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निजीकरण नहीं, मुद्रीकरण: सरकार बनाएगी और मालिक रहेगी, निजी कंपनियां सिर्फ चलाएंगी प्रोजेक्ट्स

बजट 2026-27 में सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह सार्वजनिक संपत्तियों को बेचे बिना उनके परिचालन अधिकारों के जरिए ₹16.72 लाख करोड़ जुटाने के लिए एनएमपी 2.0 पर ध्यान केंद्रित करेगी

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विनायक चटर्जी   
Last Updated- May 03, 2026 | 10:25 PM IST

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2026-27 के अपने बजट भाषण में बिल्कुल स्पष्ट कर दिया है कि सरकार संपत्तियों का मालिकाना हक (स्वामित्व) नहीं बेच रही है, बल्कि सिर्फ उनके इस्तेमाल के ‘अधिकारों’ से कमाई करेगी। यानी सरकार सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परिसंपत्तियों के परिचालन का अधिकार निजी कंपनियों को दे रही है, लेकिन परिसंपत्तियों की बिक्री नहीं करेगी।

दरअसल, राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन (एनएमपी) 2.0 एक तरह से पिछले दरवाजे से लाई गई ‘पीपीपी’ (सार्वजनिक-निजी साझेदारी) ही है। इसका सीधा मतलब है कि सरकार जो बुनियादी ढांचा बनाएगी और जिसकी वह मालिक होगी, उसके परिचालन का काम निजी कंपनियां करेंगी। वहीं दूसरी तरफ, बिल्कुल नई परियोजनाओं में सीधे रास्ते  से पीपीपी के तहत निजी निवेश पहले की तरह ही आता रहेगा।  

 इस तरह, पिछले 25 वर्षों तक नई परियोजनाओं में पीपीपी मॉडल आजमाने के बाद, अब भारत की बुनियादी ढांचा रणनीति एक ज्यादा व्यावहारिक राह पर चल रही है। इस नए रास्ते का सीधा सा नियम है कि संपत्ति सरकारी ही रहेगी सिर्फ उसे चलाने की जिम्मेदीर निजी हाथों में जाएगी। फरवरी 2026 में शुरू किए गए एनएमपी 2.0 का लक्ष्य (वित्त वर्ष 2026-30 के लिए) 16.72 लाख करोड़ रुपये रखा गया है। यह बड़ा आंकड़ा वित्त वर्ष 2021-25 के एनएमपी 1.0 के 5.95 लाख करोड़ रुपये के लक्ष्य से करीब 2.6 गुना ज्यादा है।

रणनीति में आया यह बदलाव इस बात का पुख्ता सबूत है कि नीतियां बनाने वाले अब समझ चुके हैं कि निजी निवेशक किसी भी परियोजना के तीसरे चरण, यानी ‘संचालन के जोखिम’ में पैसा लगाना पसंद करते हैं। ऐसा तब होता है जब सरकार पहले दो शुरुआती चरण यानी विकास और निर्माण से जुड़े जोखिम खुद उठा लेती है।

सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो, पीपीपी मॉडल को एक बहुत ही सरल सिद्धांत पर काम करना चाहिए। वह सिद्धांत यह है कि जोखिम उसी पक्ष को सौंपे जाएं परियोजना के तीन मुख्य चरणों वाले जोखिम के दौरान उसका सबसे अच्छी तरह प्रबंधन कर सके मसलन, विकास का जोखिम (जमीन अधिग्रहण, जरूरी मंजूरियां लेना, पैसों का इंतजाम आदि), निर्माण का जोखिम (लागत का बढ़ना या काम में देरी होना), संचालन का जोखिम (मांग और कमाई की अनिश्चितता)।

भारत में पहले जब नई परियोजनाओं में पीपीपी का दौर शुरू हुआ था, तब एक बड़ी गलती यह हुई थी कि ये तीनों जोखिम गलत तरीके से पूरी तरह से निजी कंपनियों के सिर मढ़ दिए गए। इन कंपनियों ने भी भविष्य को लेकर ज्यादा ही उत्साह दिखाया और बढ़-चढ़कर बोलियां लगा दीं। लेकिन यह मॉडल आगे चलकर चरमरा गया। ट्रैफिक का गलत अनुमान, जमीन अधिग्रहण में होने वाली देरी और लागत का बढ़ना ऐसी समस्याएं बनीं जिन्होंने पूरी स्थिति बिगाड़ दी। हालत यह हो गई कि राजमार्ग की 73 पीपीपी परियोजनाओं (लगभग 8,300 किमी) में से 43 को रद्द करना पड़ा। इससे नई परियोजनाओं में पीपीपी मॉडल को लेकर निजी क्षेत्र का भरोसा टूट गया। 

एनएमपी 1.0 के अंतर्गत सड़कों, रेलवे, बिजली, पाइपलाइन और दूरसंचार के क्षेत्रों में लक्ष्य निर्धारित किए गए थे। टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (टीओटी), बुनियादी ढांचा निवेश ट्रस्ट (इनविट) और प्रतिभूतिकरण जैसे तरीके का उपयोग किया गया, जिससे लक्ष्य का 89 फीसदी यानी 5.3 लाख करोड़ रुपये हासिल हुआ। हालांकि, प्रदर्शन हर क्षेत्र में एक समान नहीं रहा और सड़क एवं कोयला क्षेत्रों ने नेतृत्व किया, जबकि रेलवे (30 फीसदी) और विमानन (14 फीसदी) काफी पीछे रह गए। 

बाजार की प्रतिक्रिया इसकी विश्वसनीयता की पुष्टि करती है। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने वित्त वर्ष 2025-26 में इनविट्स और टीओटी के माध्यम से 28,307 करोड़ रुपये जुटाए हैं। खुदरा निवेशकों के लिए एनएचएआई के पहले सार्वजनिक इनविट, ‘राजमार्ग इन्फ्रा इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट’ (आरआईआईटी) की ऐतिहासिक शुरुआत हुई, जिसने 9,500 करोड़ रुपये जुटाए। मार्च 2026 में बीएसई पर सूचीबद्ध होने के दौरान इसे लगभग 14 गुना अधिक अभिदान मिला। 

नीतिगत दिशानिर्देशों के कारण अब विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर तालमेल दिख रहा है। रेलवे ने एनएमपी  1.0 के लक्ष्यों का केवल 29 फीसदी ही पूरा किया था, लेकिन अब एनएमपी 2.0 के तहत उसे 2.62 लाख करोड़ रुपये का लक्ष्य पूरा करना है। रेलवे बोर्ड द्वारा 2025 में अपनी 2012 की पीपीपी नीति को संशोधित करने का प्रस्ताव जोखिम बंटवारे को दर्शाता है जिसमें रियायत की अवधि को 50 वर्ष तक बढ़ाना और भूमि अधिग्रहण का जिम्मा खुद लेना शामिल है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि एनएमपी 2.0 केवल परिचालन को पट्टे पर देने तक सीमित नहीं है। इसमें सूचीबद्ध सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) में अल्पांश हिस्सेदारी बेचना भी शामिल है। अकेले सात रेलवे पीएसयू से 82,700 करोड़ रुपये जुटाने की योजना है। विनिवेश का लक्ष्य वित्त वर्ष 2025-26 के 47,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 80,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। संपत्ति से कमाई और सार्वजनिक उपक्रमों में हिस्सेदारी की बिक्री के इस संयोजन से निवेशकों की पहुंच अब बोर्डरूम तक होगी, जिससे प्रबंधन के निर्णयों में उनकी प्रभावी भूमिका सुनिश्चित होगी।

 सार्वजनिक परिसंपत्तियों को कमाई का जरिया बनाए जाने के लिए प्रारूप तैयार करना एक जटिल कार्य हो सकता है। इन्हें इस तरह से तैयार किया जाना आवश्यक है कि नए निजी संचालक न केवल सख्त सेवा स्तर समझौतों (एसएलए) का पालन करें, बल्कि सुरक्षा, आधुनिकीकरण, नवीनीकरण और जनसेवा पर भी पर्याप्त ध्यान दें। साथ ही, उन्हें अपनी निवेश की गई पूंजी पर उचित लाभ भी मिलना चाहिए।

सेवा स्तर समझौतों में मापने योग्य मानक (जैसे समयबद्धता, सुरक्षा और शिकायतों के निपटारे की समयसीमा) स्पष्ट होने चाहिए। यहां संतुलन बनाना अनिवार्य है क्योंकि कम जुर्माने से नियमों के उल्लंघन को बढ़ावा मिलता है जबकि बहुत सख्त दंडात्मक नियम गंभीर बोलीदाताओं की दिलचस्पी कम कर सकते हैं। अनुबंध में ‘जनसेवा’ को अंकों या मात्रा में परिभाषित करना स्वाभाविक रूप से कठिन है।

इसके अलावा, आधुनिकीकरण की जिम्मेदारियां अक्सर कम रियायती अवधि के साथ मेल नहीं खातीं। वहीं, सामाजिक रूप से आवश्यक लेकिन घाटे वाले मार्गों को अनिवार्य बनाना परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता को तब तक कमजोर करता है, जब तक कि अनुबंध में संरचित सब्सिडी या व्यवहार्यता अंतर फंडिंग का प्रावधान न हो। व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो एक ऐसा मुद्रीकरण प्रारूप तैयार करना एक जटिल राजनीतिक, संस्थागत और आर्थिक चुनौती है जो इन सभी पहलुओं को आपस में जोड़ सके।

इन सभी बारीकियों को सही ढंग से समझना और लागू करना ही असली चुनौती है। इसका उद्देश्य मूल स्वामित्व को बेचे बिना, भारत की बुनियादी ढांचा सेवाओं की आपूर्ति में निजी पूंजी की भागीदारी के लिए एक वैकल्पिक रास्ता तैयार करना है। स्पष्ट है कि सार्वजनिक परिसंपत्तियों को कमाई का जरिया बनाना ही अब सार्वजनिक-निजी भागीदारी का नया और आधुनिक स्वरूप है। 

(लेखक बुनियादी ढांचे के विशेषज्ञ हैं और इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक तथा प्रबंध न्यासी हैं। शोध में डॉ. मुतुम चाओबिसाना का भी योगदान)

 

First Published : May 3, 2026 | 10:25 PM IST