कॉरपोरेट कानून (संशोधन) विधेयक, 2026, भारत के निगमित नियामकीय ढांचे के सतत विकास में एक स्वागत योग्य कदम है। गत 23 मार्च को लोक सभा में पेश इस विधेयक में कंपनी अधिनियम, 2013 और सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) अधिनियम, 2008 में व्यापक संशोधन के प्रस्ताव दिए गए हैं जिनका उद्देश्य संचालन मजबूत करने के साथ कारोबार सुगमता बढ़ाना है। इसमें व्यावहारिकता पर जोर दिया गया है। इनमें कंपनी संचालन कार्यों में बाधाएं दूर करना, प्रवर्तन आनुपातिक बनाना, आंतरिक संचालन प्रक्रियाओं का आधुनिकीकरण करना और नियामक अनुशासन को उन क्षेत्रों पर केंद्रित करना जहां इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है आदि शामिल हैं। अंतिम फैसले के लिए वापस भेजे जाने से पहले विधेयक को जांच और हितधारकों के सुझावों के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजा गया है।
इसकी एक प्रमुख विशेषता संचालन अनुशासन बनाए रखते हुए अनुपालन को आकार के अधिक आनुपातिक बनाना है। प्रस्तावित ‘लघु कंपनी’ सीमा का विस्तार (चुकता पूंजी लगभग 10 करोड़ से बढ़ाकर लगभग 20 करोड़ रुपये और कारोबार लगभग 100 करोड़ से बढ़ाकर लगभग 200 करोड़ रुपये) विकास के चरण में बुनियादी मानकों के साथ समझौता किए बिना संस्थाओं को आसान अनुपालन व्यवस्था के दायरे में ला सकता है।
देर से जानकारियां देने पर (फाइलिंग) अतिरिक्त शुल्क (समग्र सीमा सहित) को युक्तिसंगत बनाया जाएगा और प्रभार पंजीकरण की समय सीमा बढ़ाई जाएगी (कुल अवधि 180 दिनों तक) जिससे प्रक्रियात्मक देरी के लिए दंड से जुड़े प्रावधान कम होंगे और समय पर नियमितीकरण को बढ़ावा मिलेगा। लघु या एकल या निष्क्रिय कंपनियों के लिए अनुपालन आवश्यकताओं को आसान बनाया गया है।
यह कॉरपोरेट कानून को आधुनिक पूंजी और प्रतिभा की वास्तविकताओं के अनुरूप भी बनाता है। पारंपरिक ईसॉप (कर्मचारी स्टॉक-विकल्प योजनाओं) से परे समकालीन शेयर-लिंक्ड रिवॉर्ड साधन को मान्यता देना इस बात का संकेत है कि कंपनियां मौजूदा समय में प्रोत्साहन का ढांचा कैसे तैयार करती हैं। पुनर्खरीद प्रावधानों को आधुनिक बनाने का प्रस्ताव है। यानी पात्रता का विस्तार (जिसमें ईसॉप/स्वेट इक्विटी और इसी तरह की योजनाएं शामिल हैं), निर्धारित श्रेणियों के लिए प्रति वर्ष अधिकतम दो पुनर्खरीद करने की छूट (न्यूनतम अंतराल की शर्त के साथ), गणना प्रक्रियाओं को स्पष्ट करना और शपथ पत्र आधारित ऋण शोधन अक्षमता सत्यापन समाप्त करने का जिक्र है। नियमों के माध्यम से सुरक्षा उपायों को शामिल करने से व्याख्यात्मक विवादों को कम किया जा सकता है और पूंजी प्रबंधन की दक्षता में सुधार किया जा सकता है।
तीसरा मुख्य विषय है डिजिटल-प्रथम शासन प्रणाली जिसमें नियंत्रण व्यवस्था बरकरार रखी गई है। सालाना आम बैठकें (एजीएम) और असाधारण आम बैठकें (ईजीएम) भौतिक (फिजिकल) रूप से, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग/ऑडियो-विजुअल माध्यम से या हाइब्रिड रूप में (शर्तों के अधीन) आयोजित की जा सकती हैं। निर्धारित मानदंडों को पूरा करने पर अनुरोध किए जाने पर हाइब्रिड बैठकें भी संभव हैं। प्रत्येक तीन वर्ष में कम से कम एक फिजिकल एजीएम आयोजित करने से शेयरधारकों के साथ नियमित रूप से व्यक्तिगत संवाद बना रहता है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित होने वाली ईजीएम को कम समय के पूर्व सूचना पर (कम से कम सात दिन पहले या निर्धारित समयानुसार) बुलाया जा सकता है।
कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) को युक्तिसंगत बनाने का उद्देश्य इसके अंतर्गत दायित्वों को क्षमता के अनुरूप बनाना और प्रक्रियात्मक चूक को कम करना है। शुद्ध लाभ की सीमा लगभग 5 करोड़ से बढ़कर लगभग 10 करोड़ (या निर्धारित अनुसार) हो गई है, चालू परियोजनाओं के लिए बिना इस्तेमाल हुई सीएसआर राशि के हस्तांतरण की समय सीमा वर्ष के अंत से 30 दिनों से बढ़ाकर 90 दिन कर दी गई है और सीएसआर समिति के गठन के लिए निर्धारित सीमा को बढ़ाने का प्रस्ताव है (वार्षिक सीएसआर दायित्व को लगभग 50 लाख से बढ़ाकर लगभग 1 करोड़ करना)।
एक सक्षम प्रावधान निर्धारित श्रेणियों को कुछ शर्तों के साथ सीएसआर से छूट देता है जिससे समय के साथ अधिक तथ्य-आधारित दृष्टिकोण के लिए गुंजाइश बनती है।
कॉरपोरेट के व्यवहार और कारोबार से निकलने के विषय पर कई प्रस्ताव प्रक्रियात्मक देरी कम कर सकते हैं और पूर्वानुमान में सुधार कर सकते हैं। 75 फीसदी ‘उपस्थिति और मतदान’ अनुमोदन सीमा के माध्यम से त्वरित विलय/विभाजन अधिक व्यावहारिक हो जाते हैं और हस्तांतरित/परिणामी कंपनी पर आधारित योजनाओं के लिए राष्ट्रीय कंपनी विधि पंचाट (एनसीएलटी) की एक पीठ का क्षेत्राधिकार बहु-पीठों में दायर मामलों को कम कर सकता है।
पहले से ही परिसमापन की प्रक्रिया से गुजर रहीं कंपनियों के लिए योजनाओं को प्रतिबंधित करने से दिवालियापन प्रक्रियाओं के साथ दोहराव जोखिमों का समाधान होता है। निष्क्रिय या जानकारियां नहीं सौंपने वाली कंपनियों के लिए पंजीकरण रद्द करने के आधारों का दायरा बढ़ाया गया है, निर्धारित श्रेणियों को क्षेत्रीय निदेशकों के अधीन स्थानांतरित किया गया है और संक्षिप्त परिसमापन को स्पष्ट किया गया है जिसमें एक आधिकारिक परिसमापक या पंजीकृत दिवालियापन पेशेवर की नियुक्ति शामिल है। इससे कम जोखिम वाले परिसमापन के लिए त्वरित और अधिक आनुपातिक निकास में मदद मिलती है।
यह विधेयक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) के नियमों का पालन आसान बनाने का प्रस्ताव करता है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (आईएफएससी) संस्थाओं को शेयर पूंजी और वित्तीय रिकॉर्ड के लिए विदेशी-मुद्रा मानक पर लाया जाएगा।
अंततः अपराधीकरण से आनुपातिक प्रवर्तन की ओर बढ़ना एक स्वागत योग्य बदलाव है। नियमित चूक के मामलों में जुर्माना या अभियोजन के बजाय नागरिक दंड का प्रावधान किया गया है, क्षेत्रीय निदेशकों द्वारा न्यायनिर्णय मामलों का दायरा बढ़ाया गया है जिससे एनसीएलटी का समय बचेगा एवं त्वरित समाधान संभव होगा। इसके साथ निपटान और वसूली तंत्र प्रवर्तनीयता मजबूत होने से डर आधारित अनुपालन कम हो जाएगा।
कुछ अपील के लिए पूर्व जमा आवश्यकताओं और क्षेत्रीय निदेशकों के स्तर पर उच्च चक्रवृद्धि सीमा लागू करने से पंचाटों में लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रियाओं के बजाय प्रशासनिक निपटान को बढ़ावा मिलेगा साथ ही वास्तविक विवादों के लिए उपचार भी सुरक्षित रहेंगे।
निगमन में मुद्दे अक्सर कानूनी के बजाय परिचालनात्मक होते हैं। सीमा पार निष्पादन के लिए व्यापक रूप से अधिक स्वीकार्य पता प्रमाण/वैधता सीमा और प्रसंस्करण चरण में अधिक सक्रिय ढांचा पारदर्शिता और पूर्वानुमान में सुधार करेंगे। निकास के संदर्भ में ‘स्ट्राइक ऑफ’ के दौरान (फाइलिंग के बाद मगर अंतिम आदेश से पहले) अधिशेष निधियों की वापसी के लिए एक नियंत्रित तंत्र को सक्षम करना, सीमा और डिजिटल प्रथम प्रक्रियाओं के माध्यम से सारांश परिसमापन की व्यावहारिक पहुंच का विस्तार करना और गैर-परिचालित संकटग्रस्त संस्थाओं के लिए (सुरक्षा उपायों के साथ) एक त्वरित प्रशासनिक निकास पर विचार करना पूंजी के अधिक उपयोगी निवेश और निवेशकों के विश्वास को मजबूत करेगा।
कुल मिलाकर, विधेयक दिशात्मक रूप से मजबूत है यानी कम जोखिम वाले क्षेत्रों में सरल और जनहित के उच्च क्षेत्रों में अधिक प्रभावी है। अंतिम चरण के सुधारों को शामिल करने के साथ यह व्यवहार में अधिक स्पष्ट और व्यवसाय-अनुकूल निगमित ढांचा प्रदान कर सकता है।
(वरदचारी ईवाई इंडिया में पार्टनर एवं नैशनल लीडर (संस्था अनुपालन एवं संचालन) और मोदानी पार्टनर (संस्था अनुपालन एवं संचालन) हैं)