मानसून सीजन खत्म होने के बाद भी हो रही लगातार बारिश से कपास को भारी नुकसान हो रहा है। बाजार में नई फसल की आवक रफ्तर पकड़ रही है तो कीमत और मंडी टैक्स को लेकर कारोबारियों की हड़ताल ने कपास किसानों की चिंताएं और बढ़ा दी है। हालांकि महाराष्ट्र की मंड़ियों में पिछले साल की अपेक्षा कपास के बेहतर भाव मिलने के संकते मिल रहे हैं लेकिन बारिश के कारण फिलहाल कपास खरीदने से व्यापारी बच रहे हैं जो किसानों के लिए बड़ी मुसीबत साबित हो रहा है।
कपास मंडियों में कपास की नई फसल की खरीद दशहरा (पांच अक्टूबर) से शुरु हो गई। महाराष्ट्र के औरंगाबाद मंड़ी में कपास खरीदी सीजन के पहले ही दिन (दशहरा) व्यापारियों ने 11 हजार रुपये प्रति क्विंटल की दर से कपास की खरीद की, जिसे किसान इस साल अपनी उपज के अच्छे दाम मिलने का संकेत मान रहे हैं।
किसानों का कहना है कि अगर यही भाव आगे भी मिलता रहे तो उन्हे फायदा होगा। पिछले साल सीजन के अंत में किसानों को कपास का 13 हज़ार रुपये प्रति क्विंटल दर मिला था। किसानों ने कहा इस साल दाम में अच्छी शुरुआत हुई है, और आगे भी यही भाव मिलने की उम्मीद है। हांलाकि किसान संगठनों का एक बड़ा वर्ग मौजूदा भाव से संतुष्ट नहीं हैं उनका कहना है कि बारिश के कारण फसल खराब हुई जिससे उनकी लागत काफी ज्यादा हुई है इसीलिए इस दर पर किसानों को घाटा हो रहा है।
महाराष्ट्र की मंडियों में कपास का औसतन भाव 9000 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास चल रहा है, जबकि ग्रामीण इलाकों की मंड़ियों में पिछले साल औसतन दाम 7000-8000 रुपये क्विंटल था। किसानों का कहना है कि इस साल बारिश ने शुरू से ही जोरदार कहर बरसाया है। कई जिलों में खेतों में पानी भर जाने से फसलों की वृद्धि रुक गई है। कहीं-कहीं फसलों के पीले होने की भी तस्वीर देखी जा रही है। कई इलाकों में कपास की फसल कीडे का शिकार हो गई जिससे उत्पादन प्रभावित होगी। जिससे इस साल कपास की आवक कम होने की संभावना है । आवक कम होती है तो निश्चित तौर पर कपास की कीमत और बेहतर होगी । शुरुआत में कीमत अच्छी मिल भी जाती है, तो अंत मे किसानों को उत्पादन में गिरावट का खामियाजा भुगतना पड़ता है। इस बात को व्यापारी भी समझ रहे हैं इसीलिए दाम बढ़ाकर फसल खरीद रहे हैं लेकिन यह भाव पर्याप्त नहीं है।
स्वाभिमानी शेतकारी संगठन के नेता रविकांत तुपकर कहते हैं कि बारिश ने फसल को नुकसान पहुंचाने के साथ उत्पादन लागत भी बढ़ा दी है। उत्पादन लागत की तुलना में कीमतें कम हैं। कपास के लिए कम से कम 12500 रुपये प्रति क्विंटल और साथ ही किसानों को फसल बीमा राशि का जल्दी ही भुगतान किया जाए। तुपकर ने कहा कि सरकार पांच नवंबर तक उनकी बातें नहीं मानी तो किसानों को उनका उचित दाम दिलवाने के लिए 6 नवंबर को जिलाधिकारी कार्यालय के सामने किसानों का एल्गर मार्च निकाला जाएगा।
महाराष्ट्र की तरह कपास उत्पादक प्रमुख राज्य मध्य प्रदेश में कपास किसान आंदोलन की राह पर हैं। मंडी टैक्स को लेकर मंगलवार से मंडी में व्यापारियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल शुरु कर दी है। अन्य प्रदेशों की तरह ही मध्य प्रदेश में भी कपास के व्यापारी मंडी टैक्स 50 पैसे किए जाने की मांग कर रहे हैं। कॉटन एसोसिएशन के खंडवा जिलाध्यक्ष संजय अग्रवाल कहते हैं कि अन्य प्रदेशों की तरह मध्य प्रदेश में भी कपास पर मंडी टैक्स लिया जाना चाहिए। अन्य प्रदेशों में 25 से 50 पैसे टैक्स लग रहा है, जबकि मप्र में 1.50 रुपए और 20 पैसे अतिरिक्त निराश्रित शुल्क के नाम पर वसूल किए जा रहे है, जो अनुचित है। टैक्स कम होने से किसानों को भी फायदा होगा।
बारिश के कारण महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की कई कपास मंडियों में कपास की बोली ही नहीं हुई। कारोबारियों का कहना है कि कपास गीला है जिसके कारण इसकी बोली नहीं की जा सकती है। दूसरी तरफ किसानों का कहना है कि उनकी उपज की बिक्री नहीं हुई तो पूरी उपज ही खराब हो जाएगी। कारोबारियों की हड़ताल पर किसानों का कहना है कि यह उचित समय नहीं है क्योंकि हड़ताल यह दूसरी मांगों की वजह से इस समय फसल खरीदी नहीं हुई तो किसान बर्बाद हो जाएंगे, बारिश के कारण पहले ही नुकसान हो चुका है। औरंगाबाद के कपास किसान युवराज शिंदे ने कहा कि किसान संगठनों और कारोबारियों की मांग सही है लेकिन समय सही नहीं है क्योंकि इससे सबसे ज्यादा नुकसान किसान का ही होने वाला है।