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भारत को रूसी तेल की जरूरत क्यों है? ऊर्जा सुरक्षा ने अमेरिकी दबाव को पीछे रखा

देश में कच्चे तेल और परिशोधित ईंधन का करीब 30 दिन का भंडार है ऐसे में भारत इन झटकों से बहुत अधिक सुरक्षित नहीं है

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अजय श्रीवास्तव   
Last Updated- March 16, 2026 | 10:01 PM IST

देश की तेल सुरक्षा बहुत तेजी से कमजोर पड़ रही है। देश के कच्चे तेल आयात का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा पश्चिम एशिया और रूस से आता है। ये दोनों ही क्षेत्र इस समय भूराजनीतिक तनाव के शिकार हैं। इस माहौल में रूसी तेल की पूर्ण खरीद शुरू होना केवल वैकल्पिक चयन नहीं बल्कि आवश्यकता हो सकती है।

इसकी आठ वजहें इस प्रकार हैं: पहला, पश्चिम एशिया भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा आपूर्ति स्तंभ है। वहां हालात बहुत बिगड़े हुए हैं। युद्ध समूचे खाड़ी क्षेत्र में फैल रहा है। इस बीच होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों का गुजरना बाधित हो रहा है। वहीं सऊदी अरामको तथा अन्य द्वारा संचालित तेल संयंत्रों पर हमलों ने भी उत्पादन और आपूर्ति में बाधा का खतरा पैदा किया है। भारत इस क्षेत्र पर बहुत अधिक निर्भर है। वर्ष 2025 में करीब 48.7 फीसदी कच्चे तेल का आयात, 68.4 फीसदी एलएनजी आयात और करीब 91 फीसदी एलपीजी आयात पश्चिम एशिया से किया गया। देश में कच्चे तेल और परिशोधित ईंधन का करीब 30 दिन का भंडार है ऐसे में भारत इन झटकों से बहुत अधिक सुरक्षित नहीं है।

दूसरा, आपूर्ति के बाधित होने के आर्थिक परिणाम बहुत गंभीर हो सकते हैं। खासकर यह देखते हुए कि भारत 90 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। तेल की कीमतें पहले ही 23.6 फीसदी बढ़ चुकी हैं। युद्ध शुरू होने से एक दिन पहले यानी 28 फरवरी को लगभग 72 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर अब 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। यदि व्यवधान जारी रहता है और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं तो भारत का चालू खाता घाटा और बिगड़ेगा, रुपया 94 प्रति डॉलर से भी कमजोर होगा, और पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ेगी।

तीसरी बात, भारत की ऊर्जा सुरक्षा अमेरिका द्वारा दी गई अल्पावधि की इजाजत पर निर्भर नहीं रह सकती है। 5 मार्च को अमेरिका ने भारत को एक महीने की रियायत दी ताकि वह उस रूसी तेल कार्गो से तेल खरीद सके जो पहले ही समुद्र में खड़े हैं। इस तेल की मात्रा बहुत कम है और इससे कोई खास राहत नहीं मिलने वाली। भारत अमेरिकी सरकार द्वारा जारी की गई अल्पकालिक मंजूरी से वास्तविक राहत नहीं हासिल कर सकता। भारत और रूस दोनों संप्रभु देश हैं और उनके द्विपक्षीय ऊर्जा व्यापार से अमेरिका कोई लेनादेना नहीं होना चाहिए। अमेरिका के ऐसे प्रयास स्वीकार्य नहीं हैं।

चौथा, भारत के वैकल्पिक आपूर्ति विकल्प सीमित हैं। अमेरिका से होने वाला आयात 2025 में 82 फीसदी बढ़कर 9.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन अमेरिका स्वयं शुद्ध कच्चे तेल का घाटा रखता है और उसके पास अतिरिक्त निर्यात क्षमता सीमित है। पश्चिम अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का कच्चा तेल आंशिक रूप से कमी को पूरा कर सकता है, लेकिन उसका मालभाड़ा अधिक है और ढुलाई में वक्त भी अधिक लगेगा। ये बाधाएं भारत के लिए अपने पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं से बड़े पैमाने पर आयात को बदलना यानी उसमें विविधता लाना कठिन बना देती हैं।

पांचवां, रूस पहले ही भारत के लिए एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता साबित हो चुका है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। वित्त वर्ष 2025 में, भारत के कच्चे तेल आयात में लगभग 35 फीसदी हिस्सेदारी रूस की रही, जिसकी कीमत लगभग 50 अरब डॉलर थी। आपूर्ति स्थिर रही, लेकिन भारत ने अमेरिकी दबाव में धीरे-धीरे खरीद कम कर दी। रियायती रूसी तेल ने भारत को वैश्विक मूल्य वृद्धि से बचाने में मदद की और देश का आयात बिल कम किया।

छठा, भारत के रूसी तेल खरीदने को लेकर दबाव की जो विधिक व्यवस्था बनाई गई थी उसका पतन हो गया है। अगस्त 2025 में, अमेरिका ने रूसी कच्चे तेल की खरीद पर भारत को दंडित करने के लिए भारतीय निर्यात पर 25 फीसदी शुल्क लगाया। लेकिन यह नीति जल्दी ही विफल हो गई। 6 फरवरी को, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें भारतीय प्रधानमंत्री से रूसी आयात कम करने का आश्वासन मिला, जिसके बाद अमेरिका ने यह शुल्क वापस ले लिया। सिर्फ दो सप्ताह बाद, 20 फरवरी को, अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियां अधिनियम (आईईईपीए) के तहत उन शुल्कों के कानूनी आधार को खारिज कर दिया, जिससे इस तरह के व्यापारिक दबाव डालने के लिए इस्तेमाल किया गया कानूनी ढांचा प्रभावी रूप से ध्वस्त हो गया।

सातवां, अब अमेरिका के पास भारत पर रूसी तेल को लेकर नए व्यापारिक प्रतिबंध लगाने के लिए सीमित कानूनी साधन हैं। अदालत के फैसले के कुछ ही घंटों के भीतर, अमेरिका ने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 के तहत समान रूप से सभी देशों पर 10 फीसदी शुल्क लगाया, लेकिन यह उपाय भारत को विशेष रूप से रूसी तेल खरीदने के लिए निशाना नहीं बना सकता। अन्य अमेरिकी व्यापारिक कानून भी बहुत कम गुंजाइश देते हैं।

1962 के व्यापार विस्तार अधिनियम की धारा 232 राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर शुल्क लगाने की अनुमति देती है, लेकिन यह भी सभी देशों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 301 अनुचित व्यापारिक प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देती है जो अमेरिकी वाणिज्य को नुकसान पहुंचाती हैं, लेकिन यह केवल इसलिए दंड लगाने की अनुमति नहीं देती कि कोई देश तीसरे देश से तेल आयात करता है। व्यावहारिक रूप से, वे कानूनी और आर्थिक बाधाएं जो पहले भारत को रूसी तेल खरीदने से हतोत्साहित करती थीं, अब लगभग समाप्त हो चुकी हैं।

आठवां, अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं जैसे यूरोप पहले ही ऊर्जा वास्तविकताओं के जवाब में अपनी नीतियों को समायोजित कर रहे हैं। रूसी ऊर्जा पर व्यापक प्रतिबंध लगाने में अमेरिका का अनुसरण करने के बाद, यूरोपीय संघ अब कम गैस भंडारण स्तर, सीमित एलएनजी क्षमता और पश्चिम एशियाई आपूर्ति मार्गों में व्यवधान का सामना कर रहा है।

परिणामस्वरूप, यूरोपीय संघ यूक्रेन से आग्रह कर रहा है कि वह रूसी तेल को फिर से अपने क्षेत्र से पारगमन की अनुमति दे। यह संकेत है कि ऊर्जा सुरक्षा अब उन प्रतिबंधों के ढांचे पर हावी होने लगी है जिनका यूरोप ने कभी समर्थन किया था। इसके निष्कर्ष एकदम स्पष्ट हैं। भारत को रूसी तेल आयात को पहले वाले स्तर पर ले जाना चाहिए और इसके साथ ही उसे दीर्घकाल के लिए अपनी आपूर्ति में विविधता लानी चाहिए। एक उतार-चढ़ाव वाले विश्व बाजार में ऊर्जा सुरक्षा को अमेरिकी दबाव से प्रभावित नहीं होना चाहिए।


(लेखक जीटीआरआई के संस्थापक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

First Published : March 16, 2026 | 9:54 PM IST