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नीति आयोग ने चुपके से बदली परिवहन रिपोर्ट, वाहन कंपनियों के विरोध के बाद EV पर रुख हुआ और साफ

संशोधित रिपोर्ट में नीति आयोग ने बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (बीईवी) के विनिर्माण के दौरान उत्पन्न उत्सर्जन की भरपाई के लिए उसे जितनी दूरी तक चलाया जाना आवश्यक है, उसे कम कर दिया है

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दीपक पटेल   
Last Updated- March 23, 2026 | 10:07 PM IST

नीति आयोग ने परिवहन क्षेत्र के संबंध में 10 फरवरी वाली अपनी रिपोर्ट में चुपके से संशोधन किया है और बिना किसी औपचारिक घोषणा के इसका संशोधित संस्करण अपनी वेबसाइट पर अपलोड किया है। यह कदम तब उठाया गया, जब प्रमुख वाहन कंपनियों ने रिपोर्ट की कई मान्यताओं और परिभाषाओं पर आपत्तियां उठाई थीं। बिज़नेस स्टैंडर्ड को मिली जानकारी में यह पता चला है।

संशोधित रिपोर्ट में नीति आयोग ने बैटरी इलेक्ट्रिक वाहन (बीईवी) के विनिर्माण के दौरान उत्पन्न उत्सर्जन की भरपाई के लिए उसे जितनी दूरी तक चलाया जाना आवश्यक है, उसे कम कर दिया है। साथ ही ‘शून्य उत्सर्जन वाहन’ (जेडईवी) की स्पष्ट परिभाषा पेश की है, जो केवल निकासी उत्सर्जन के बजाय उनके पूरे जीवनचक्र के उत्सर्जन पर आधारित है। कुछ सप्ताह पहले अपलोड इस संशोधित रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बीईवी ‘इलेक्ट्रिफाइड वाहनों (एक्सईवी) के बीच प्रमुख तकनीक होगी। यह ऐसी श्रेणी है जिसमें बीईवी, स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड और प्लग-इन हाइब्रिड वाहन शामिल हैं।

मार्च की शुरुआत में टाटा मोटर्स, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा और जेएसडब्ल्यू एमजी मोटर इंडिया जैसी कंपनियों ने मूल रिपोर्ट का विरोध किया था, जिसमें कॉर्पोरेट औसत ईंधन दक्षता (सीएएफई) मानदंडों को छोटी पेट्रोल कारों के पक्ष में रखने और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों (एफएफवी) तथा कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) वाहनों को जेडईवी के रूप में वर्गीकृत करने का सुझाव दिया गया था। उन्होंने ईवी उत्सर्जन पर रिपोर्ट की मान्यताओं पर भी चिंता जताई थी। नीति आयोग ने संशोधित रिपोर्ट के संबंध में बिजनेस स्टैंडर्ड के सवालों का जवाब नहीं दिया। 

अपनी संशोधित रिपोर्ट में नीति आयोग ने इलेक्ट्रिफाइड वाहनों (एक्सईवी) से जुड़ा अहम बदलाव किया है। 10 फरवरी की रिपोर्ट में स्ट्रॉन्ग हाइब्रिड और प्लग-इन हाइब्रिड को मोटे तौर पर एक्सईवी की एक ही प्रमुख श्रेणी में रखा गया था। लेकिन संशोधित रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि बाजार में पैठ के लिहाज से बीईवी ही प्रमुख तकनीक होगी, जबकि अन्य तकनीकों को सीमित रूप से अपनाए जाने के आसार हैं। यह इस बात का संकेत है कि बदलाव के इस पूरे सफर में पूरी तरह से इलेक्ट्रिक वाहनों पर अब ज्यादा स्पष्ट रूप से जोर दिया जा रहा है।

फ्लेक्सी ईंधन और सीबीजी वाले वाहन गैस-तेल इंजनों का इस्तेमाल करते हुए फ्लेक्स फ्यूल (वर्तमान में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिश्रित) या बायोगैस (वर्तमान में सीबीजी को सीएनजी गैस साथ मिश्रित) पर चलते हैं। संशोधित रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2055 के बाद ही एफएफवी और सीबीजी वाहनों को क्रमशः लगभग 100 प्रतिशत एथेनॉल और शुद्ध कंप्रेस्ड बायोगैस पर संचालित किए जाने का अनुमान लगाया गया था। इसका तात्पर्य यह था कि बीईवी के विपरीत उनके उत्सर्जन का लाभ ईंधन की गुणवत्ता पर निर्भर था, जिससे 2055 तक की अवधि में उत्सर्जन के संबंध में बीईवी को सापेक्ष बढ़त मिलती।

जीवनचक्र उत्सर्जन वाले अनुभाग में विनिर्माण और उपयोग सहित किसी वाहन के कुल उत्सर्जन पर विचार किया गया। रिपोर्ट ने बीईवी पर अपनी पिछली स्थिति को नरम किया। फरवरी के संस्करण में कहा गया था कि बीईवी को विनिर्माण के अधिक उत्सर्जन की भरपाई के लिए 1.5 से 2 लाख किलोमीटर तक चलाने की जरूरत हो सकती है। 

संशोधित रिपोर्ट में इसे लगभग 1.5 लाख किलोमीटर तक सीमित किया गया है जिसका अर्थ है कि इलेक्ट्रिक वाहन पहले सुझाए गए समय से पहले ही पर्यावरण के लिहाज से फायदेमंद हो जाते हैं।

First Published : March 23, 2026 | 10:07 PM IST