खबरों में कहा जा रहा है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और विदेश मंत्री इशाक डार अपने देश के सहयोगियों को एकजुट करने और ईरान तथा अमेरिका को स्थायी रूप से युद्ध विराम के लिए राजी करने के वास्ते लगातार टेलीफोन पर बातचीत कर रहे हैं। लेकिन इन वार्ताओं में असली ताकत निस्संदेह फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के हाथ में है।
मुनीर पाकिस्तान के इतिहास में केवल दूसरे फील्ड मार्शल हैं। लेकिन वह सिर्फ फील्ड मार्शल ही नहीं हैं, वह सेना प्रमुख (सीओएएस) और रक्षा बलों के प्रमुख (सीडीएफ) भी हैं। यह सब पिछले साल पारित पाकिस्तान के संविधान के 27वें संशोधन के जरिये किया गया। संशोधन किसी भी पांच सितारा सैन्य अधिकारी को अभियोजन से आजीवन छूट प्रदान करता है। यह रैंक वर्तमान में केवल मुनीर के पास है।
सीडीएफ को हटाने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है (निर्वाचित प्रधानमंत्री को हटाने के लिए केवल साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है)। यह रैंक मुनीर को वायु सेना और नौ सेना बलों से ऊपर रखता है। सीडीएफ के रूप में, वह सामरिक योजना प्रभाग पर पूर्ण कमान रखते हैं, जो पाकिस्तान के परमाणु भंडार का प्रबंधन करता है। वह साल 2022 से सेना प्रमुख का पद संभाल रहे हैं।
उनके पद में तब्दीली करते हुए सीडीएफ के रूप में उनका कार्यकाल पांच साल के लिए 2030 तक बढ़ा दिया गया है। पाकिस्तान में 2029 में आम चुनाव होंगे। यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि इसे पांच साल के लिए क्यों बढ़ाया गया है, चार या तीन साल के लिए क्यों नहीं।
इन सभी सावधानियों की क्या जरूरत थी? जरा उन परिस्थितियों पर गौर कीजिए जिनमें वह सेना प्रमुख बने। वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री इमरान खान ने मुनीर को इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के महानिदेशक के पद से हटाकर उनकी जगह फैज हमीद को नियुक्त कर दिया। मुनीर को क्वार्टर मास्टर जनरल (क्यूएमजी) बनाकर पदावनत कर दिया गया, जो किसी भी पाकिस्तानी (या किसी भारतीय के मामले में भी) सेना अधिकारी के लिए अपमानजनक पदावनति मानी जाती है।
मुनीर ने अपनी नौकरी इसलिए खोई क्योंकि उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को उनके घर में चल रहे भ्रष्टाचार के बारे में बताया था, जिसमें खान की पत्नी बुशरा बीबी को दोषारोपित किया गया। जब शहबाज शरीफ प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने हमीद को जेल भेज दिया, जो एक तीन सितारा अधिकारी के कोर्ट-मार्शल का एक दुर्लभ मामला था, और मुनीर को सेना के सर्वोच्च पद पर नियुक्त कर दिया।
मुनीर ने तेजी से कदम उठाए। उन्होंने अफगानिस्तान और तालिबान शासन पर एक निर्णायक नीति की रूपरेखा तैयार की, जो कथित तौर पर काबुल के संरक्षण में काम कर रहे तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की कार्रवाइयों से नाराज थे। उन्होंने मध्य एशिया, खाड़ी देशों और ईरान के संबंध में पाकिस्तान की नीति को फिर से परिभाषित किया।
उनके व्यक्तित्व में एक और खूबी है। वह हाफ़िज़ हैं, जिसका अर्थ है कि उन्होंने कुरान की हर आयत को याद कर रखा है। अपने करियर के शुरुआती दौर में रियाद में पाकिस्तान के डिफेंस अताशे के रूप में उन्होंने कई स्थायी संबंध बनाए और स्थानीय मीडिया को बताया कि उन्होंने अपना कार्यकाल समाप्त होने के बाद वहीं रुककर कुरान की अपनी समझ और स्मृति को ताजा करने का फैसला किया।
उनकी सैन्य कुशलता में इससे कितना इजाफा हुआ है, यह शायद हम कभी न जान पाएं। लेकिन इससे ‘इस्लामी कूटनीति’ का एक नया दौर शुरू हो गया है, जिससे पाकिस्तान खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) और इस्लामी सम्मेलन संगठन (ओआईसी) सहित इस्लामी दुनिया का स्वघोषित नेता बन गया है। पिछले साल, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच दशकों पुरानी अनौपचारिक समझ को एक रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते में बदल दिया गया।
इस समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया है: ‘एक के विरुद्ध आक्रमण दोनों के विरुद्ध आक्रमण माना जाएगा।’ इस प्रकार मुनीर ने सऊदी अरब को मजबूर कर दिया है कि अगर पाकिस्तान भारत पर हमला करता है, तो वह किसी एक पक्ष का साथ दे, ऐसा कुछ जो सऊदी अरब अब तक करने को तैयार नहीं था। यह एक अलग बात है कि सऊदी अरब खुद को कुछ ठगा हुआ सा महसूस कर रहा है। जब उसने ईरानी मिसाइल हमलों से खुद को बचाने के लिए पाकिस्तान से हवाई रक्षा प्रणाली मांगी, तो पाकिस्तान मदद करने को इच्छुक और सक्षम नहीं था।
सऊदी अरब वर्षों से यमन में विद्रोही हूतियों के खिलाफ अपने युद्ध में पाकिस्तान से सैनिक तैनात करने का अनुरोध कर रहा है। पाकिस्तान अब भी पहले की तरह ही टालमटोल कर रहा है।
वर्ष 2025 में पाकिस्तान ने गुलमर्ग में निहत्थे नागरिकों पर हमला किया। जवाबी कार्रवाई में भारत ने ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। उस दौरान पाकिस्तान को लगा कि मुनीर ने बहुत बढि़या काम किया और उन्हें फील्ड मार्शल बना दिया गया। लेकिन उन्हें इससे कहीं अधिक तवज्जो मिली। 15 वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि अमेरिका के राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस में बिना किसी सहायक के एक पाकिस्तानी सैन्य प्रमुख को दोपहर के भोज पर आमंत्रित किया।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के परमाणु हथियारों पर हमला करने का विचार इसी बैठक में आया था। बाद में मुनीर का एकमात्र काम रिवोल्यूशनरी गार्ड के साथ अपने संपर्कों के माध्यम से ईरान का मामला देखने का रह गया। तब से लेकर अब तक, अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कम से कम दस मौकों पर उनकी जमकर प्रशंसा की है, उन्हें ‘एक महान योद्धा’, ‘एक बहुत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति’ और ‘एक असाधारण इंसान’ बताया है।
कई वर्षों से भारत यह सुनिश्चित करने में कामयाब रहा है कि दुनिया के अधिकांश देश पाकिस्तान को आतंकवाद का प्रायोजक बताकर उसकी असली छवि उजागर करें। लेकिन अब तुर्किये की मदद से सोशल मीडिया पर एक सकारात्मक अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें पाकिस्तान को एक सौहार्दपूर्ण और शांतिप्रिय मध्यस्थ के रूप में पेश किया जा रहा है। यह सब मुनीर का काम है।
एक राजनयिक ने इसे सबसे सटीक ढंग से समझाया। उन्होंने कहा, ‘अस्थिर वैश्विक बाजार में, भारत कम जोखिम और कम रिटर्न की नीति अपना रहा है, जो एसआईपी रणनीति के समान है, यानी धीमा और स्थिर निवेश। वहीं पाकिस्तान उच्च जोखिम और उच्च रिटर्न की नीति का अनुसरण कर रहा है, जैसे कोई वेंचर कैपिटलिस्ट या हेज फंड मैनेजर। इसमें कोई संदेह नहीं कि उसका रिटर्न अच्छा है, लेकिन इसमें जोखिम भी बहुत अधिक है।’