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अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर कपास बेचे निगम : कपड़ा उद्योग

Last Updated- December 08, 2022 | 2:40 AM IST

घरेलू कपड़ा उद्योग ने मांग की है कि भारतीय कपास निगम (सीसीआई) को अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर कपास की बिक्री करनी चाहिए।


कपड़ा उद्योग की यह मांग वैसे समय में आई है जब सरकार द्वारा इस साल के सितंबर में घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) वर्तमान बाजार कीमतों से कहीं अधिक हैं। इस बात को लेकर उद्योग से जुड़े दिग्गजों की बैठक आज नई दिल्ली में हो रही है जिसमें इस मुद्दे पर बातचीत की जाएगी तथा सरकार के सामने अपनी मांगे रखी जाएंगी।

साल 2008-09 में ‘मीडियम लॉन्ग स्टेबल’ कपास का एमएसपी सरकार ने बढ़ा कर 2,500 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया है, पिछले साल यह 1,900 रुपये प्रति क्विंटल था। ‘लॉन्ग स्टेबल’ कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में पिछले साल के मुकाबले 47.78 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है और इसे 2,030 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ा कर 3,000 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया है।

कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन टेक्सटाइल इंडस्ट्री (सीआईटीआई) के अध्यक्ष आर के डालमिया ने कहा, ‘बैठक का मुख्य मुद्दा कपास का है। हम सरकार से अनुरोध करेंगे कि सीसीआई को अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर उद्योग को कपास बेचनी चाहिए (कपास की अंतरराष्ट्रीय कीमतें फिलहाल एमएसपी के साथ-साथ कपास के हाजिर मूल्यों से भी कम चल रहे हैं)।’ कपास उद्योग का अनुमान है कि एमएसपी में बढ़ोतरी के कारण कपास की कीमतों में मजबूती रहेगी।

कपड़ा मंत्रालय के संयुक्त सचिव एन सिंह ने हाल ही में बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया था कि कपास की कीमतें घोषित एमएसपी से अधिक रहेंगी। पिछले कपास वर्ष (अक्टूबर से सितंबर) के दौरान कपास की कीमतें 28,000 रुपये प्रति कैंडी (एक कैंडी=356 किलो) के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गई थी और अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी 81 सेंट प्रति पाउंड के जितनी अधिक हो गई थी।

हालांकि, वर्तमान में कपास की घरेलू कीमतें (शंकर-6) कम होकर लगभग 22,000 रुपये प्रति कैंडी है और अंतरराष्ट्रीय कपास का कारोबार 55 सेंट प्रति पाउंड (21,000 रुपये प्रति कैंडी) पर किया जा रहा है। कॉटन एडवाइजरी बोर्ड के नवीनतम आकलन के मुताबिक साल 2008-09 में देश में 322 लाख गांठों (एक गांठ= 170 किलो) के उत्पादन की उम्मीद है जबकि पिछले साल 315 लाख गांठों का उत्पादन हुआ था।

डालमिया ने कहा कि देश में उपजाए गए लगभग एक तिहाई कपास की खरीदारी सीसीआई द्वारा की जाती है। उन्होंने कहा, ‘ऐसी परिस्थिति में जब सीसीआई कपास के एक बड़े हिस्से की खरीदारी कर लेती है तो फिर उद्योगों की खपत के लिए कपास कहां से आएगा।’

तिरुपुर स्थित केपीआर मिल के प्रबंध निदेशक पी नटराज ने कहा, ‘एमएसपी बढ़ने के साथ ही किसान सीसीआई को अपना कपास बेचना चाहेंगे और इस कारण मिल वैसे समय में भी प्रभावित होंगे जब देश में कपास का उत्पादन बढ़िया हुआ है।’

डालमिया ने बताया कि कच्चे माल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी और घटते निर्यात ऑर्डर के कारण देश का कपड़ा उद्योग पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और वियतनाम से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाएगा। लेकिन ऊर्जा (बिजली) की कमी और निर्यात बाजार की मंदी के कारण तमिलनाडु के स्पिनिंग मिलों की क्षमता का इस्तेमाल पहले ही घट कर 60 प्रतिशत हो गया है।

अगर कपास की कीमतों में बढ़ोतरी होती है तो क्षमताओं के इस्तेमाल में और कमी आएगी। नटराज ने कहा, ‘देश के लगभग आधे स्पिनिंग मिल तमिलनाडु में हैं और मिल वास्तव में प्रभावित हो रहे हैं।’

दक्षिण भारतीय मिल्स एसोसिएशन, उत्तर भारतीय मिल्स एसोसिएशन, कॉटन टेक्सटाइल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऐसी इकाइयां है जो आज की बैठक में कन्फेडरेशन ऑफ टेक्सटाइल इंडस्ट्री के साथ रहेंगी।

First Published - November 5, 2008 | 10:05 PM IST

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