इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा
तमाम विशेषज्ञ और विश्लेषक पश्चिम एशिया की लड़ाई की तुलना कोविड महामारी से कर रहे हैं। सरकार ने भी संसद में कहा है कि इस संघर्ष के कारण उभरे चुनौतीपूर्ण वैश्विक हालात भारत पर गहरा असर डालेंगे। उन्होंने देश को इन हालात से निपटने के लिए तैयार रहने की जरूरत पर भी बल दिया है। ठीक वैसे ही जैसा कि महामारी के समय किया गया था।
इस संदर्भ में एक स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है। पश्चिम एशिया की लड़ाई दो महीने पहले पेश किए गए 2026-27 के केंद्रीय बजट पर क्या असर डालेगी? अतीत अक्सर भविष्य के संकेत समेटे रहता है। पीछे मुड़ें तो यह देखना उचित होगा कि कैसे कोविड महामारी ने एक फरवरी 2020 को प्रस्तुत 2020-21 के बजट के लिए प्रस्तुत समस्त आंकड़ों को ध्वस्त कर दिया था।
याद कीजिए कि कैसे बजट के दो दिन पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोविड-19 महामारी को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपदा घोषित की थी। 17 जनवरी के बाद से भारत सरकार ने भी कोविड के प्रभाव का आकलन करने का प्रयास शुरू कर दिया था। इनमें प्रवेश बिंदु और समुदाय स्तर पर निगरानी शुरू करने के कदम, क्वारंटीन सुविधाएं और आइसोलेशन वार्ड स्थापित करना, पर्याप्त व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना, प्रशिक्षित जनशक्ति और त्वरित प्रतिक्रिया टीमों की व्यवस्था करना शामिल था।
इसके बावजूद 2020-21 के लिखित बजट भाषण में महामारी की चुनौतियों का कोई जिक्र नहीं था। यकीनन बजट पेश किए जाने के बाद हर बीतते दिन के साथ कोविड के हालात बद से बदतर होते गए। सरकार ने 24 मार्च 2020 को देशव्यापी लॉकडाउन लगा दिया जिसे दो महीने बाद मई के अंत में हटाया गया। कर राहत की मांग भी बढ़ रही थी लेकिन सरकार ने और कोई बड़ी कर रियायत नहीं दी। केवल व्यवसायों को करों पर रिफंड शीघ्र सुनिश्चित करने और स्रोत पर कर कटौती तथा स्रोत पर कर संग्रह की दरों में 25 फीसदी की कमी करने के उपाय किए गए।
सरकार ने कई योजनाओं के लिए वित्तीय आवंटन भी बढ़ाया ताकि छोटे और मध्यम व्यवसायों को बढ़ी हुई क्रेडिट गारंटी और नकदी समर्थन मिल सके।
आर्थिक गतिविधियों पर कोविड महामारी का शुद्ध प्रभाव बहुत अधिक था। इसने सरकार के कर संग्रह पर भी गहरा असर डाला। छोटे और मझोले उपक्रमों के लिए नकदी समर्थन और ऋण गारंटी योजनाओं ने भी सरकार का व्यय बढ़ाया।
2020-21 में वास्तविक सकल कर राजस्व 20.27 लाख करोड़ रुपये रहा जो 24.23 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान से 16 फीसदी कम था। गैर कर राजस्व को 46 फीसदी की चोट पहुंची और वह 3.85 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान की तुलना में केवल 2.08 लाख करोड़ रुपये रहा। लेकिन 2020-21 में वास्तविक राजस्व व्यय 17 फीसदी बढ़कर लगभग 30.83 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
उर्वरक सब्सिडी 80 फीसदी बढ़ी और खाद्य सब्सिडी बजट अनुमान की तुलना में 370 फीसदी तक बढ़ गई। एकमात्र सकारात्मक पहलू यह था कि सरकार पूंजीगत व्यय की वृद्धि को बरकरार रखने में सफल रही। वास्तविक आंकड़े लगभग 4.26 लाख करोड़ रुपये के रहे, जबकि बजट अनुमान में यह लगभग 4.12 लाख करोड़ रुपये था।
स्वाभाविक रूप से, राजकोषीय घाटा बढ़कर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 9.2 फीसदी तक पहुंच गया, जो 2020-21 के बजट अनुमान में 3.5 फीसदी था। राजस्व घाटा भी बढ़कर जीडीपी का 7.3 फीसदी हो गया, जबकि बजट में यह 2.7 फीसदी अनुमानित था। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 2020-21 के बजट में भारत की नॉमिनल आर्थिक वृद्धि 10 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया था। लेकिन जैसे-जैसे वर्ष बीता और कोविड ने अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, भारत का नॉमिनल जीडीपी सिकुड़ महज 1.24 फीसदी रह गया।
छह साल बाद 2026-27 का बजट एक फरवरी 2026 को सदन में पेश किया गया। उसके महज चार सप्ताह के भीतर पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष छिड़ गया। ऐसे में सरकार के बजट आंकड़ों में क्या कुछ गलत हो सकता है? उद्योग जगत ने पहले ही सरकार से कहा है कि वह राहत और समर्थन पैकेज प्रदान करे ताकि आर्थिक गतिविधियों को युद्ध के विपरीत प्रभाव से बचाया जा सके। सुझावों में समयबद्ध संघर्ष-संबंधित आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (जैसी कोविड महामारी के दौरान शुरू की गई थी), ऊर्जा से जुड़े कच्चे माल पर कर और शुल्क संरचना को युक्तिसंगत बनाना, तथा केंद्र और राज्य सार्वजनिक क्षेत्र के अनुबंधों की आपूर्ति समयसीमा का विस्तार शामिल है।
सरकार ने तेल शोधन और विपणन कंपनियों को वित्तीय राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क पहले ही घटा दिया। कुछ अनुमानों के अनुसार, इससे वार्षिक आधार पर केंद्र का राजस्व नुकसान लगभग 1.3 से 1.7 लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न चुनौतियों की गंभीरता को स्वीकार किया है, लेकिन देश को यह भी याद दिलाया है कि सरकार के पास अपने पूंजीगत व्यय कार्यक्रम को बनाए रखने के लिए राजकोषीय गुंजाइश है, ब्याज दरों को कम करने का लचीलापन है और प्रभावित क्षेत्रों को लक्षित समर्थन देने के लिए संसाधन हैं।
इसका अर्थ है कि सरकार अपने घाटे में इजाफे के लिए तैयार हो रही है, क्योंकि वर्ष के दौरान उसके व्यय की प्रतिबद्धता काफी बढ़ जाएगी, जबकि राजस्व फरवरी के बजट में अनुमानित स्तर की तुलना में घट सकता है। इस प्रकार, यह वर्ष 2020-21 के कोविड वर्ष की पुनरावृत्ति जैसा हो सकता है, हालांकि 2026-27 में सार्वजनिक वित्त पर इसका प्रभाव उतना गंभीर नहीं होगा।
सरकार के पास अपनी सार्वजनिक नीति के संचालन को प्रबंधित करने के दो स्पष्ट तरीके हैं। पहला, उसे तुरंत उन क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए जहां उसके व्यय और राजस्व प्रभावित होंगे। 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी को 2025-26 के संशोधित अनुमान की तुलना में 8 फीसदी घटाकर लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये तक लाने का अनुमान था। लेकिन जिस तरह उर्वरक की कीमतें पहले ही बढ़ चुकी हैं, सरकार को वर्तमान वर्ष के लिए उर्वरक सब्सिडी का अनुमान ऊपर की ओर संशोधित करना चाहिए।
इसी तरह, उत्पाद शुल्क संग्रह, जो मुख्य रूप से पेट्रोल और डीजल से आता है, पेट्रोल और डीजल पर शुल्क कटौती के बाद बड़ी गिरावट का सामना कर सकता है। वित्त मंत्रालय के लिए यह अच्छा होगा कि वह इन घटनाक्रमों और उनके सरकारी वित्त पर प्रभाव का त्रैमासिक आधार पर आकलन करे और उसे सार्वजनिक करे। इससे देश की ऐसी संकटों के लिए तैयारी बेहतर होगी।
दूसरा, कोविड वर्ष की तरह, सरकार वर्तमान वर्ष को कुछ लंबे समय से लंबित विधायी सुधारों को लागू करने के अवसर के रूप में इस्तेमाल कर सकती है ताकि कारोबार करने में आसानी हो और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सके। इनमें भूमि अधिग्रहण कानून, कृषि सुधार कानून और माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में आगे के बदलाव शामिल हैं। वर्ष 2020-21 के कोविड वर्ष में मोदी सरकार ने श्रम और कृषि कानूनों में बदलाव किए थे, लेकिन ये समस्याओं में फंस गए।
अंततः पांच साल से अधिक की लंबी प्रतीक्षा के बाद ये अधिसूचित किए गए। किसानों के आंदोलन के कारण कृषि कानूनों में बदलाव वापस ले लिए गए। सितंबर 2025 में जीएसटी दरों को बड़े पैमाने पर युक्तिसंगत बनाया गया। परंतु और काम करने की आवश्यकता है, जैसे पेट्रोल और डीजल को जीएसटी प्रणाली में शामिल करना। कोविड वर्ष की अपर्याप्त परामर्श की गलतियों को दोहराया नहीं जाना चाहिए। किसानों के संगठनों और राज्यों के साथ तथा जीएसटी परिषद में अधिक चर्चा होनी चाहिए ताकि कृषि और जीएसटी कानूनों में आवश्यक बदलाव लाए जा सकें। यह संकट सुधारों को लागू करने का अवसर भी हो सकता है।