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बाजार की तेजी बनाम भू-राजनीतिक हकीकत: पश्चिम एशिया में नाजुक शांति

क्या दुनिया भर के बाजारों में मौजूदा तेजी पश्चिम एशिया में एक स्थायी शांति योजना का संकेत दे रही है

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देवाशिष बसु   
Last Updated- April 21, 2026 | 9:44 PM IST

बाजार अक्सर ऐसा व्यवहार करता है जैसे मानो उसने अगले सप्ताह के संभावित घटनाक्रम का पहले ही अंदाजा लगा लिया हो। जब वास्तविक घटनाक्रम से पहले ही कीमतें अचानक बढ़ती या गिरती हैं तो कुछ मामलों में बाजार अंदाजा लगा भी लेता है। तो क्या दुनिया भर के बाजारों में मौजूदा तेजी पश्चिम एशिया में एक स्थायी शांति योजना का संकेत दे रही है जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के सोशल मीडिया पर बेतरतीब और विरोधाभासी पोस्ट से ताकत मिल रही है? दुनिया भर में शेयर बाजार में उछाल आई है।

नैसडैक लगातार 13 दिनों तक तेजी दर्ज कर सर्वकालिक उच्च स्तर को छू चुका है। निफ्टी 30 मार्च के बंद भाव से 9 फीसदी उछल चुका है। छोटे और मझोले शेयर (मिड-कैप और स्मॉल-कैप) भी तेजी से चढ़े हैं। न्यूयॉर्क मर्केंटाइल इंडेक्स (एनवाईमेक्स) पर कच्चे तेल की कीमतें 7 अप्रैल को कुछ देर के लिए 117 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गईं और फिर उसी दिन 14 फीसदी गिर गईं और 17 अप्रैल को 12.8 फीसदी की अतिरिक्त गिरावट के साथ फिसल कर 82 डॉलर के स्तर तक आ गईं।

इस आशावाद के केंद्र में एक ही धारणा है और वह यह कि होर्मुज स्ट्रेट के खुलने से संकट का प्रभावी अंत हो जाएगा। आयात पर निर्भर भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह एक बड़ा बदलाव है। कच्चे तेल की कम कीमतें मुद्रास्फीति को कम करती हैं, चालू खाता मजबूत करती हैं और कंपनियों का मुनाफा बढ़ाती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि बाजार ने उत्साह के साथ प्रतिक्रिया दी है मगर जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। होर्मुज के ‘खुले’ होने की धारणा सोशल मीडिया पोस्ट से मजबूत हो रही है न कि व्यापारिक मार्गों की हलचल से।

जहाजों के बीच रास्ते से वापस लौटने, ईरान की सेना द्वारा जारी चेतावनी और बीमा महंगा होने की खबरें बताती हैं कि वैश्विक तेल व्यापार का यह अहम मार्ग अनिश्चितताओं में फंस गया है। किसी मार्ग से गुजरने के लिए अनुमति की आवश्यकता हो तो फिर उसे खुला नहीं कह सकते। इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि कुछ दिनों पहले ही रूस पर तेल प्रतिबंधों में ढील की अवधि नहीं बढ़ाने की घोषणा के बाद अमेरिका ने अपना रुख पलट दिया और इसे जारी रखने का निर्णय लिया।

कूटनीतिक मोर्चे पर ईरान और अमेरिका के रुख के बीच का अंतर फारस की खाड़ी से भी कहीं अधिक है। बहुचर्चित वार्ता (जिन्हें अनौपचारिक रूप से ‘इस्लामाबाद वार्ता’ कहा जा रहा है) अभी भी प्रारंभिक चरण में हैं। ईरान के यूरेनियम संवर्द्धन, परमाणु हथियार, प्रतिबंधों से राहत, जब्त कोष मुक्त करने, क्षेत्रीय ‘सहयोगियों’ की भूमिका, दक्षिणी लेबनान पर इजरायल के हमले, युद्ध से हुए नुकसान की क्षति-पूर्ति और होर्मुज जलमार्ग से यातायात के नियंत्रण और मूल्य निर्धारण जैसे केंद्रीय अहम मुद्दों पर कोई प्रगति नहीं हुई है।

अमेरिका का दावा है कि उसकी नौ सेना ने होर्मुज जलमार्ग की नाकाबंदी कर रखी है। ईरान का कहना है कि जब तक अमेरिका द्वारा नाकाबंदी जारी रहेगी होर्मुज जलमार्ग उसके नियंत्रण में ही रहेगा। शुक्रवार को ट्रंप द्वारा होर्मुज जलमार्ग के खुलने की घोषणा के बाद ईरान ने दावा किया कि जलमार्ग से गुजरने के लिए आईआरजीसी के साथ तालमेल बनाना जरूरी है। इस बीच, ट्रंप द्वारा इजरायल को लेबनान पर बमबारी करने से ‘रोकने’ की घोषणा के कुछ ही घंटों बाद इजरायल के हमले जारी रहे जिसमें हिज्बुल्लाह से जुड़े बुनियादी ढांचे को निशाना बनाया गया। यह शांति से अधिक बस लड़ाई में एक तात्कालिक विराम जैसा प्रतीत होता है।

अगर बाजार वाकई में एक बार फिर भविष्य की ओर देखने लगे हैं तो लगता है कि ये सभी मुद्दे जल्द ही सुलझ जाएंगे। मगर भविष्य की ओर देखना हमेशा समझदारी भरा नहीं होता। पहले से अनुमान लगाने के चक्कर में बाजार निराधार सोच का शिकार हो सकते हैं। निवेशक बाजार में तेजी देखते हुए यह सोचने लगे हैं कि आगे युद्ध विराम कायम रहेगा, बातचीत आगे बढ़ेगी और तेल की कीमतें नियंत्रण में रहेंगी। मगर अमेरिकी बेंचमार्क वास्तविकता से बिल्कुल अलग है। न्यूयॉर्क में कारोबार किए जा रहे सट्टेबाजी वाले तेल वायदा अनुबंधों का वास्तविक लेनदेन से कोई मतलब नहीं है। सऊदी अरब के वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जादान ने कुछ दिनों पहले कहा कि ‘आप स्क्रीन पर तेल की कीमत 90 डॉलर देखते हैं। उस कीमत पर एक बैरल खरीदना मुश्किल है। वास्तविक कीमत तो 120-160 प्रति बैरल है।’

तेल की भौतिक वास्तविकता पर विचार करें। व्यवधान के दौरान एशिया और यूरोप के कुछ हिस्सों में भंडार कम हो गए हैं जिससे नए झटकों से निपटने की बहुत कम गुंजाइश बची है। आपूर्ति तंत्र तुरंत दुरुस्त नहीं हो सकते। अगर होर्मुज स्ट्रेट से आवाजाही पूरी तरह शुरू भी हो जाए तब भी हालात सामान्य होने और तेल भंडार भरने में 40-50 दिन लगेंगे। इस दौरान वास्तविक लेनदेन की कीमतें ऊंची बनी रहेंगी जो आपूर्ति की कमी की वास्तविकता की ओर इशारा करती है।

विदेशी निवेशकों ने घरेलू निवेशकों की तुलना में इस नाजुक स्थिति को अधिक आसानी से समझ लिया है। भारत में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने अप्रैल में अब तक लगातार बिकवाली की है। सूचकांकों में तेजी के बावजूद उन्होंने हजारों करोड़ रुपये के शेयर बेच डाले हैं। जाहिर है, वे रुपये में गिरावट के कारण भी शेयर बेच रहे हैं जिससे डॉलर के मामले में उनका रिटर्न कम हो जाता है। बाजारों और वास्तविकता के बीच यह अंतर कोई नई बात नहीं है। वित्तीय बाजार अक्सर घटनाओं से आगे निकल जाते हैं और उनके घटित होने से पहले ही परिणामों का अनुमान लगा लेते हैं। कभी-कभी यह दूरदर्शिता सही साबित होती है। कभी-कभी यह सिर्फ समय से पहले की भविष्यवाणी होती है।

अब सवाल है कि बाजार के पूर्वानुमान सही हों इसके लिए क्या जरूरी होगा? मैं यह मानकर चल रहा हूं कि ईरान का पलड़ा अभी भारी है इसलिए मैं इस बात पर नजर रखूंगा कि ईरान की मुख्य मांगें पूरी हो रही हैं या नहीं। इन मांगों में यूरेनियम संवर्द्धन, होर्मुज स्ट्रेट पर टोल, प्रतिबंध और लेबनान आदि मुद्दे शामिल हैं। रूस और चीन की मदद से ईरान पर दबाव बनाने के बाद यह समझना मुश्किल है कि आखिर वह (ईरान) उन मांगों से पीछे क्यों हटेगा जो उनकी ताकत है। दूसरा परिदृश्य यह हो सकता है कि अमेरिका इनमें से किसी भी बात पर सहमत न हो और एक बार फिर युद्ध छेड़ दे। ऐसा हुआ तो हालात और अनिश्चित हो जाएंगे। फिलहाल दोनों देशों के बीच वार्ता पर छाए संदेह के बादल कुछ इसी ओर इशारा कर रहे हैं।


(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)

First Published : April 21, 2026 | 9:38 PM IST