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सरकार ने बुधवार को सोने और चांदी के आयात पर 15 प्रतिशत शुल्क बढ़ाने का फैसला किया है। इसका मकसद रुपये पर पड़ रहे दबाव को कम करना और देश के व्यापार घाटे (ट्रेड डेफिसिट) को संतुलित करना बताया जा रहा है।
हालांकि अर्थशास्त्रियों और कमोडिटी विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का असर उतना सीधा नहीं होगा जितना दिख रहा है, क्योंकि मौजूदा स्थिति में आयात बढ़ने की बड़ी वजह मांग नहीं बल्कि वैश्विक कीमतों में तेज उछाल है।
भारत में सोने के बढ़ते आयात का असर देश के व्यापार घाटे पर साफ दिखाई दे रहा है। चालू वित्त वर्ष (अप्रैल से फरवरी FY26) में सोने का आयात पिछले साल की तुलना में करीब 15 अरब डॉलर ज्यादा रहा है। वहीं, देश का मासिक व्यापार घाटा हाल के महीनों में लगभग 20 से 25 अरब डॉलर के बीच बना हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ सोने के आयात में कमी से व्यापार घाटे पर सीमित ही राहत मिल सकती है, क्योंकि असली असर वैश्विक कीमतों पर भी निर्भर करता है।
विश्लेषक Doshi के अनुसार, अगर परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं तो सोने के आयात में गिरावट से व्यापार घाटा अधिकतम 10 से 15 अरब डॉलर तक कम हो सकता है।
उन्होंने बताया कि यह राहत कुल व्यापार घाटे का करीब 5 प्रतिशत और समग्र बाहरी घाटे का लगभग 10 से 12 प्रतिशत ही होगी। यानी प्रभाव तो होगा, लेकिन बहुत बड़ा नहीं।
Anuj Gaur, जो IBBM Pvt Ltd के डायरेक्टर और क्रॉस-एसेट क्लास ट्रेडर हैं, का कहना है कि अगर वैश्विक कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो भारत को आयात बिल को संतुलित करने के लिए सोने के भौतिक आयात में करीब 20 से 25 प्रतिशत तक की कमी करनी पड़ सकती है।
उनके मुताबिक, केवल कम मात्रा में सोना आयात करने से समस्या हल नहीं होगी, क्योंकि ऊंची कीमतें कुल आयात बिल को लगातार बढ़ाती रहती हैं।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के सोने के आयात में कमी दर्ज की गई है, लेकिन इसके बावजूद आयात पर कुल खर्च तेजी से बढ़ गया। वाणिज्य मंत्रालय और RBI के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर InvestValue Capital के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर आदित्य अग्रवाल (Aditya Agarwala) ने बताया कि इस दौरान भारत ने करीब 721 टन सोना आयात किया, जो पिछले साल की तुलना में 4.76 प्रतिशत कम है। फिर भी आयात बिल लगभग 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया, यानी इसमें करीब 24.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
आदित्य अग्रवाल के अनुसार, इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों का तेज बढ़ना है। औसतन आयात कीमतें सालाना आधार पर 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गईं, जिससे कम मात्रा में खरीद के बावजूद कुल भुगतान काफी बढ़ गया।
विश्लेषण में यह भी सामने आया कि सिर्फ कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से ही आयात बिल में करीब 17.6 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ जुड़ गया। वहीं, आयात की मात्रा घटने से लगभग 3.6 अरब डॉलर की बचत हुई, लेकिन यह बढ़ी हुई कीमतों के प्रभाव को संतुलित नहीं कर सकी।
अग्रवाल का कहना है कि मौजूदा हालात में सोने की कीमतें ही असली चुनौती हैं, क्योंकि वैश्विक स्तर पर गोल्ड की मांग और कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं। इससे भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए बिल नियंत्रित करना मुश्किल हो रहा है।
उन्होंने अनुमान लगाया कि अगर सोने की कीमतें करीब 4,700 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत को अपना आयात बिल वित्त वर्ष 2024-25 के स्तर पर लाने के लिए लगभग 47 प्रतिशत तक आयात घटाना होगा। इसका मतलब है कि आयात घटकर करीब 384 टन तक सीमित करना पड़ सकता है।
विश्लेषकों के अनुसार भारत में सोना सिर्फ गहनों तक सीमित नहीं है। यह कई उद्देश्यों के लिए खरीदा जाता है, जैसे:
इन्हीं कारणों से सोने की मांग लंबे समय तक बनी रहती है, चाहे कीमतें बढ़ें या आयात शुल्क में बदलाव हो।
विशेषज्ञ गौर के मुताबिक, अगर सोने पर 15 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाया जाता है, तो इसका असर तुरंत आयात पर दिख सकता है। लेकिन यह असर स्थायी नहीं होता।
उनका कहना है कि ऐसे टैक्स से आधिकारिक आयात (official imports) कुछ समय के लिए जरूर धीमा पड़ सकता है, लेकिन इससे असली घरेलू मांग में बड़ी गिरावट नहीं आती।
जब सोना महंगा हो जाता है या उस पर टैक्स बढ़ता है, तो उपभोक्ता अपनी खरीदारी की रणनीति बदल लेते हैं। आमतौर पर लोग:
इसका मतलब यह है कि मांग पूरी तरह खत्म नहीं होती, बल्कि उसका तरीका बदल जाता है।
विशेषज्ञ दोशी ने भी चेतावनी दी है कि आयात शुल्क बढ़ने पर कुछ हिस्सा स्मगलिंग की तरफ जा सकता है। यानी जो कमी आधिकारिक आयात में दिखती है, उसका एक हिस्सा गैरकानूनी रास्तों से पूरा हो जाता है।
उनका कहना है कि शुरुआती समय में आयात वॉल्यूम में गिरावट दिख सकती है, लेकिन यह मुख्य रूप से अवैध या अनौपचारिक सप्लाई चैनलों की वजह से होता है, न कि वास्तविक मांग में कमी से।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुमान के अनुसार:
इसका मतलब है कि लंबी अवधि में सोने की खपत पर बहुत बड़ा असर नहीं पड़ता।
अगर घरेलू मांग में गिरावट बहुत कम रहती है, तो आयात शुल्क बढ़ाने से भारत के व्यापार संतुलन (trade balance) में बड़ा सुधार भी नहीं दिखता। क्योंकि मांग बनी रहती है और वह किसी न किसी चैनल से पूरी हो जाती है।
Religare Broking Limited के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और रिसर्च हेड अजीत मिश्रा के अनुसार, सोने के बाजार में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। उनका कहना है कि बढ़ती कीमतों और महंगाई के दबाव की वजह से गहनों की मांग कमजोर हुई है।
लेकिन इसके उलट निवेश के रूप में सोने की खरीद में लगातार तेजी बनी हुई है। लोग अब सोने को सिर्फ पहनने या उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक वित्तीय सुरक्षा साधन के रूप में देख रहे हैं।
World Gold Council के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में निवेश मांग में जोरदार उछाल देखा गया।
इस दौरान सोने की कुल निवेश मांग में 54 प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी हुई और यह 82 टन तक पहुंच गई। यह कुल मांग का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा है।
इसमें गोल्ड बार, सिक्के, ETF और डिजिटल गोल्ड जैसी निवेश श्रेणियां शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई वैश्विक और घरेलू कारण हैं।
इन कारणों से निवेशक अब सोने को अपने पोर्टफोलियो का अहम हिस्सा बना रहे हैं।
अजीत मिश्रा के अनुसार, अब निवेशक सोने को सिर्फ खरीदारी की वस्तु नहीं मान रहे हैं। इसे एक रणनीतिक निवेश विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, जो बाजार की अनिश्चितता में सुरक्षा देता है।
यही वजह है कि सोने की मांग में स्थिरता बनी हुई है, भले ही कीमतें ऊंची क्यों न हों।
भारत के व्यापार घाटे (Trade Deficit) को लेकर अक्सर यह चर्चा होती है कि क्या सोने (Gold) के आयात में कमी लाकर इसे नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ सोने के आयात में कटौती से देश के बड़े व्यापार घाटे पर बहुत सीमित असर पड़ेगा।
विश्लेषकों का कहना है कि भारत का आयात बिल सिर्फ सोने पर निर्भर नहीं है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल (Crude Oil), इलेक्ट्रॉनिक्स और कैपिटल गुड्स का होता है।
इन क्षेत्रों का आयात इतना ज्यादा है कि अगर सोने के आयात में बड़ी गिरावट भी आ जाए, तब भी कुल व्यापार घाटे पर उसका असर बहुत छोटा रहेगा।
एक विशेषज्ञ के अनुसार, अगर सोने के आयात में तेज गिरावट भी देखने को मिले, तो भी इससे व्यापार संतुलन में सिर्फ अस्थायी और सीमित सुधार ही हो सकता है।
उन्होंने कहा कि जब तक निर्यात (Exports) में बढ़ोतरी नहीं होती और ऊर्जा से जुड़े आयात में कमी नहीं आती, तब तक व्यापार घाटे की समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल है।
उद्योग से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि भारत में सोने की मांग सिर्फ कीमतों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह एक गहरी सांस्कृतिक और आर्थिक आदत से जुड़ी हुई है।
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इस वजह से सिर्फ आयात शुल्क बढ़ाने या सख्ती करने से लंबी अवधि में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आता।
डेक्कन गोल्ड माइन्स लिमिटेड के एमडी डॉ. हनुमा प्रसाद मोदी का कहना है कि भारत को सोने के लिए विदेशों पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू खोज और खनन को बढ़ावा देना चाहिए।
उनके अनुसार, अगर देश में खनन परियोजनाओं को तेजी से मंजूरी मिले, नीतियों में स्थिरता रहे और व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रोजेक्ट्स को समय पर आगे बढ़ाया जाए, तो धीरे-धीरे आयात पर निर्भरता कम हो सकती है।