दुनिया के सबसे प्रभावशाली केंद्रीय बैंक यानी अमेरिका के फेडरल रिजर्व के प्रमुख केविन वॉर्श | फाइल फोटो
केविन वॉर्श ने दुनिया के सबसे प्रभावशाली केंद्रीय बैंक यानी अमेरिका के फेडरल रिजर्व की कमान पिछले सप्ताह संभाल ली है। इस वर्ष के शुरू में इसी स्तंभ में अमेरिकी फेडरल रिजर्व की स्वायत्तता से जुड़े मुद्दे पर चर्चा हुई थी। अब फेडरल रिजर्व के नेतृत्व में बदलाव के बाद उसकी स्वायत्तता से जुड़ा मसला और महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यह बात इसलिए और भी अहम है क्योंकि अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे अधिक कारोबार करने वाला वित्तीय बाजार है। साथ ही अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे अहम मुद्रा है। अमेरिकी बाजारों में व्यवस्था से जुड़ी छोटी नकारात्मक बात भी पूरी वैश्विक वित्तीय प्रणाली को अस्थिर कर सकती है।
फेडरल रिजर्व के पूर्व अध्यक्ष जेरोम पॉवेल राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के निशाने पर रहे हैं। ट्रंप के विचार में ब्याज दरें काफी कम करने की जरूरत है मगर पॉवेल एवं उनके सहयोगियों ने ठोस आर्थिक कारणों का हवाला देते हुए ऐसा नहीं किया।
पॉवेल पर जबानी हमले तो हुए ही, ट्रंप प्रशासन के न्याय विभाग उनके खिलाफ जांच भी शुरू कर दी, जिसे केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता पर सीधा हमला माना गया। न्याय विभाग को जांच बंद करनी पड़ी क्योंकि अमेरिकी संसद के कुछ सदस्यों ने साफ कर दिया था कि वॉर्श की नियुक्ति तभी हो पाएगी, जब पॉवेल के खिलाफ जांच बंद हो जाएगी। ट्रंप ने फेडरल रिजर्व के एक गवर्नर को बर्खास्त करने की कोशिश भी की। इन सबके बीच में नेतृत्व परिवर्तन हो रहा है।
वॉर्श अमेरिकी केंद्रीय बैंक के लिए नए नहीं हैं। वह 2006 में फेडरल रिजर्व सिस्टम के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सबसे युवा सदस्य बने। उन्होंने 2011 में इस्तीफा दे दिया मगर तब से बहुत कुछ बदल गया है।
कहा जाता है कि आठ साल पहले वह फेडरल रिजर्व के शीर्ष पद की दौड़ में पॉवेल से पिछड़ गए थे और कुछ टिप्पणीकार मानते हैं कि उसके बाद से उन्होंने इस पद के योग्य बनने के लिए अपना रुख बदला है। ट्रंप उनके फैसलों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं यह जल्द ही पता चल जाएगा। अप्रैल में अमेरिकी मुद्रास्फीति दर 3.8 प्रतिशत थी, जो 2 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से लगभग दोगुनी है। पश्चिम एशिया में लगातार अनिश्चितता के बीच मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहने की आशंका है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि फेडरल रिजर्व के नए अध्यक्ष इस स्थिति से कैसे निपटते हैं क्योंकि अमेरिका में मुद्रास्फीति लगभग पांच साल से निर्धारित लक्ष्य लक्ष्य से ऊपर ही रही है।
विभिन्न मुद्दों पर वॉर्श के रुख को बेहतर ढंग से समझने के लिए उनके भाषणों, लेखों और सीनेट बैंकिंग समिति के समक्ष उनके बयानों को छाना जा रहा है। ट्रंप द्वारा दबाव डाले जाने की बात पर उन्होंने सीनेट समिति से कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे कभी ब्याज दर के किसी फैसले पर राजी होने के लिए नहीं कहा और वह ऐसा करने के लिए राजी भी नहीं होते। उन्होंने यह भी कहा कि निर्वाचित अधिकारी ब्याज दरों पर अपने विचार व्यक्त करें तो मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता पर कोई असर नहीं पड़ता और फेडरल रिजर्व की स्वायत्ता फेड ही तय करेगा।
लेकिन उनका सामना किसी आम निर्वाचित अधिकारी से नहीं है। ट्रंप पारंपरिक आर्थिक सोच से अधिक वास्ता नहीं रखते। लिहाजा अपेक्षाकृत ऊंची मुद्रास्फीति वाले माहौल (जिसका कारण कुछ हद तक वह स्वयं हैं) में फेडरल रिजर्व के निर्णयों पर अमेरिकी राष्ट्रपति की प्रतिक्रिया दिलचस्प होगी।
वॉर्श कई साल से फेडरल रिजर्व के काम-काज पर टीका टिप्पणी करते रहे हैं मगर अमेरिकी समाचार पत्र द वॉल स्ट्रीट जर्नल में नवंबर 2025 में प्रकाशित उनका लेख उनके विचारों की झलक देता है। उन्होंने कहा था, ‘मुद्रास्फीति एक विकल्प है और अध्यक्ष जेरोम पॉवेल के नेतृत्व में फेडरल रिजर्व का इतिहास नासमझी भरे विकल्प चुनने का रहा है।’
उन्होंने तर्क दिया कि मुद्रास्फीति सरकार द्वारा अत्यधिक खर्च किए जाने और अत्यधिक नोट छापे जाने के कारण होती है। उन्होंने यह भी कहा था कि और फेडरल रिजर्व का बहीखाता काफी छोटा किया जा सकता है। वॉर्श ने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और नोबेल से सम्मानित मिल्टन फ्रीडमैन के मार्गदर्शन में अध्ययन किया था मगर इन विचारों को लागू करना शायद आसान नहीं होगा।
कोविड महामारी के बाद अमेरिका में मुद्रास्फीति कई कारणों से बढ़ी, जिनमें आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, ढीली राजकोषीय नीति और अत्यधिक मौद्रिक सहायता शामिल हैं। आज पलटकर देखें तो कहा जा सकता है कि नीतिगत हस्तक्षेप कम रखे जा सकते थे। पॉवेल के कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौतियों में एक थी मुद्रास्फीति दर नीचे लाना, जो 9 प्रतिशत से भी ऊपर चली गई थी। हालांकि फेडरल रिजर्व की प्रशंसा करनी होगी कि ब्याज दरें तेजी से दुरुस्त की गईं और मंदी का जोखिम लाए बगैर मुद्रास्फीति कम करने की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी थी। लेकिन ट्रंप के शुल्कों और ईरान युद्ध ने स्थिति जटिल बना दी।
अब ब्याज दरों में वृद्धि का माहौल है। हालांकि वॉर्श का तर्क है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) मुद्रास्फीति कम करेगी और उत्पादकता बढ़ाने वाली साबित होगी मगर फेडरल ओपन मार्केट कमेटी के अन्य सदस्य इस स्थिति को अधिक पारंपरिक नजरिये से देखेंगे। इसके अलावा फेडरल रिजर्व अपना बहीखाता छोटा कर रहा है किंतु उसमें कमी तेजी से आई तो ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और यह बात ट्रंप को बिल्कुल पसंद नहीं आएगी। मौजूदा हालात में इससे अस्थिरता और बढ़ जाएगी।
वॉर्श को बढ़ते सरकारी खर्च के बीच मौद्रिक नीति आगे बढ़ानी होगी। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान है कि अमेरिका में सामान्य सरकारी ऋण अभी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 125 प्रतिशत है और 2031 तक यह बढ़कर जीडीपी का 142 प्रतिशत हो जाएगा। बढ़ते ऋण और अधिक बजट घाटे से उधारी महंगी हो जाएगी। इससे फेडरल रिजर्व और सरकार के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वॉर्श इसे कैसे संभालते हैं इस पर सबकी नजरें टिकी होंगी।
वॉर्श फेडरल रिजर्व की ओर से संवाद भी कम करने के पक्ष में हैं। उनका तर्क है कि नीति निर्माता अपने ही शब्दों में बंध सकते हैं। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से केंद्रीय बैंक का संवाद महत्त्वपूर्ण साधन बन गया है और इसने वित्तीय बाजारों को बदलते हालात के हिसाब से ढलने में मदद की है। इससे अक्सर केंद्रीय बैंकों को नीतिगत हस्तक्षेप के बिना ही लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलती है। वॉर्श फेडरल रिजर्व के कामकाज में अहम सुधार करना चाहते हैं मगर उनकी असल चुनौती तो बाहरी दबाव से निपटने की होगी।