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रुपये को संभालने के फायदे कम, नुकसान ज्यादा

विनिमय दर एक मूल्य है और किसी भी अन्य मूल्य की तरह इसे मांग और आपूर्ति में बदलाव के अनुसार समायोजित करना पड़ता है

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राजेश्वरी सेनगुप्ता   
Last Updated- May 04, 2026 | 10:30 PM IST

पिछले कुछ हफ्तों से सभी की नजरें रुपये पर टिकी हुई हैं। अमेरिकी मुद्रा डॉलर की तुलना में रुपये का लगातार फिसलना कौतूहल का विषय बनता जा रहा है। रुपये की चाल पर हो रही टीका-टिप्पणी में इसकी व्याख्या कमजोरी के संकेत के रूप में हो रही है। इसके साथ ही, रुपया संभालने के लिए केंद्रीय बैंकों द्वारा किए गए प्रयासों की अक्सर तारीफ भी हो रही है।

मगर यह दृष्टिकोण एक बुनियादी बात को नजरअंदाज करता है। यानी विनिमय दर एक मूल्य है और किसी भी अन्य मूल्य की तरह इसे मांग और आपूर्ति में बदलाव के अनुसार समायोजित करना पड़ता है। इसे कृत्रिम स्तर पर बनाए रखने की कोशिश करने से अंदरूनी असंतुलन दुरुस्त नहीं होता है। इससे बस संकट कुछ समय के लिए टल जाता है जिससे आगे होने वाली गिरावट और अधिक व्यवधान लेकर आती है।

इसे समझने के लिए एक जाने-पहचाने उदाहरण पर विचार करते हैं। जिस साल मॉनसून कमजोर होता है यानी कम बारिश होती है उसमें सब्जियों की आपूर्ति मांग से कम हो जाती है। इससे कीमतें बढ़ जाती हैं और फिर आगे की कवायद शुरू हो जाती है यानी लोग उपभोग कम कर देते हैं और किसानों को बाजार में यथासंभव अधिक से अधिक उपज लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इससे मांग और आपूर्ति में असंतुलन स्वयं दुरुस्त होने लगता है। अब जरा कल्पना कीजिए कि सरकार कीमतें बढ़ने से रोकने के लिए हस्तक्षेप करना शुरू कर देती है।

मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर खत्म नहीं होता और यह बना रहता है। इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार को बिक्री पर सीमा लगाने सहित अन्य प्रतिबंध लगाने पड़ते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि उपभोक्ताओं को कमी और सीमित पहुंच से जूझना पड़ता है जिससे हस्तक्षेप का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है। यही कारण है कि सरकारें आमतौर पर कीमतें नियंत्रित करने की बजाय उन्हें समायोजित होने देती हैं। यही तर्क विदेशी मुद्रा बाजार पर भी लागू होता है। जब डॉलर की मांग आपूर्ति से अधिक हो जाती है तो डॉलर की कीमत बढ़ जाती है (और रुपये की कीमत गिर जाती है)। फिलहाल जो हम देख रहे हैं वह बाजार का बुनियादी समायोजन है।

तो डॉलर की मांग आपूर्ति से अधिक तेजी से क्यों बढ़ रही है? इसके दो मुख्य कारण हैं। सबसे पहले तो भारत का चालू खाता घाटा 2025-26 में लगभग 40 अरब डॉलर था मगर इसे पूरा करने के लिए विदेशी पूंजी की आमद अपर्याप्त थी। यह असंतुलन इस बात को समझने में सहायक है कि पिछले वर्ष रुपया पहले से ही दबाव में क्यों था। दूसरा, पश्चिम एशिया में युद्ध ने स्थिति और खराब कर दी है। प्रमुख आयातित वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के कारण चालू खाता घाटा और बढ़ने की आशंका है (संभवतः इस वर्ष लगभग 80 अरब डॉलर तक)। भारत के सामने एक कठिन चुनौती है यानी उसे लगभग 80 अरब डॉलर की विदेशी पूंजी आकर्षित करने की आवश्यकता है, जबकि यह ऐसा समय है कि वैश्विक निवेशक जोखिम से बचने लगे हैं और उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित विकसित अर्थव्यवस्थाओं में झोंक रहे हैं।

ऐसी हालत में संतुलन बहाल करने का सबसे व्यावहारिक तरीका रुपये में गिरावट को जारी रहने देना है। अब सवाल उठता है कि आखिर इससे कैसे मदद मिलेगी? यह ठीक उसी तरह काम करेगा जैसे सब्जियों की ऊंची कीमतें संतुलन बहाल करती हैं (मांग कम कर और आपूर्ति प्रोत्साहित कर)। विनिमय दर दो प्रमुख माध्यमों से कार्य करती है। पहला, कमजोर रुपया व्यापार के माध्यम से संतुलन बहाल करने में मदद करता है। रुपये के अवमूल्यन से विदेशी खरीदारों के लिए भारतीय सामान सस्ते हो जाते हैं जिससे निर्यात बढ़ता है और अधिक डॉलर प्राप्त होते हैं।

साथ ही, आयात महंगा हो जाता है जिससे विदेशी सामानों की घरेलू मांग कम हो जाती है। ये दोनों प्रभाव मिलकर चालू खाता घाटे को कम करने में मदद करते हैं। दूसरा, कमजोर रुपये से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय वित्तीय परिसंपत्तियां सस्ती हो जाती हैं। डॉलर के लिहाज से भारतीय शेयर और बॉन्ड सस्ते हो जाते हैं जिससे वे अधिक आकर्षक बन सकते हैं। इससे भारतीय बाजारों में विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिल सकता है जिससे अधिक डॉलर आते हैं और चालू खाता घाटा कम करने में मदद मिलती है।

इसके उलट अगर नीति-निर्माता विनिमय दर कृत्रिम स्तर पर बनाए रखने का प्रयास करते हैं तो अंतर्निहित असंतुलन दूर नहीं होता बल्कि यह बना रहता है और समय के साथ और भी बढ़ सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि बाजार 80 अरब डॉलर की जरूरत से अवगत है। केंद्रीय बैंक हर समय डॉलर बेचकर इसकी भरपाई नहीं कर सकता क्योंकि अंततः उसके भंडार समाप्त हो जाएंगे। जब तक यह अंतर स्वतः खत्म बंद होने की उम्मीद नहीं हो तब तक रुपये का कुछ हद तक अवमूल्यन अपरिहार्य हो जाता है। इस स्थिति का सामना करते हुए कंपनियां और परिवार स्वाभाविक रूप से अपनी संपत्ति की सुरक्षा के तरीके तलाशेंगी जिसमें इसका कुछ हिस्सा विदेश में स्थानांतरित करना भी शामिल है।

एक और चिंता का विषय है। जब केंद्रीय बैंक विनिमय दर को नियंत्रित करने का प्रयास करता है तो निजी क्षेत्र का ध्यान बाजार से मिले रहे संकेतों से हटकर केंद्रीय बैंक के अगले कदम का अनुमान लगाने पर केंद्रित हो जाता है। यह अनिश्चितता स्वयं अस्थिरता का कारण बन सकती है। अगर मुद्रा को प्रतिबंधों के माध्यम से सहारा दिया जाता है (जैसे हाल ही में सोने और चांदी के आयात पर लगाए गए प्रतिबंध) तो यह निजी क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है और आगे के नियंत्रणों की आशंकाओं को बढ़ा सकता है।

ऐसी आशंकाएं एहतियाती व्यवहार को जन्म दे सकती हैं जिससे कंपनियां और लोग देश से धन बाहर निकालने लगते हैं जिससे रुपये पर दबाव और बढ़ जाता है। दूसरे शब्दों में केंद्रीय बैंक द्वारा रुपये को नियंत्रित करने के प्रयास लाभ से अधिक हानि पहुंचा सकते हैं। यानी केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप से विश्वास में कमी आएगी, अनिश्चितता बढ़ जाएगी और बाजार से मिलने वाले संकेत अस्पष्ट हो जाएंगे। इससे डॉलर की मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर बढ़ सकता है, निवेश की रफ्तार कमजोर पड़ सकती है और आर्थिक सुधार जटिल हो सकता है।

विनिमय दर समस्या नहीं है बल्कि समस्या वह तंत्र है जिसके माध्यम से इसका समाधान किया जाता है। इसे नियंत्रित करने से केवल समायोजन में देरी होती है और अंततः लागत बढ़ जाती है। इन परिस्थितियों में सबसे प्रभावी नीति सबसे सरल भी है यानी रुपये को स्वतंत्र रूप से चलने दें और उसे अर्थव्यवस्था के प्राथमिक झटकों से निपटने के माध्यम के रूप में अपना काम करने दें।


(लेखिका मुंबई स्थित आईजीआईडीआर में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : May 4, 2026 | 10:21 PM IST