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वाहन निर्माताओं का नीति आयोग को जवाब- पुराने वाहन कहां हैं, पता नहीं

वाहन उद्योग के अधिकारियों ने बताया कि पुराने वाहनों का पता लगाने में असमर्थता केंद्र की स्क्रैप नीति के तहत दायित्वों को पूरा करना मुश्किल बना सकती है

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दीपक पटेल   
Last Updated- June 09, 2026 | 11:31 PM IST

वाहन बनाने वाली कंपनियों ने मंगलवार को नीति आयोग को बताया कि उन्हें अक्सर यह पता नहीं होता कि 20-25 साल पुरानी ज्यादातर गाड़ियां कहां हैं, क्योंकि उनके जीवनकाल के दौरान कई बार उनके मालिक बदलते रहते हैं। बिज़नेस स्टैंडर्ड को पता चला है कि उन्होंने ऐसी गाड़ियों का पता लगाने के लिए सरकार से मदद मांगी है, जिसमें अपडेटेड ‘वाहन’ रजिस्ट्रेशन रिकॉर्ड तक पहुंच भी शामिल है।

नीति आयोग द्वारा आयोजित एक बैठक के दौरान, वाहन उद्योग के अधिकारियों ने बताया कि पुराने वाहनों का पता लगाने में असमर्थता केंद्र की स्क्रैप नीति के तहत दायित्वों को पूरा करना मुश्किल बना सकती है। यह स्क्रैप नीति पिछले साल जारी की गई थी।

सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान कुछ कार निर्माता कंपनियों के अधिकारियों ने आरोप लगाया कि ऑटोमेटेड टेस्टिंग स्टेशन (एटीएस) ईएलवी (एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल्स) की सही पहचान नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रैफिक चालान बकाया होने और दूसरी देनदारियों की वजह से गाड़ी मालिक अपनी पुरानी गाड़ियों को अधिकृत स्क्रैपिंग सेंटर ले जाने से कतराते हैं।

1 अप्रैल, 2025 से लागू हुए एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन (एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल्स) रूल्स, 2025 के तहत वाहन बनाने वाली कंपनियों को अपनी अवधि पूरी कर चुकी गाड़ियों (एंड-ऑफ-लाइफ व्हीकल्स) को स्क्रैप करने के लिए सालाना एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ईपीआर) लक्ष्य दिए गए हैं।

2025-26 के लिए, निर्माताओं को ईपीआर सर्टिफिकेट लेने होंगे। ये सर्टिफिकेट 2005-06 में बेचे गए प्राइवेट वाहनों और 2010-11 में बेचे गए कमर्शियल वाहनों में इस्तेमाल हुए स्टील के कम से कम 8 प्रतिशत के बराबर होने चाहिए। यह लक्ष्य 2030-31 से बढ़कर 13 प्रतिशत और 2035-36 से 18 प्रतिशत हो जाएगा।

एक प्रमुख यात्री वाहन निर्माता कंपनी के वरिष्ठ अ​धिकारी ने बैठक के दौरान कहा कि निर्माताओं को 20-25 साल पुराने कई वाहनों के बारे में कोई जानकारी नहीं है कि वे कहां हैं।

सूत्रों के मुताबिक, बैठक में एक अ​धिकारी ने कहा, ‘ओईएम को इन गाड़ियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। 25 साल के दौरान इनका ​स्वामित्व तीन, चार, पांच या उससे भी ज्यादा बार बदल जाता है। साथ ही ये पुरानी गाड़ियां कभी ओईएम के वर्कशॉप में नहीं आतीं। इसलिए हमें कोई अंदाजा नहीं है कि ये गाड़ियां कहां हैं।’

रीसाइक्लिंग उद्योग के अधिकारियों ने सुझाव दिया है कि गाड़ी के रजिस्ट्रेशन नंबर को उन जीएसटी  इनवॉइस से जोड़ा जाए जो स्टील, एल्युमीनियम और कॉपर जैसे रिकवर किए गए मैटेरियल को बेचने पर बनते हैं। इससे स्क्रैप से लेकर मैटेरियल रिकवरी तक का एक डिजिटल रिकॉर्ड बन सकेगा।

गाड़ियों को स्क्रैप करने वाले मार्केटप्लेस के एक वरिष्ठ अ​धिकारी ने कहा कि कागजात और मालिकाना हक से जुड़ी दिक्कतों की वजह से बड़ी संख्या में गाड़ियां अनौपचारिक स्क्रैपिंग चैनलों की ओर जा रही हैं। उन्होंने बताया, ‘किसी के पास कार तो है, लेकिन उसके कानूनी मालिक ने उसे कई साल पहले ही बेच दिया था और कार का स्वामित्व ट्रांसफर कराने के लिए आरटीओ नहीं गए थे।’ उन्होंने कहा कि ऐसे मामले बहुत आम हैं।

First Published : June 9, 2026 | 11:31 PM IST