प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
इस अप्रैल में निफ्टी का माइक्रोकैप सूचकांक 21.55 फीसदी ऊपर था, जितना ऊंचा वह 2022 में अपनी शुरुआत के बाद से कभी नहीं उछला था। सीएनएक्स 500 भी इसी महीने 10.5 फीसदी बढ़ा और पिछले पांच साल में यह पहला महीना है, जब यह 10 फीसदी से ज्यादा उठा है। मार्च में बाजार में गिरावट को त्योहारों की छूट जैसा मान लिया गया। खुदरा निवेशक सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) में हर महीने 28,000 करोड़ रुपये से ज्यादा डालते रहे।
दुनिया में 20 फीसदी तेल-गैस होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते गुजरता है और यह 2 मार्च से ही बंद है मगर पिछले दिनों कुछ अजीब दिखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से असाधारण अपील की और एक साल तक विदेश यात्रा से बचने और सोना न खरीदने का आग्रह किया। आम तौर पर सरकारें नागरिकों से छुट्टियां टालने या सोना नहीं खरीदने के लिए तब तक नहीं कहतीं जब तक भुगतान संतुलन, मुद्रा स्थिरता और विदेशी मुद्रा निकासी की गंभीर चिंता नहीं हो।
उसके बाद शुक्रवार को अमेरिका के 10 साल अवधि के सरकारी बॉन्ड की यील्ड 4.5 फीसदी के ऊपर चली गई। इस यील्ड से दुनिया भर में उधारी की लागत, परिसंपत्ति मूल्यांकन और पूंजी प्रवाह पर असर पड़ता है। 27 फरवरी यील्ड तेजी से गिरी थी और बाजार बंद होने पर 3.95 फीसदी थी। उस हफ्ते के अंत में पश्चिम एशिया में मिसाइलें दागी गईं और 2 मार्च को जब बाजार खुले तो यील्ड तेजी से बढ़ गई क्योंकि व्यापारियों ने मान लिया था कि तेल के दाम चढ़ेंगे, आपूर्ति श्रृंखला बिगड़ेंगी, महंगाई बढ़ेगी और ब्याज दर ऊंची रहेगी।
अप्रैल में आम तौर पर यील्ड हाशिये पर ही रही मगर जब यह पता चल गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की बहुचर्चित चीन यात्रा कूटनीतिक नाटक भर थी और होर्मुज स्ट्रेट अभी बंद ही रहेगी तो शुक्रवार को यील्ड चढकर 4.5 फीसदी के पार चली गई। इसका भारत पर क्या प्रभाव होगा? भारत के निवेशकों को अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ना किसी दूसरी दुनिया का बेमानी आंकड़ा लग सकता है, लेकिन जब यह तेजी से बदलता है तो दुनिया भर के वित्त पर असर डालता है।
हाल के महीनों में रुपया तेजी से कमजोर हुआ है और इसका डॉलर के मुकाबले 100 तक पहुंचने का खतरा बढ़ गया है, जो हौसले पर असर डाल सकता है। भारतीय मुद्रा की कीमत इस साल 6 फीसदी से ज्यादा गिर ही चुकी है और यह एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में शुमार हो चुकी है। इसकी वजह डॉलर की वैश्विक उछाल नहीं है। डॉलर सूचकांक 2022 की 114 की ऐतिहासिक ऊंचाई से अब भी काफी नीचे है। डॉलर में ज्यादा उछाल के बगैर ही रुपया गिरा जा रहा है। इससे पता चलता है कि इस पर दबाव भारत के भीतर से ही है।
कमज़ोर होती मुद्रा बुखार की तरह होती हैं, जो बताती हैं कि प्रणाली में कहीं कोई बीमारी है। ऊर्जा हमेशा से भारत की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। देश कच्चे तेल की 88-90 फीसदी जरूरत आयात से पूरी करता है और आयात पर उसके कुल खर्च का एक चौथाई हिस्सा तेल पर जाता है। वर्षों तक प्रचुर वैश्विक तरलता के कारण यह कमजोरी छिपी रही। जब तक वृहद आर्थिक स्थिति स्थिर रही तब तक निवेशक व्यापार घाटा नजरअंदाज करने को तैयार थे। लेकिन जैसे ही ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट बंद किया, पुरानी कमजोरी आश्चर्यजनक गति से सामने आ गईं।
इस साल की शुरुआत में 78 डॉलर प्रति बैरल के करीब चल रहा ब्रेंट क्रूड आपूर्ति रुकने के डर से कुछ समय के लिए 120 डॉलर पार कर गया और अब भी 100 डॉलर से ऊपर चल रहा है। भारत के लिए महंगा तेल पूरे तंत्र पर भारी पड़ता है। कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के चालू खाते के घाटे में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.3-0.4 फीसदी तक वृद्धि हो जाती है और महंगाई चौतरफा बढ़ती है। मैं पहले भी लिख चुका हूं ऊर्जा से उर्वरक महंगी होती हैं, जिनसे खाद्य कीमतें बढ़ती हैं। खाद्य कीमतें महंगाई को बढ़ाती हैं तथा महंगाई मुद्रा अवमूल्यन के माध्यम से ऊर्जा को और महंगा कर देती है। अब यही होता नजर आ रहा है।
अप्रैल में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति 8.30 फीसदी तक पहुंच गई, जो मार्च के 3.88 फीसदी से बहुत अधिक है। कई श्रेणियों में महंगाई दर दो अंक में बनी हुई है। अब सबकी नज़र खुदरा महंगाई दर पर है, जिस पर असर कुछ समय बाद होता है। यह 6 फीसदी के ऊपर गई और भारतीय रिजर्व बैंक की सहज सीमा के पार हुई तथा रुपया 100 के करीब पहुंचा तो नीति निर्माताओं को नकदी पर अंकुश लगाना होगा। भारत की वृद्धि की कहानी उपभोग, सार्वजनिक पूंजीगत व्यय और देसी तरलता के नाजुक संतुलन पर टिकी है। ऊंची ब्याज दरें तीनों को एक साथ खतरे में डालती हैं।
बॉन्ड बाजार इस तनाव को महसूस करने लगे हैं। भारत के 10 साल में परिपक्व होने वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड फिर 7.3 फीसदी से ऊपर चली गई है, जो महंगाई, पूंजी निकासी और सरकारी उधारी की बढ़ती जरूरतों पर चिंता को दर्शाती है। बॉन्ड बाजार अक्सर वह पहला ठिकाना होते हैं, जहां आर्थिक यथार्थ खुद को सामने लाते हैं। शेयर बाजार आम तौर पर बाद में प्रतिक्रिया देता है।
भारत के लिए दिक्कत यह है कि चेतावनी के सारे संकेत एक साथ दिखने लगे हैं: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 4.5 फीसदी से ऊपर है, तेल 100 डॉलर से ऊपर है, महंगाई 6 फीसदी से ऊपर है, बॉन्ड यील्ड 7 फीसदी से ऊपर है, विदेशी निकासी 2 लाख करोड़ डॉलर से अधिक है और रुपया 100 की ओर जा रहा है। ये समस्याएं एक-एक करके आएं तो संभाली जा सकती हैं मगर एक साथ आती हैं तो दबाव बहुत बढ़ जाता है। यदि आने वाले कुछ सप्ताहों में अमेरिका-ईरान गतिरोध का समाधान नहीं होता है तो भारतीय बाजारों को नए उभरते जोखिमों के हिसाब से ढलना होगा।
(लेखक मनीलाइफडॉटइन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं)