट्टेबाजी को रोक सकेंगे। हालांकि वे घरेलू समर्थन को सीमित करेंगे और इस प्रकार की सट्टेबाजी की लागत को बढ़ाएंगे।

भारत के इक्विटी बाजार मूल्यांकन भी समय के साथ वैश्विक बाजारों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से नरम हुए हैं। भारतीय इक्विटी में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के स्वामित्व का हिस्सा कई दशकों के निचले स्तर पर है।

वृहद आर्थिक जोखिम

वृहद आर्थिक जो​खिम बरकरार हैं। मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के तेल मूल्य अनुमानों के आधार पर, भारत का चालू खाता घाटा वित्त वर्ष 2027 में 50-60 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यह चिंता का विषय है, क्योंकि भारत पूंजी प्रवाह आकर्षित करने के लिए संघर्ष कर रहा है।

राजकोषीय दबाव भी महत्त्वपूर्ण हैं। राज्य सरकारें व्यय को स्थगित करके घाटे को कम दिखा सकती हैं। इसे समायोजित करने पर, भारत का वास्तविक राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1 से 1.5 फीसदी तक अधिक हो सकता है। प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण की बढ़ती प्रवृत्ति राजकोषीय बोझ को और बढ़ाती है। आगामी वेतन आयोग के लागू होने पर भी यह देखने को मिलेगा।

ऊर्जा की ऊंची कीमतें भारत के राजकोषीय संतुलन पर दबाव को बढ़ा सकती हैं, बशर्ते कि खुदरा कीमतों में सार्थक वृद्धि न की जाए। हमें विकल्प चुनने होंगे। या तो राजकोषीय घाटा बढ़ाना होगा या फिर अधिक मुद्रास्फीति और धीमी वृद्धि का जोखिम उठाना होगा।

वृद्धि पहले से ही आपूर्ति श्रृंखला व्यवधानों से प्रभावित हो रही है। अल नीनो के असर और किसी भी उर्वरक की कमी से वृद्धि और मुद्रास्फीति दोनों के लिए जोखिम और बढ़ेंगे। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का रोजगार और महत्त्वपूर्ण सॉफ्टवेयर सेवाओं के क्षेत्र पर प्रभाव भी चिंता का विषय बना हुआ है।

फिलहाल, नीति-निर्माताओं को कठिन विकल्पों को टालने का प्रलोभन हो सकता है। सरकार ऊर्जा मूल्य बोझ का बड़ा हिस्सा वहन कर सकती है। मौद्रिक नीति अपेक्षाकृत सहज रह सकती है, जबकि भंडार और नियामक कदमों का संयोजन विनिमय दर के दबाव को प्रबंधित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह सब तब काम कर सकता है, जब या तो ऊर्जा की कीमतें तेजी से गिरें, या फिर भारत में पूंजी का प्रवाह फिर से शुरू हो जाए। उम्मीद कोई रणनीति नहीं होती।

आगे की राह

भारत को नवाचार, निवेश और विकास की जरूरत है। इसके लिए सही राजकोषीय और नियामक नीतिगत विकल्प जरूरी हैं। विदेशी निवेशकों को अब यह विश्वास करना चाहिए कि रुपया अत्यधिक कमजोर प्रदर्शन नहीं करेगा। हालांकि भारत एक साथ कम ब्याज दरें, उच्च पूंजी प्रवाह और स्थिर रुपया नहीं बरकरार रख सकता। हमें वित्तीय दमन को कम करने की ओर देखना होगा।

रिजर्व बैंक द्वारा बड़े पैमाने पर बॉन्ड खरीद और कम ब्याज दरें ऋण वृद्धि में मददगार प्रतीत हो सकती हैं। लेकिन जब कर-पश्चात ब्याज आय पर मिलने वाले रिटर्न मुद्रास्फीति को मात नहीं दे पाते, तब ऋण बाजार अवरुद्ध हो जाते हैं। अधिक बाजार निर्धारित ब्याज दरें कई तरह से मददगार होंगी और वे राजकोषीय जवाबदेही को भी बढ़ावा देंगी।

भारत की कराधान व्यवस्था में भी बदलाव की आवश्यकता है। घरेलू निवेशकों को उपयुक्त परिसंपत्ति आवंटन और पूंजी निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए परिसंपत्ति-निरपेक्ष कम-कर व्यवस्था चाहिए। भारत का स्रोत-आधारित पूंजीगत लाभ कर ढांचा विदेशी निवेशकों के लिए एक बड़ी बाधा है और भारत को वैश्विक अपवाद बना देता है।

भारत के पास वर्तमान परिदृश्य से निपटने के लिए बफर हैं। हालांकि, आत्मसंतु​ष्टि की कोई गुंजाइश नहीं है। नीति को अब अस्थिरता प्रबंधन से निवेश और संतुलित विकास को सक्षम बनाने की ओर स्थानांतरित करना होगा।


(लेखक सेबी के पूर्व पूर्णकालिक सदस्य हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : April 29, 2026 | 9:28 PM IST