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शहरी आय में तेज बढ़ोतरी, लेकिन शहरों के भीतर और बाहर बढ़ती असमानता ने बढ़ाई चिंता

शहरों ने कामगारों को जगह दी, औपचारिक रोजगार तैयार किए और ऐसा मध्य वर्ग तैयार किया जो खपत करता है तथा जो अब देश की अर्थव्यवस्था की तेजी के केंद्र में है

Published by
अमित कपूर   
Last Updated- May 05, 2026 | 10:34 PM IST

देश के शहरी इलाकों की आय की गाथा, पारंपरिक मानकों पर बहुत उल्लेखनीय है। वर्ष2017-18 और 2023-24 के बीच शहरी आय वितरण के हर स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में तेजी से बढ़ी। शहरों ने कामगारों को जगह दी, औपचारिक रोजगार तैयार किए और ऐसा मध्य वर्ग तैयार किया जो खपत करता है तथा जो अब देश की अर्थव्यवस्था की तेजी के केंद्र में है।

ये शानदार सफलताएं हैं लेकिन सवाल यह नहीं है कि शहर वृद्धि हासिल कर रहे हैं या नहीं बल्कि सवाल यह है कि शहर किस तरह की वृद्धि हासिल कर रहे हैं, यह वृद्धि किन लोगों तक पहुंच रही है और इस प्रक्रिया में क्या कुछ पीछे छूट रहा है? देश का शहरी बदलाव वास्तविक है और उसे मापा जा सकता है लेकिन इसका पूरा महत्त्व तभी उभरता है जब समेकित आंकड़ों पर करीबी से नजर डाली जाती है।

शहरी भारत के आय वितरण को ग्रामीण भारत से अलग दृष्टि से देखना आवश्यक है। शहरी आय सभी स्तरों पर उल्लेखनीय रूप से अधिक है, और यह दूरी लगातार बढ़ रही है। इंस्टीट्यूट फॉर कंपटीटिवनेस की 2025 की रिपोर्ट ‘इनकम, इनइक्वैलिटी ऐंड लेबर मार्केट्स इन इंडिया’ (आय, असमानता और भारत के श्रम बाजार) के अनुसार, 2023-24 में शीर्ष 10 फीसदी शहरी लोगों की आय सीमा 44,000 रुपये थी, जो ग्रामीण समकक्ष 21,500 रुपये से दोगुनी थी। शीर्ष 1 फीसदी शहरी लोगों की आय सीमा 90,000 रुपये थी, जो ग्रामीण समकक्ष से 80 फीसदी अधिक थी, जबकि 2017-18 में यह अंतर 68 फीसदी था।

निचले स्तर पर, शहरी न्यूनतम सीमा 6,000 रुपये थी, जो ग्रामीण समकक्ष 3,000 रुपये से दोगुनी थी। यह आंकड़ा सात वर्षों से नाममात्र रूप में स्थिर बना हुआ है। जहां शहरी न्यूनतम स्तर बढ़ रहा है, वहीं ग्रामीण न्यूनतम स्तर लगभग स्थिर रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि शहरी विकास गाथा को कम किया जाए, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि विकास का अगला अध्याय कहां पहुंचना चाहिए।

यह इस बात पर मत नहीं है कि शहरों ने क्या किया है, बल्कि इस बात का माप है कि लाभ कितनी दूर तक पहुंच सकते हैं। यह बात ध्यान देने लायक है कि शहरों के बीच भी आर्थिक असमानता पैदा हो रही है। शहर का निचला 50 फीसदी हिस्सा 2017-18 और 2023-24 के बीच करीब 7 फीसदी की चक्रीय वार्षिक वृद्धि दर से और निचला 10 फीसदी हिस्सा 5.93 फीसदी की दर से बढ़ा जबकि ग्रामीण इलाकों में यह वृद्धि शून्य रही।

फिर भी शहरों के भीतर लाभ असमान ही रहे। शीर्ष 1 फीसदी आय का माध्य से अनुपात उसी अवधि में 5.89 गुना से बढ़कर 6.25 गुना हो गया। राज्य स्तर पर, ग्रामीण-शहरी अंतर सबसे अधिक हिमाचल प्रदेश, बिहार, गोवा और मेघालय में बढ़ा, विशेषकर उच्च आय समूहों में। भारत के अधिकांश हिस्सों में, शहर आय वितरण के हर स्तर पर वृद्धि को पकड़ रहे हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्र क्रमशः पीछे छूटते जा रहे हैं। ऐसे में यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है: क्या निर्धारित करता है कि किसी शहर की वृद्धि उसके निवासियों तक व्यापक रूप से पहुंचे या कुछ ही लोगों में सिमट जाए?

शहरी अर्थशास्त्रियों ने लंबे समय से यह नोट किया है कि सार्वजनिक अधोसंरचना यह तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है कि वृद्धि व्यापक रूप से साझा हो या नहीं, और जब यह असमान होती है, तो श्रम बाजार तक पहुंच भी असमान होती है। भारत के नगर निकाय बजट पिछले दशक में काफी बढ़े हैं, फिर भी खर्च में अक्सर मेट्रो लाइनों और स्मार्ट सिटी पहलों जैसे दिखने वाले, हाई प्रोफाइल परियोजनाओं को प्राथमिकता दी जाती है, बजाय उन शांत कार्यों के जिन पर निवासी रोजाना निर्भर करते हैं। उदाहरण के लिए जल आपूर्ति, सीवेज, सार्वजनिक परिवहन, मोहल्ले की सड़कें। नगर निकाय प्रणालियां जो देने के लिए डिजाइन की गई हैं और जो वास्तव में प्रदान करती हैं, जहां उनके बीच का अंतर बढ़ता है, वहां अक्सर अनौपचारिक व्यवस्थाएं उस खाई को भरती हैं।

ये व्यवस्थाएं कम समय के लिए तो लोगों की जरूरतें ठीक से पूरी कर देती हैं, लेकिन ज्यादा न्यायसंगत समाधानों के लिए गुंजाइश छोड़ देती हैं। इस खाई को दूर करना जितना चुनौती है उतना ही अवसर भी है, और बढ़ते बजट वाले शहर इस दिशा में कदम उठाने के लिए अच्छी स्थिति में हैं। जीवन स्तर को प्रभावित करने वाली अधोसंरचनात्मक कमियां शहरी बेरोजगारी की समस्या से और अधिक गहरी हो जाती हैं।

आवधिक श्रम शक्ति सर्वे (पीएलएफएस) के मार्च 2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार शहरी बेरोजगारी 6.8 फीसदी रही, जो ग्रामीण बेरोजगारी से काफी अधिक है। जो शहर जो काम करने वालों को अधिक वेतन देता है, वही काम पाने के लिए अधिक अनिश्चित रास्ता भी प्रस्तुत करता है, जो इस ओर संकेत करता है कि श्रम बाजार में औपचारिक स्तर में प्रवेश कई लोगों के लिए अब भी एक आकांक्षा है। इस समस्या का समाधान करना उन सबसे महत्त्वपूर्ण कार्यों में से एक है जो शहर विकास को अधिक समावेशी बनाने के लिए कर सकते हैं।

महिलाओं को इस चुनौती के एक विशेष रूप का सामना करना पड़ता है।  मार्च 2026 में शहरी महिला बेरोजगारी 9 फीसदी रही, जबकि शहरी पुरुषों के लिए यह 6.1 फीसदी थी। यह अंतर संरचनात्मक बाधाओं की ओर उतना ही इशारा करता है जितना कि नौकरियों की समग्र उपलब्धता की ओर। पीएलएफएस वार्षिक रिपोर्ट 2025 के अनुसार, शहरी महिला श्रम बल भागीदारी केवल 27.7 फीसदी थी, जबकि शहरी पुरुषों के लिए यह 76.2 फीसदी थी। यह दूरी सामाजिक और संरचनात्मक दोनों प्रकार की बाधाओं की ओर संकेत करती है, जो महिलाओं की शहरी अर्थव्यवस्था में भागीदारी को आकार देती हैं। जो तस्वीर उभरती है वह एक प्रभावशाली बदलाव से गुजरते शहर की है, जिसमें अभी भी महत्त्वपूर्ण कार्य शेष हैं।

शहरी आय वृद्धि ने लाखों लोगों को ऊपर उठाया है और यह दिखाया है कि भारत बड़े पैमाने और तेजी से संकेतकों को बदलने की क्षमता रखता है। इन लाभों को कौन साझा कर रहा है, किस गति से और किस प्रकार के काम के माध्यम से? इस तरह के सवाल उठाना, इस उपलब्धि की आलोचना नहीं हैं, बल्कि उसका विस्तार है। इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि लाभ ग्रामीण निम्न स्तर तक पहुंचें और शहरों के भीतर वे हाशिये पर खड़े लोगों तक भी पहुंचें। भारत के पास कार्रवाई करने की क्षमता और गति है। प्रश्न यह है कि क्या इस अवसर का उपयोग साझा शहरी समृद्धि बनाने के लिए किया जाएगा।


(लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कंपटीटिवनेस के अध्यक्ष हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

First Published : May 5, 2026 | 10:07 PM IST