सरकार अपने बजट अनुमानों को बिना बिगाड़े पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती कर सकती है ताकि आम आदमी पर वैश्विक कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बोझ को कम किया जा सके। सरकार को यह गुंजाइश दूसरे अग्रिम अनुमानों में नॉमिनल आर्थिक वृद्घि के नए आंकड़ों तथा 2022-23 के बजट में आर्थिक विस्तार के संरक्षणवादी अनुमान से मिल सकती है।
चालू वित्त वर्ष के लिए दूसरे अग्रिम अनुमानों में अर्थव्यवस्था का आकार 236.44 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि अग्रिम अनुमान में यह 232.15 लाख करोड़ रुपये आंकी गई थी। दूसरे अग्रिम अनुमान के आंकड़ों के मुताबिक 2022-23 के लिए मौजूदा कीमतों पर 258 लाख करोड़ रुपये की जीडीपी के बजट अनुमान का मतलब है महज 9.1 फीसदी की वृद्घि। यह वृद्घि बहुत कम नजर आती है जबकि रूस और यूक्रेन के बीच चालू युद्घ का दुनिया और भारत की वृद्घि पर पडऩे वाले असर को लेकिर अनिश्चितता बनी हुई है।
पहले अग्रिम अनुमानों के आधार पर बजट द्वारा वित्त वर्ष 2023 के लिए 11.1 फीसदी की वृद्घि के अनुमान को भी कई लोगों ने उम्मीद से कम बताया था।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर सी रंजगराजन मानते हैं कि यह 13 फीसदी होगी हालांकि उनका अनुमान युद्घ से पहले आया था। इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने 13-14 की वृद्घि का अनुमान जताया है। यदि अर्थव्यवस्था में वाकई में 13 फीसदी की वृद्घि होती है तो चालू वित्त वर्ष के लिए दूसरे अग्रिम अनुमानों के आधार पर अगले वित्त वर्ष में नॉमिनल जीडीपी 267.18 लाख करोड़ रुपये होगी। यह बजट में अनुमानित रकम से 9 करोड़ रुपये अधिक होगी।
इसका असर कर संग्रहों पर होगा। बजट में वित्त वर्ष 2023 में 27.5 लाख करोड़ रुपये कर संग्रह की बात कही गई है। यदि बजट में दिए गए 10.66 फीसदी की इसी जीडीपी-कर अनुपात को मानें तो 2022-23 के लिए कर संग्रह 28.47 लाख करोड़ रुपये होगा। हालांकि, सरकार को चुनाव के नतीजे आने के बाद पेट्रोलियम में कीमत में किसी तरह की बढ़ोतरी के बोझ को कम करने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती करनी पड़ सकती है।
अनुमानों के मुताबिक उत्पाद शुल्क में कटौती से राजकोष को 1 लाख करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान है। उदाहरण के लिए एसबीआई ने अपने शोध नोट में करीब 1 लाख करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया था जबकि इक्रा ने करीब 92,000 करोड़ रुपये के नुकसार का अनुमान जताया है। इसका मतलब है कि ऐसा तब होगा जबकि सरकार पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क घटाकर कीमत को महामारी से पूर्व के स्तर पर ले जाती है। कर ढांचे के आधार पर और कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर से 110 डॉलर प्रति बैरल रहने के अनुमान के मद्देनजर एसबीआई ने कहा कि डीजल और पेट्रोल की कीमत मौजूदा दर से क्रमश: 9 रुपये से 14 रुपये तक महंगी होनी चाहिए थी। हालांकि, विधानसभा चुनावों के कारण तेल विपणन कंपनियों ने कृत्रिम तरीके से पेट्रोल और डीजल की कीमतों को दबाकर इन्हें दिवाली के दौरान के स्तर पर बरकरार रखा है। तब केंद्र ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की थी। इसके बाद विभिन्न राज्यों ने मूल्य वर्धित कर (वैट) में कटौती की थी।