प्रतीकात्मक तस्वीर | फोटो: CPIM West Bengal
पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान बिना कोलकाता से बाहर निकले आप दीवारों पर लिखी इबारतें कैसे पढ़ सकते हैं? मेरे साथ आइए, लगभग 600 किलोमीटर उत्तर में, सिलिगुड़ी कॉरिडोर तक चलिए। यह 60 किलोमीटर की संकरी पट्टी बंगाल के मैदानी हिस्से को उसके हिमालयी और दुआर (द्वार) जिलों से जोड़ती है। यहां, हम नक्सलबाड़ी से शुरुआत करते हैं।
अगर कोई अब भी इन बातों का हिसाब रखता, तो हम इस सप्ताह 1967 में शुरू हुए सशस्त्र माओवादी विद्रोह की 59वीं वर्षगांठ देख रहे होते। यही कारण है कि दीवारों पर लिखी पहली इबारतें हम बेंगाईजोत गांव में पढ़ते हैं, जो नक्सलबाड़ी समूह का हिस्सा है, जहां माओवादी आंदोलन की पहली चिंगारी भड़की थी।
संयोगवश, या कहें कि इस रिपोर्टर का भाग्य, मैं इसी वर्षगांठ सप्ताह में यहां पहुंचा और देखा कि दो पुराने साथी उस खोई हुई क्रांति के स्मारक को नया रंग-रोगन दे रहे और जोरदार ‘झाड़ू-पोछा’ कर रहे थे। इस स्मारक पर मार्क्स, लेनिन, एंजेल्स, स्टालिन, माओ, चारु मजूमदार और सरोज दत्ता की मूर्तियां हैं। मैंने जानबूझकर एक का नाम अभी बाहर रखा है।
इनमें से पहले पांच इस क्रांति के वे देवता थे जिनकी पूजा की जाती थी। अंतिम दो क्रमशः इसके स्थानीय संस्थापक और उनके उत्तराधिकारी थे। और फिर वह नाम जिसे मैंने जानबूझकर बाहर रखा था। वह, माओ के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े मार्शल लिन पियाओ (बियाओ) थे। चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के प्रमुख, जिन्हें अक्सर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता था। तब तक, जब तक एक दिन (13 सितंबर, 1971) वह गुजर नहीं गए। उस दिन उनका विमान मंगोलिया के ऊपर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। इसे इतिहास में ‘लिन बियाओ घटना’ के रूप में जाना जाता है।
इस बारे में चीन ने आधिकारिक तौर पर यह कहा था कि वह असफल तख्तापलट, या वह तथाकथित ‘प्रोजेक्ट 571’ के बाद देश से भाग रहे थे। लिन को गद्दार घोषित किया गया और माओ की पत्नी जियांग क्विंग के साथ तख्तापलट की योजना बनाने का आरोप लगाया गया। दोनों को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के ‘हॉल ऑफ शेम’ में ‘प्रति क्रांतिकारी’ करार दिया गया। लेकिन नक्सलबाड़ी में नहीं। यहा बेंगाईजोत शायद दुनिया का इकलौता स्थान है जहां आप अब भी माओ और लिन को साथ-साथ पाएंगे।
और यह ‘इतिहास’ पुन्य सिंह राजबोंगशी को परेशान नहीं करता, जो अनुसूचित जाति के कॉमरेड हैं और नक्सलबाड़ी विद्रोह की 59वीं और लेनिन के जन्म की 156वीं (22 अप्रैल) वर्षगांठों के लिए स्मारक को संवार रहे थे। मैंने पूछा, ‘आप माओ के साथ लिन बियाओ को कैसे रख सकते हैं?’ राजबोंगशी ने कहा, ‘क्योंकि लिन बियाओ और चेयरमैन माओ, हमारे चेयरमैन, महान कॉमरेड थे।’
लेकिन क्या लिन ने माओ को धोखा नहीं दिया जिस पर माओ ने उन्हें मरवा दिया? मेरे यह पूछने पर राजबोंगशी दृढ़तापूर्वक कहते हैं, ‘नहीं वह मिथ्या प्रचार है। लिन के विरुद्ध लिऊ शाओकी ने षडयंत्र किया था।’ मैंने उन्हें याद नहीं दिलाया कि लिऊ की मौत तो इन सब के दो साल पहले ही हो चुकी थी। एक आस्थावान व्यक्ति से क्यों तर्क करना? इस बीच, कुछ ज्यादा ही ‘आध्यात्मिक’ मनोदशा में दूसरे बुजुर्ग कॉमरेड स्मारक की दीवार पर छपा हुआ
वॉलपेपर चिपका रहे थे, जिस पर बांग्ला में जो लिखा था उसका अर्थ यह था- ’मुक्ति वोट से नहीं हासिल होगी। मुक्ति केवल नक्सलबाड़ी के रास्ते से होने वाली क्रांति से हासिल होगी।’ इसके कुछ ही दिनों बाद नक्सलबाड़ी में 92 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। आज लोग केवल वोट से होने वाली क्रांति पर ही विश्वास करने लगे हैं।
अगर क्रांति का उभार नक्सलबाड़ी में हुआ तो यह वहीं दफन भी हुई। 2021 में यह सीट भारतीय जनता पार्टी ने जीती। उसके उम्मीदवार आनंदमय बर्मन ने करीब 71,000 मतों से जीत हासिल की और कुल मतों का 58 फीसदी हासिल किया।
इस चुनाव में वामपंथ कांग्रेस के साथ अंतिम स्थान के लिए होड़ कर रही है। आदिवासी इलाकों में माओवाद समाप्त हो चुका है। उधर दक्षिण में, केरलम में, वामपंथ दोहरी सत्ता-विरोधी लहर से जूझ रहा है। और यदि 4 मई को कोई अविश्वसनीय चौंकाने वाला परिणाम नहीं आता, तो हम अपने स्वतंत्र इतिहास में वामपंथ को निर्णायक रूप से हाशिए पर पहुंचते देखेंगे। सशस्त्र वामपंथ का अंत केवल समय की बात थी। मुख्यधारा के वामपंथ के हाशिये पर जाने के लिए कोई और जिम्मेदार नहीं है। उन्हें 2004 में 53 सीटों की ऊंचाई से केवल एक भावना ने नीचे गिरा दिया और वह था अमेरिका-विरोध।
उन्होंने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन से समर्थन वापस ले लिया और उसे गिराने की कोशिश की, यहां तक कि परमाणु समझौते पर भाजपा के साथ हाथ मिला लिया। तब से वे लगातार नीचे ही लुढ़कते गए हैं। केवल पिनाराई विजयन अपवाद हैं।
वामपंथियों से दशकों की असहमति के बावजूद मैंने उन्हें हमेशा सभ्य, खुले दिमाग वाला और अच्छे हास्यबोध वाला पाया है। लेकिन उनमें बदलाव ला पाना कठिन है। 1988 में मैं इस बात को लेकर जिज्ञासु रहता था कि चीन और रूस के वामपंथी बदल रहे हैं लेकिन कलकत्ता के नहीं। यह सवाल मुझे कलकत्ता ले गया। मुझे याद है मैं राज्य सचिव सरोज मुखर्जी के साथ बैठा था। जिनके सिर के ऊपर की तरफ लेनिन, स्टालिन, मार्क्स और अन्य वामपंथी नेताओं की तस्वीरें लगी थीं। मैंने उनसे पूछा कि तंग श्याओ फिंग और मिखाइल गोर्बाचेफ ने अपना वामपंथ बदला। भारत में यह बदलाव क्यों नहीं हो रहा है?
उन्होंने ऊपर टंगी तस्वीरों को बेहद प्रेरणा के साथ देखते हुए कहा, ‘क्योंकि मेरा वामपंथ तंग और गोर्बाचेफ के वामपंथ से अधिक पवित्र है।’ करीब दो दशक बाद उनके उत्तराधिकारियों में से एक बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भी बदलाव की कोशिश की। मैंने उनसे दो बार लंबी बातचीत की और पूछा कि उनका निजी और विदेशी पूंजी को आमंत्रण कैसे उनकी विचारधारा से मेल खाता है?
जवाब में उन्होंने कहा कि उनकी विचारधारा उनका विश्वास है लेकिन वह कोई क्रांतिकारी सरकार नहीं चला रहे हैं। उन्हें संविधान के अधीन काम करना होता है। यह बदलाव तो था लेकिन वैचारिक आधार इसके लिए तैयार नहीं था। उनके द्वारा नियोजित औद्योगिक टाउनशिप सिंगूर और नंदीग्राम को लेकर व्यापक विरोध हुआ। उसका नेतृत्व राजनीतिक विरोधियों ने ही नहीं उनके ही धुर वाम वैचारिक साथियों ने किया।
संभव है कि किसी तरह केरल में पिनाराई विजयन वापस जीत हाएं तो भी यह चुनाव एक मजबूत राजनीतिक शक्ति के नाटकीय अंत की घटना का साक्षी बनेगा। अगर आप देश के वामपंथ के लिए कोई स्मारक बना सकें तो उस पर कुछ यूं लिखा होगा: इसलिए क्योंकि मैंने सिद्धांत को कट्टरता और विचारधारा को रोड़ा बनने दिया।
पुनश्च: नक्सलबाड़ी अब ज्यादातर भुला दिया गया है, लेकिन सिलिगुड़ी सबके दिमाग में है। भाजपा ने ‘जनसांख्यिकीय बदलाव’ से जोड़ते हुए और अपनी ध्रुवीकरण रणनीति में सहजता से पिरोते हुए इसकी संवेदनशीलता को एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बना दिया है। भाजपा का तर्क कुछ अधिक संयमित ढंग से पूर्व विदेश सचिव और अब राज्य सभा सांसद हर्षवर्धन शृंगला रखते हैं। उन्होंने कहा, ‘क्षेत्र की संवेदनशीलता किसी भी आगे के जनसांख्यिकीय बदलाव को समस्या बना देती है।’ उनका कहना है कि घुसपैठ जारी है क्योंकि सीमा के कई संवेदनशील हिस्सों में अब भी बाड़ नहीं लगी है। यह मुख्यतः उत्तर दिनाजपुर को संदर्भित करता है जहां कॉरिडोर संकरा होना शुरू होता है।
बांग्लादेश के साथ पश्चिम बंगाल की 2216.17 किलोमीटर लंबी सीमा का अधिकांश हिस्सा बाड़ से घिरा है, लेकिन 569 किलोमीटर अब भी खुला है। इसमें कुछ हिस्सा नदी-आधारित है, लेकिन 456.224 किलोमीटर इलाके को बाड़ से घेरा जा सकता है। यह हिस्सा अब भी खुला है क्योंकि, वे कहते हैं, राज्य सरकार ने भूमि उपलब्ध नहीं कराई है।
यह कमजोरी ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनावी मुद्दा है और वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी भी चिंतित हैं। एक शीर्ष कमांडर कहते हैं, ‘बांग्लादेश या नेपाल हम पर आक्रमण नहीं करेंगे। और यदि चीनी हिमालय से नीचे आते हैं तो वे नष्ट हो जाएंगे।’ लेकिन फिर वे जोड़ते हैं, ‘लेकिन हमने देखा कि कैसे किसानों ने राजधानी को घेरे में लिया, यहां तक कि शाहीन बाग के विरोध ने भी।’
सीएए-विरोधी कार्यकर्ता शरजील इमाम का वह भाषण, जिसमें उन्होंने सिलिगुड़ी नेक को अवरुद्ध करने और असम को काटने को ‘हम मुसलमानों का कर्तव्य’ बताया, खासकर क्योंकि ‘सिलिगुड़ी में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं’, एक गहरी चोट छोड़ गया है। हालांकि, यह अब भी उसकी लंबी कैद को उचित नहीं ठहराता क्योंकि आप इस युवा को उसकी मूर्खता और आईआईटी शिक्षा पर कलंक लगाने के लिए अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रख सकते। लेकिन, इसने पश्चिम बंगाल में भाजपा की ध्रुवीकरण रणनीति को और हवा दी है।