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मौसम में बदलाव से परेशान आम किसान

Last Updated- December 10, 2022 | 6:53 PM IST

दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के दंश से उत्तर प्रदेश में आम की खेती करने वाले हजारों किसान भी नहीं बच पाए हैं।
मौसम में अस्थिरता की वजह से तापमान में काफी बढ़ोतरी हुई और इससे आम के पेड़ पर बहुत पहले ही बौर आ गए। इसकी वजह से किसानों और कारोबारियों की मुसीबतें बढ़ गई हैं क्योंकि मौसम में अस्थिरता के वजह से उन्हें नुकसान का डर सता रहा है।
फल और सब्जी कारोबारियों की एसोसिएशन (एफवीएमए) के सदस्य नवीन चावला ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि आम के वायदा अनुबंध कारोबारियों ने कम से कम 250 करोड़ रुपये निवेश किया था। ऐसे में समय से पहले ही आम के बौर आने से तापमान में अस्थिरता से इसके गिरने की ज्यादा संभावना बन सकती है।
उनका कहना है, ‘फल सामान्य चक्र के बजाय 45 दिन पहले ही तैयार हो सकता है। इसकी वजह से आम को सड़ने से बचाने के लिए इसे कम कीमत पर ही बेचना पड़ेगा।’ इसी तरह वह वर्ष 2003 और 2005 को याद करते हैं जब ऐसे ही हालात बनने लगे थे। उस वक्त मार्च के महीने के अंतिम दिनों में आम के बौर तापमान के गिरावट की वजह से गिर गए थे। 
आम की खेती बड़े पैमाने पर लखनऊ के नजदीक मलिहाबाद में होती है। उत्तर प्रदेश इस फल का उत्पादन सबसे ज्यादा करता है। पिछले साल कोहरे की वजह से आम की फसल को बहुत ज्यादा नुकसान हुआ। इस साल में कुछ ऐसे ही आसार नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा तापमान होने से उसका असर आम के पेड़ पर भी पड़ सकता है।
चंद्र शेखर कृषि विश्वविद्यालय (सीएसए) के प्रोफेसर आर. पी. कटियार का कहना है, ‘बारिश और कोहरे के न होने की वजह से भी आम का बौर निकलना जल्दी शुरू हो गया। इस वक्त बारिश नहीं हुई और कोहरा कम रहा इसी वजह से उपयुक्त तापमान मिलने से आम के पेड़ पर पहले ही बौर निकलने शुरु हो गए।’
इस साल तापमान बेहतर रहने की वजह से बौर पहले ही लगने शुरू हो गए। कटियार का कहना है, ‘इस साल तापमान सामान्य से ज्यादा बेहतर रहने की वजह से जनवरी के मध्य में बौर लगने शुरू हो गए और मार्च के मध्य तक ऐसा ही चलता रहेगा।’
बाजार की स्थितियों पर नजर रखने वाले एक स्थानीय वायदा कॉन्ट्रैक्टर राघवेन्द्र सिंह का कहना है, ‘बाजार में आम की अधिकता से किसानों और वायदा कारोबारियों दोनों को ही परेशानी होने वाली है। किसान अनुबंधों की समीक्षा करने में कोई दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं।
दरअसल हम हर कानूनी समझौते के लिहाज से नुकसान को ले रहे हैं।’ सिंह का कहना है, ‘आमतौर पर साल में इस समय तक 10 फीसदी फल बाजार में आ जाते हैं। जबकि मुख्य फसल मई में खरीदी जाती है।
लेकिन इस साल उत्पादन का लगभग 40 फीसदी बाजार में मार्च के अंत तक आ जाएगा और इससे घाटा बढ़ने की बहुत ज्यादा उम्मीद है।’कारोबारी अपने निवेश का महज 10 फीसदी ही बिक्री के जरिए रिकवरी करने की उम्मीद कर रहे हैं।

First Published - March 4, 2009 | 7:28 PM IST

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