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बाजार में गिरावट का मौजूदा दौर कितना खतरनाक?

बाजार में जब भी भारी गिरावट आती है तो निवेशकों को यह समझने की जरूरत होती है कि बाजार अस्थायी गिरावट के दौर से गुजर रहा है या यह गहरी मंदी की गिरफ्त में आ चुका है?

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देवाशिष बसु   
Last Updated- April 17, 2026 | 9:37 PM IST

बाजार में गिरावट के दौर दो तरह के होते है। एक दौर वह होता है जिसमें शुरुआत में तेज गिरावट आती है मगर बाद में बिकवाली की रफ्तार कुंद पड़ने लगती है। चार से पांच महीनों में सब कुछ ठीक हो जाता है। लगभग एक दशक से भारत और शेष दुनिया के बाजार इसी तरह की गिरावट के अभ्यस्त रहे हैं। गिरावट का दूसरा दौर वह होता है जिसमें गिरावट कई चरणों में आती है और महीनों और यहां तक कि वर्षों की अवधि में बाजार एक नए निचले स्तर तक फिसल जाता है।

इस दौरान बाजार में उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। कुछ कारक बाजार को ताकत देते हैं तो अगले पल अचानक आने वाले झटके बाजार की उम्मीदों पर पानी फेर जाते हैं। बाजार में जब भी भारी गिरावट आती है तो निवेशकों को यह समझने की जरूरत होती है कि बाजार अस्थायी गिरावट के दौर से गुजर रहा है या यह गहरी मंदी की गिरफ्त में आ चुका है?

इसका उत्तर इस बात के आकलन से मिलता है कि किसी एक कारण से किस हद तक बाजार हिचकोले खा रहा है। अगर ऐसा है (जैसे डॉनल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए शुल्क) तो कुछ समय तक गिरावट रहेगी और फिर सब ठीक हो जाएगा। मगर गिरावट के कारण एक से अधिक हैं और बाजार एक दुष्चक्र में फंसा है (जैसा 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट में हुआ था जिसने कई संस्थानों और देशों को प्रभावित किया था) तो यह मंदी का लंबा दौर होगा।

मौजूदा खाड़ी युद्ध शायद दूसरी श्रेणी में आता है। ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच चल रहे इस युद्ध ने पहले ही शुरुआती नतीजे दे दिए हैं। तेल की कीमतों में उछाल आई है, शेयर बाजारों में गिरावट आई है (मार्च में वैश्विक वित्तीय संकट के बाद दूसरी सबसे बड़ी मासिक गिरावट देखी गई, सबसे बड़ी गिरावट मार्च 2020 में कोविड संकट के कारण हुई थी)। क्या ये झटके कुछ ही समय तक महसूस किए जाएंगे?

जरा विचार करें कि इस तरह की घटनाएं कैसे घटित होती हैं। एक नकारात्मक झटका (वित्तीय, भू-राजनीतिक या अन्य) जोखिम के पुनर्मूल्यांकन के लिए विवश कर देता है। कीमतें तेजी से गिरती हैं मगर बाजार भविष्य की तरफ देखने लगता है। वह वर्तमान संकट पर उतना ध्यान नहीं देता जितना कि भविष्य में राहत की उम्मीदों की जमकर सवारी करता है। स्थिरता का कोई भी संकेत मसलन केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप, राजनयिक स्तर पर पहल या तनाव में कमी या इस पर विराम बाजार में उछाल का कारण बन सकता है।

शॉर्ट-सेलर अपनी पोजीशन कवर करते हैं, सस्ते में शेयर खरीदने वाले लौट आते हैं। कीमतें बढ़ती हैं और कभी-कभी बहुत तेजी से। इस चरण में मीडिया विशेषज्ञों के हवाले से यह कहना शुरू कर देता है कि ‘सबसे खराब दौर बीत चुका है।’ हालांकि, फिर नकारात्मक खबरों की एक नई लहर आती है। ये खबरें निवेशकों को चौंकाती हैं और जिससे वे नकारात्मक परिणामों की तरफ देखने लगते हैं। इससे पहले से ही कमजोर विश्वास फिर टूट जाता है। कीमतें गिरकर नए निचले स्तर पर पहुंच जाती हैं। बाजार यह चक्र दोहराता रहता है।

वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान यह उतार-चढ़ाव साफ दिखाई दिया। साल 2008 की पहली तिमाही में बाजार बुरी तरह गिरे मगर नीतिगत समर्थन के दम पर अप्रैल में उनमें तेजी आई। बेयर स्टर्न्स को संकट से बचाने की मुहिम इस बात का सबूत माना गया कि सबसे खराब वक्त बीत चुका है। मगर ऐसा नहीं था। बैंकिंग प्रणाली में नुकसान लगातार बढ़ता रहा। इसी समय, कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ीं और जुलाई की शुरुआत में 147 डॉलर के उच्च स्तर पर पहुंच गईं जिससे शेयर बाजारों पर फिर से दबाव पड़ा।

इसके बाद सितंबर में लीमन ब्रदर्स दिवालिया हो गया। अक्टूबर तक बड़े पैमाने पर घबराहट भरी बिकवाली शुरू हो गई थी और मार्च 2009 में यह अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई। उस समय हर तेजी एक निर्णायक मोड़ जैसी नजर आई। मगर हर तेजी भ्रामक साबित हुई। यहां तक कि जुलाई 2008 में तेल की कीमतों में गिरावट के बाद निफ्टी में 7 फीसदी की वृद्धि हुई थी।

इस इतिहास की प्रासंगिकता विवरणों से अधिक इसके प्रारूप में निहित है। लंबे समय तक चलने वाली मंदी में बाजार स्थिर नहीं होते। कीमतें बढ़ती और घटती रहती हैं क्योंकि निवेशक इस बात पर बहस करते हैं कि क्या सबसे खराब दौर खत्म हो गया है। अनिश्चितता जितनी लंबी चलती है, ये उतार-चढ़ाव उतने ही अधिक स्पष्ट हो जाते हैं। मौजूदा संघर्ष में सबसे तात्कालिक माध्यम तेल है।

होर्मुज स्ट्रेट बंद रहने से वैश्विक ऊर्जा प्रवाह में खलल आ रही है, आंशिक व्यवधान ने भी कच्चे तेल की कीमतों को बढ़ा दिया है। शुरुआत में बाजार इस तरह के उछाल को अस्थायी मानता है। आखिरकार, ऊर्जा संकट अक्सर जितनी जल्दी आता है उतनी ही जल्दी खत्म भी हो जाता है। मगर कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो वे व्यापक आर्थिक परिदृश्य में बदलाव लाना शुरू कर देती हैं।

ऊर्जा असल में परिवहन, उर्वरकों, विनिर्माण और अंततः भोजन को प्रभावित करती है। जो बात एक जिंस संकट के रूप में शुरू होती है वह मुद्रास्फीति से जुड़ी एक व्यापक समस्या बन जाती है। केंद्रीय बैंकों (जो पहले से ही बढ़ते मूल्य दबावों को लेकर सतर्क हैं) के पास सीमित विकल्प रह गए हैं। नरम मौद्रिक नीति से मुद्रास्फीति बढ़ने का खतरा है, सख्त नीति से वृद्धि रुकने का खतरा है।

यह पहला तरीका है जिससे चीजें बिगड़ सकती हैं और झटका लंबे समय तक बना रह सकता है। मुद्रास्फीति उम्मीद से ऊंचे स्तर पर पहुंच सकती है जिससे ब्याज दरों का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है। बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती है। अगर ऐसा होता है तो शेयर मूल्यांकन भी उसी अनुपात में कम हो जाएगा। जिन बाजारों को राहत की उम्मीद थी उन्हें अब संयम के साथ ढलना होगा।

दूसरा जोखिम यह है कि व्यवधान आपूर्ति श्रृंखलाओं में फैल सकता है। आधुनिक उत्पादन प्रणालियां कुशल हैं मगर नाजुक हैं। ऊर्जा की कमी, परिवहन में देरी और कच्चे माल की कमी शायद ही कभी एक क्षेत्र तक सीमित रहती है। कंपनियां रक्षात्मक प्रतिक्रिया देती हैं यानी वे भंडार जमा करती हैं, निवेश में देरी करती हैं और नकदी बचाती हैं। जो बखेड़ा आपूर्ति समस्या के रूप में शुरू होता है वह विश्वास की कमी में बदल जाता है। आर्थिक वृद्धि दर धीमी हो जाती है अचानक नहीं बल्कि निरंतर गति से। तीसरा पहलू वित्तीय है। बड़े ऊर्जा आयातकों के लिए तेल की ऊंची कीमतें बाहरी संतुलन पर दबाव डालती हैं और मुद्राओं को कमजोर करती हैं। पूंजी प्रवाह अधिक अस्थिर हो जाता है।

जोखिम प्रीमियम बढ़ जाते हैं। ऐसे माहौल में मामूली झटके भी बड़े प्रभाव डाल सकते हैं क्योंकि बाजार कम तरलता और अधिक अनिश्चितता के दौर में स्वयं को समायोजित करते हैं। अच्छी बात यह है कि इस बार भी हमारी समस्याओं का स्रोत केवल एक ही है और वह है अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान से छेड़ा गया एकतरफा युद्ध। अमेरिका इसे जल्द से जल्द समाप्त कर सकता है।

एक बार ऐसा हो जाने पर आपूर्ति व्यवस्था संभलनी शुरू हो सकती है और नीति निर्माता भी झटके कम करने के लिए काम करना शुरू कर देंगे। निवेशक फिलहाल इसी परिदृश्य को ध्यान में रखकर काम कर रहे हैं। अगर अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट को बलपूर्वक खोलना चाहता है तो संभवतः बाजार में गिरावट का दूसरा दौर सामने आएगा जिसका कारण एक जटिल और लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष होगा।


(लेखक मनीलाइफ डॉट इन के सह-संस्थापक और मनीलाइफ फाउंडेशन के न्यासी हैं)

First Published : April 17, 2026 | 9:34 PM IST